मुनेश त्यागी
वैश्विक भूख सूचकांक यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 2022 के आंकड़ों के अनुसार भारत छह स्थान गिरकर 121 देशों में 107वें स्थान पर आ गया है। पिछले साल भारत 116 देशों में 101वें स्थान पर था। कुछ मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में चीन 1 से लेकर 17वें स्थान पर है, श्रीलंका 64वें स्थान पर है, म्यानमार 71 वें स्थान पर है, नेपाल 81वें स्थान पर है, बांग्लादेश 84वें स्थान पर है, पाकिस्तान 99वें स्थान पर है, भारत 107वें स्थान पर है। एशिया में सिर्फ अफगानिस्तान ही भारत से एक स्थान ऊपर है।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स में कंबोडिया, म्यानमार, घाना, इराक, वियतनाम, लेबनान, गुयाना, यूक्रेन जमैका, सूडान, इथोपिया, रवांडा, नाइजीरिया, कीनिया, गांबिया, नामीबिया आदि देश भारत से ऊपर हैं।
भारत सरकार ने इस रिपोर्ट का विरोध करते हुए कहा है कि यह रिपोर्ट जमीनी हकीकत से दूर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर अधिकांश विपक्षी दलों का कहना है कि यह सब सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है। बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि एशिया में केवल अफगानिस्तान ही भारत से नीचे है यानी कि समूचे एशिया में, अफगानिस्तान को छोड़कर भारत वैश्विक भूख सूचकांक में सबसे नीचे है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 80 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे हैं। वे गरीब हैं और उसका कहना है कि सरकार इन लोगों को मुफ्त में अनाज दे रही है। यहीं पर सवाल उठता है कि आखिर लोगों को कब तक मुफ्त में अनाज दिया जाएगा? इनकी गरीबी दूर क्यों नहीं की जाती? इन्हें रोजगार क्यों नहीं दिया जाता? इनकी आम आदमी का अस्थाई जरिया क्यों नहीं ढूंढा जाता? आखिर कोई आदमी या कोई परिवार, सरकार पर कब तक निर्भर रहेगा?
यहां पर लगता है कि हमारी सरकार जानबूझकर इन 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को अपने ऊपर आश्रित रखना चाहती है ताकि वह समय आने पर, इन सब का लाभ उठा सकें और इसे वोटों में तब्दील कर सके। पिछले चुनाव में हमने देखा है 5 किलो अनाज की वजह से योगी सरकार उन्हें सत्ता में आ गई। यही हाल 2024 तक रहने वाला है क्योंकि 2024 तक सरकार गरीब मजदूरों को गरीबों को कोई रोजगार देने नहीं जा रही है उन्हें अपनी 5 किलो अनाज पर अपने ऊपर आश्रित रखेगी।
यहीं पर सवाल उठता है कि जब भारत कई दूसरे देशों को अनाज सप्लाई कर रहा है और रिपोर्ट भी है कि हजारों लाखों टन चावल गेहूं आदि गोदामों में सड़ता रहता है, सरकार उसकी कोई खैर खबर नहीं लेती, उसे सुरक्षित रखने के उपाय नहीं करती और आखिर यह गेहूं गरीब लोगों को, इन भूखे लोगों को क्यों नहीं दिया जाता है? यह एक विशाल का एक सवाल हमारे सामने है।
यह भी एक हकीकत है कि भारत की भूख सूचकांक में गिरती स्थिति का सबसे बड़ा कारण सरकार द्वारा जो आर्थिक नीतियां लागू की जा रही है, यह उन्हीं नीतियों की विनाशलीला का परिणाम है और भारत इस जाल में फंस गया है क्योंकि वह अपनी जनविरोधी, किसान विरोधी, मजदूर विरोधी, छात्र विरोधी, नौजवान विरोधी आर्थिक नीतियों से अपनी जान नहीं छुड़ा सकता। वह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के और पूंजीवादी देशों के चक्कर में फस गया है। अब उसका यहां से निकालना बहुत मुश्किल है क्योंकि वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की जो आर्थिक नीतियां 30 साल पहले शुरू की गई थीं, वे अब अपना असर दिखाने लगी है और वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का गिरता हुआ स्तर उन्हीं नीतियों का एक गम्भीर अफसोसजनक और जनता और सरकार का सिर झुकाने वाला परिणाम है।
2014 में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 120 देशों में 55 में नंबर पर था। तब अडानी दुनिया के अमीरों की लिस्ट में 609वें स्थान पर था। आज 2022 में अदानी दुनिया के अमीरों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर आ गया है और भुखमरी की लिस्ट में दुनिया के 121 देशों की सूची में भारत 107वें नंबर पर आ गया है। अब आप बताइए कि भारत की जनता और सरकार किसका जश्न मनाएं?
सरकार जो नीतियां लागू कर रही है वे भारत की जनता के हित में नहीं हैं और उन्हीं की वजह से आज भारत भूख सूचकांक में बहुत नीचे गिर गया है। एशिया में तो वह लगभग प्रथम आ गया है। तो यहीं पर यह समस्या पैदा होती है कि सरकार इन जनविरोधी नीतियों से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
यहां पर गेंद अब जनता के पाले में आ जाती है कि जनता को एकजुट होकर, प्रयासरत होकर, संघर्ष करके, एक आंदोलन करके, एक अभियान चलाकर इस जनविरोधी सरकार को और इन जन विरोधी सरकारों को सत्ता से पदच्युत करना होगा, सत्ता से निकालना होगा, सत्ता से बेदखल करना होगा और इनके स्थान पर किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार कायम करनी होगी।
इस जनविरोधी निजाम के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था करनी होगी क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती। केवल किसानों और मजदूरों की समाजवादी सरकार ही इस देश की 85 परसेंट जनता की भलाई कर सकती है। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। आज नहीं तो कल भारत की सारी जनवादी ताकतों और वामपंथी दलों को एकजुट होकर इस जनविरोधी सरकार को सत्ता से हटाना पड़ेगा और जनता के कल्याण की नीतियों को लागू करना पड़ेगा।

