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*मैं योगिनी अनघा*

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      प्रस्तुति : बबिता यादव

मेरा मन आज भी उस पल को याद करके थरथराता है, जब मैं अपनी कुटिया के बाहर खड़ी थी, गंगा के किनारे, और मेरी आँखों से आँसुओं की धारा चुपके से बह रही थी। 

      मेरा नाम अनघा है, हरिद्वार की रहने वाली, और एक योगिनी बनने का सपना देखने वाली। मेरी ज़िंदगी हरिद्वार की पवित्रता और मेरे ध्यान से सजी है—सुबह की योग साधना, घर में माँ के साथ हर की पौड़ी की तैयारियाँ, और मेरी सादी साड़ी में प्रजा की शांति।

     मैंने अपनी गुरु से ध्यानयोग सीखा, क्योंकि मुझे लगता था कि शांति मेरी आत्मा है। मेरा सपना था कि मैं अपनी साधना से लोगों को सुकून दूँ, लेकिन चिंता और दबाव ने मुझे एक गलती करवा दी, जिसने मेरी ज़िंदगी को हिला दिया।

    ये मेरी कहानी है—चिंता, पछतावा, और वो सबक जो मुझे मेरी जड़ों और अपने आपको फिर से सिखाया।

       मैं एक समर्पित योगिनी थी, जिसके सत्रों में लोग शांति पाते थे। लेकिन एक दिन, मेरे सत्रों की लोकप्रियता बढ़ी, और मुझ पर दबाव डाला गया, “अनघा, और बड़े आयोजन करो, वरना लोग तुझे भूल जाएँगे।” 

   मेरे परिवार ने भी कहा, “अगर तू नहीं बढ़ेगी, तो हमारा सम्मान कम होगा।” मैंने अपनी शांति को भुलाकर, जो कहती थी कि साधना में संतुलन है, बड़े-बड़े आयोजनों में भाग लेना शुरू कर दिया।

    गलती हुई, और मेरी चिंता बढ़ गई—रातों की नींद गायब हो गई, और मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। मेरा आत्मविश्वास कमजोर पड़ गया। मेरी ज़िंदगी में एक अशांति आ गई, जहाँ मैं हर दिन अपनी चिंता से जूझती थी।

    उस चिंता भरे वक्त में मैंने अपनी साधना को फिर से अपनाया, छोटे-छोटे सत्र शुरू किए. मैंने एक ध्यानालाय बनाया, जहाँ मैंने स्त्रियों को ध्यानयोग सिखाना शुरू किया। देसी-विदेशी उन लड़कियों-महिलाओं को जो पूज्यवर डॉ. मानव से संतुष्टि लेने आती थी. वे मेरे बने और मैंने अपनी नज़रों में फिर से गर्व कमाया। इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि चिंता से अपनी जिंदगी को मत खोओ। 

    मैंने सीखा कि हर फैसले से पहले सोचना ज़रूरी है—”क्या ये मेरी शांति के लिए सही है? क्या ये मेरे अपनों को खुश करेगा?” और सबसे बड़ी बात, मैंने सीखा कि धैर्य और मेहनत से हर अशांति को शांति में बदला जा सकता है।

    आज मैं वही अनघा हूँ—जो अपनी साड़ी में, अपनी साधना और संस्कृति के साथ, लोगों को सुकून देना चाहती हूँ। मेरी गलती मुझे परिभाषित नहीं करती। मेरी मेहनत, मेरा हौसला, और मेरी जड़ें मुझे बनाती हैं। 

   मैं आप सबसे, खासकर उन योगियों से जो चिंता से लड़ना चाहते हैं, यही कहना चाहती हूँ—अपनी जड़ों को गर्व से अपनाओ। अपने दिल की सुनो, अपनी शांति और परिवार को पहले रखो। 

   चिंता तुम्हें तोड़ सकती है, लेकिन एक शांत कदम तुम्हें जोड़ सकता है। फिर भी, तुममें इतनी ताकत है कि तुम फिर से चमक सको।

    तो रुकिए, सोचिए, और अपनी जड़ों के साथ सही रास्ता चुनिए। क्योंकि तुम वो सम्मान और ज़िंदगी डिज़र्व करती हो जो तुम्हारे लिए सच्ची हो।

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