बरखा त्रेहन
उत्तर प्रदेश की ज्योति मौर्य की कहानी अब एक नया रंग और रूप लेती जा रही है, जहां पहले यह लड़ाई पति एवं पत्नी की आपसी लड़ाई थी तो अब यह महिला स्वतंत्रता की ओर चलती चली जा रही है। अब यह निष्कर्ष निकाला जाने लगा है कि चूंकि महिला की निजता होती है, अत: उसका सम्मान किया जाना चाहिए। तो वहीं अब समाचार आ रहा है कि ज्योति मौर्य के पति आलोक मौर्य ने पत्नी से माफी मांग ली है, तो क्या इसे समस्या का हल या अंत समझा जाए?
इस सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि हो सकता है कि आलोक मौर्य जो कि उस महिला का पति है, उसका मीडिया के पास जाना गलत हो और इस विवाद को बाहर लाने में उसकी बड़ी भूमिका है, मगर फिर भी अब जिस प्रकार ज्योति मौर्य के इस कदम को हर महिला के अधूरे जीवन के साथ जोड़ा जा रहा है, वह गलत है। विवाह जैसी मूल संस्था पर प्रश्न उठाए जा रहे है, वह गलत है।
दरअसल ज्योति मौर्य के मामले के बाद लोगों ने प्रश्न उठाना आरम्भ कर दिया कि न जाने कितने पति हैं जो अपनी अनपढ़ पत्नी को सफल होने के बाद छोड़ देते हैं। या फिर छोड़ते नहीं हैं तो वह गाँव में रहती है तो वहीं नई पत्नी शहर में रहती है। कई उदाहरण लोगों ने दिए और वह हर क्षेत्र से थे जैसे राजनीति, साहित्य आदि! राजनीति में वह मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान तो वहीं साहित्य में तो तुलसीराम की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हो रही है।
इनमें भी तुलसीराम की कहानी अधिक वायरल है, क्योंकि साहित्य संवेदनशील माना जाता है। साहित्य में ऐसी कई कहानियां पहले भी लोग दबी जुबां में कहते रहे हैं कि पत्नी गाँव में रहती है और पति शहर में नहीं लाता! यह एक सामाजिक समस्या है इसे दूर किए जाने की आवश्यकता थी, न कि उस विकृति को स्त्रियों के भीतर लाने की थी। और यदि पहले विवाहित पुरुष अपनी पहली अनपढ़ पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से विवाह करते थे तो भी स्त्री ही तो दूसरी स्त्री के समक्ष खड़ी होती थी।
यह इतना उलझा मामला है, जिसे कथित स्त्रीवादियों के एकतरफा एक्टिविज्म ने और उलझा दिया है। पुरुष आयोग की अध्यक्ष होने के नाते मैं बरखा त्रेहन यह चाहती हूँ कि ऐसे मामलों को स्त्री और पुरुष का न बनाकर परिवार का विमर्श बनाया जाए कि कैसे परिवार में प्रेम तथा विश्वास का प्रवाह रहे!
यदि पूर्व में पुरुष ने ऐसा किया तो महिला भी ऐसा करेगी तभी समानता आएगी, यह एक ऐसा विमर्श है जिससे परिवार और समाज दोनों ही ढह जाएंगे और विवाह से परे भटकाव कुछ दिनों के लिए तो शांति दे सकता है, मगर अधिक समय तक रहने से वह इस सीमा तक हानि कर देगा कि फिर आपराधिक घटना की आशंका बलवती हो जाती है। जैसा कई मामलों में हम देखते हैं।
कई मामले सामने आते हैं, जिनमें पत्नी अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति की हत्या कर देती है। यह उसी निजता के विचार का विकृत रूप है जो पत्नी को परिवार से परे जाकर शान्ति तलाशने पर बल देता है। जहां समस्याओं को आपस में सुलझाकर परिपक्वता की बात की जा सकती है तो वहीं ज्योति मौर्य वाले मामले में पति को लोभी, लालची आदि कहकर एक ऐसी रेखा खींची जा रही है, जिसे मिटाना बहुत कठिन होगा! पति और पत्नी का आपसी विश्वास छिन्न भिन्न होगा!
मेरे पास कई मामले ऐसे आते हैं, जिनमें पुरुष अपनी समस्याएं लिखकर भेजते हैं और जैसा कि मेरा कहना रहा है कि चूंकि पुरुषों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता, इसलिए सारा गुब्बारा सोशल मीडिया पर फूट जाता है। जैसे ज्योति मौर्य के चरित्र पर प्रश्न उठाना गलत है वैसे ही यह कहा जाना भी एकदम गलत है कि “एव्री मैन इज पोटेंशियल रेपिस्ट!” जब इस कथन का विरोध महिलाओं द्वारा नहीं हुआ तो सामान्यीकरण की लड़ाई में अब यह सब हो रहा है। पुरुषों के प्रति सामान्यीकरण की समस्या है और जैसे ही महिलाओं को लेकर कोई दुर्घटना होती है, तो उसमें पूरे पुरुष वर्ग को घसीट लिया जाता है, बिना यह सोचे कि क्या वास्तव में उसका कोई दोष भी है या नहीं? यह भी नहीं ध्यान दिया जाता कि वह किसी का भाई, पिता या बेटा हो सकता है? प्रश्न यहाँ पर पुरुषों की भावनाओं को समझने का है, जिसे समाज एवं कहीं न कहीं न्यायपालिका तक ने पहले से ही दोषी ठहराकर रखा हुआ है।

