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मै ही मै अहंकार?

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शशिकांत गुप्ते

एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति!*
अर्थात् एक मैं ही हूं दूसरा सब मिथ्या है। न मेरे जैसा कभी कोई आया न आ सकेगा।
उक्त श्लोक और उसका अर्थ अहंकार को इंगित नहीं करता है बल्कि यथार्थ को प्रकट करता है। उक्त श्लोक का उच्चारण करने से व्यक्ति में आत्मविश्वास का बोध होता है। ऐसा कुछ धार्मिक अस्थावन लोगों का मत है।
इस मुद्दे पर सीतारामजी का मत भिन्न है। सीतारामजी के विचार में भिन्नता होना स्वाभाविक भी है। कारण सीतारामजी व्यंग्यकार हैं।
सीतारामजी के मतानुसार उक्त श्लोक के भावार्थ में अहंकार झलकता है।
झलक शब्द में स्वस्तुति का बोध होता है।
स्वतुती मतलब अपने मुँह मिया मिट्ठू बनना है। इसका सीधा सा अर्थ है, अहंकार?
झलक शब्द के पर्यायवाची शब्द है चमक,प्रभा,आभास (Glance). चमक शब्द से तात्पर्य है। कृतिम श्रृंगार करना।
मतलब खंडहर पर कीमती मुलम्मा चढ़ाकर रंग,रोगन कर, खंडहर की वास्तविकता को ढाँकने का प्रयास करना है।
इसका सीधा अर्थ है, कुरूपता को ढाँकने के लिए आवरण ओढ़ना।
ऐसा कृतिम आवरण कुछ ही समय में ख़िर जाता है। मतलब मुलम्मे का क्षरण होता है।
मुलम्मे का क्षरण होते ही खंडहर की वास्तविक दुर्दशा,बदसूरती,
कुरूपता,और बेढंगा रूप साफ साफ दिखाई देने लगता है।
अहंकार,तानाशाही प्रवृत्ति का पोषक है।
इतिहास साक्षी है,प्रत्येक तानाशाह अपने आसपास खुशामदी लोगों को ही पसंद करता है। खुशामदी लोग स्वामिभक्ति का परिचय देतें हैं।तानाशाह के हरएक कार्य की सिर्फ प्रसंशा ही करतें हैं। भलेही वह कार्य जनविरोधी ही क्यों न हो? कारण तानाशाह से जन कल्याण के कार्य की उम्मीद करना ही व्यर्थ है?
सीतारामजी ने निम्न कहावत के माध्यम से एक संदेश प्रकट करते हुए अपने वक्तव्य को यहीं पूर्ण विराम दिया।
अंहकार में तीनों गए धन, वैभव और वंश
ना मानो तो देख लो, रावण, कौरव, कंस।।;
सीतारामजी ने अंत में कहा समझदार को इशारा काफी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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