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भूख : सरकार प्रचार छोडे, काम करे

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  -राकेश  दुबे

भारत  ही नहीं दुनिया में एक बड़ा सवाल भूख है |दुनिया जिस पैमाने से भूखे लोगों की संख्या तय करती है, उसे ग्लोबल हंगर इंडेक्स कहते हैं | ग्लोबल हंगर इंडेक्स की यह परिभाषा मैंने मुंबई के स्कूली छात्र को समझा तो दी, पर उन मित्रों को आश्वस्त नहीं कर सका जो यह मानते हैं कि देश के वर्तमान सरकार ने भूख को भारत से मिटा दिया है | वे भारत सरकार के मुफ्त राशन वितरण के आंकड़ों को सत्य और ग्लोबल हंगर इंडेक्सके आंकड़ों को अतिरेकी मानते हैं और इसके पक्ष विपक्ष में माहौल तैयार कर रहे हैं |सरकार का प्रोपेगंडा सही हो या ग्लोबल हंगर इंडेक्स के  आंकड़े कोई भी सरकार अपने इस कर्तव्य से च्युत नहीं हो सकती कि भूख से उसे कोई सरोकार नहीं है | उसे यह स्पष्ट करना चहिये कि भूख निवारण के लिए उसने वास्तव में क्या किया ?

 एक नजर आंकड़ों पर २०१४ में, ग्लोबल हंगर  इंडेक्स पर भारत की रैंकिंग, ७६  देशों में   थी। २०२०  में १०७ देशों में यह ९४ हुई  । पिछले वर्ष यानी २०२१  में ११६  देशों में भारत १०१  नबंर पर था। और,  और अभी आई ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक २०२२  में १२१  देशों में भारत का स्थान १०७ वां है।इस रैंकिंग की गणना १००-बिंदुओं के स्कोर पर की जाती है जो भूख की गंभीरता को दर्शाती है। इस रैंकिंग किसी देश का स्कोर अगर शून्य है तो वह सबसे अच्छा स्थान है और अगर किसी का स्कोर 100 है तो वह सबसे खराब स्थिति है। इस पैमाने पर भारत का स्कोर २९.१ है जिसे ‘गंभीर’ श्रेणी का  माना जाता है। २०२०  में, हमारे स्कोर में गिरावट इसलिए हुई क्योंकि २०१४ और २०१९  के बीच पांच वर्षों में चाइल्ड वेस्टिंग (यानी लंबाई के अनुपात में कम वजन का होना) २०१० -२०१४  में १५.१ प्रतिशत से बढ़कर १७.३ प्रतिशत हो गई थी।यह कुपोषण के लक्षण हैं |

इस वर्ष भी चाइल्ड वेस्टिंग बढ़कर १९.४  हो गई है, जो पिछले २०  वर्षों में सबसे अधिक है और न केवल भारत की खराब स्थिति को दर्शाता है बल्कि यह दुनिया के किसी भी देश  की औसत स्थिति से बदतर है। इसी तरह भारत में  कुपोषण २०१८ -२०२० में  १४.६ प्रतिशत से बढ़कर २०१९-२०२० में १६.३ प्रतिशत हो गया। ग्लोबल हंगर  इंडेक्स के आंकड़ों पर विश्वास करें तो २२ करोड़ से ज्यादा भारतीय भूखे सोते हैं।

इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र की पांच एजेंसियों ने ‘स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड’ रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि २०१९ -२०२१ में ४० प्रतिशत भारतीय खाद्य असुरक्षा का शिकार थे और अकेले भारत में दुनिया की कुल गंभीर रूप से खाद्य-असुरक्षित आबादी का एक तिहाई से अधिक हिस्सा था।हमें इससे आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए क्योंकि सरकार को तो इस तथ्य पर गर्व है कि ८०  करोड़ भारतीयों, यानी करीब ६० प्रतिशत आबादी को वह हर महीने पांच किलो मुफ्त अनाज और एक किलो दाल के लिए कतार में लगाए हुए है। और ऐसा दो साल से अधिक समय से हो रहा है।

सवाल यह है कि भारत में सरकार ऐसी रिपोर्टों पर कैसे प्रतिक्रिया देती है? जब पिछले साल की रिपोर्ट आई, तो केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने राज्यसभा को बताया कि सरकार ने निष्कर्षों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा: “कुछ एनजीओ ने सर्वेक्षण किया है। हमने उनसे पूछा है कि किस आधार पर इस नतीजे पर पहुंचे हैं? उन्होंने अभी तक जवाब नहीं दिया है। हमारे यहां तो गांव में जब भी कोई गली का कुत्ता भी जन्म देता है, भले ही वह काटता हो, फिर भी हमारे यहां कि महिलाएं उन्हें शीर (मीठा पकवान) देती हैं। इसलिए, जिस देश में ऐसी परंपरा मौजूद है, ऐसे में एक एनजीओ आता है और हमारे बच्चों के बारे में ऐसी रिपोर्ट जारी करता है, हमें ऐसी रिपोर्टों के प्रति संवेदनशील नहीं होना चाहिए। जहां तक इन सर्वेक्षणों का सवाल है, स्वस्थ और मजबूत बच्चों की भी गिनती की जाती है..समाज में जागरूकता होनी चाहिए|

हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी खराब है, लेकिन फिर भी ऐसी सूचनाएं और खबरें अब हमें प्रभावित नहीं करती हैं। नेपाल और श्रीलंका भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। चीन, जिसे हम  अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं, वह भी उन टॉप १७ देशों में हैं जिन्हें कोई व्यक्तिगत  स्कोर नहीं दिया गया क्योंकि वहां भूखमरी बेहद कम है।

एक और बात भारत की प्रति व्यक्ति आय अब बांग्लादेश से भी कम है, लेकिन यह खबर भी हमें चिंतित नहीं करती है। देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट भी ऐसा ही मुद्दा है  सरकार को प्रचार से ज्यादा कर्तव्य पर ध्यान देना चाहिए |

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