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जो काटे हैं शम्बूक का सर !जो करे सीता का निष्कासन ! ऐसे राज को मैं नहीं मानता !

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जो काटे हैं शम्बूक का सर !
जो चुराए हैं गोपियों के वसन !
जो करे है सीता का निष्कासन !
जो कराये है कुरुक्षेत्र में अपनों के सर कलम !
ऐसे भगवान को, ऐसे कृष्ण राज को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता !

करता है जो निर्दोषों के कत्ल !
भरता है जो जहनों में जहर !
जलाता है जो बेगुनाहों के घर !
ढहाता है जो बेकसूरों पै कहर !
ऐसे तालिबां राज को,ऐसे रामराज को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता !

जो करता है इजाफा अदावत में !
जो घोले हैं रिश्वत अदालत -में !
जो मनाए हैं खुशियां गिरावट में !
जो घोले हैं जहर मुस्कुराहट -में !
जो ढूढ़े हैं अवसर,आपदा में,मौत में !
ऐसे दुष्कर्म को ,ऐसे पाप कर्म को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता !

हड़पती है जो दूसरों के हक !
करती है जो अपनों पर ही शक !
जहां इंसान में हो शैतान की झलक !
जो पाले है सितम, करती है जुलम !
ऐसी विकृति को, ऐसी संस्कृति को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता !

नारों में जिनके दहशत है !
कामों में जिनके वहशत है !
मक्कारी में जिनकी नफासत है !
छल कपट ही जिनकी सियासत है !
ऐसी सियासत को, ऐसी विरासत को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता !

       मुनेश त्यागी, वरिष्ठ अधिवक्ता,मेरठ सिविल कोर्ट मेरठ,संपर्क-9837151641   
     संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण ‘,मोबाईल नम्बर 9910629632
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