
आशीष तेलंग
मारे और सत्य के बीच में सबसे बड़ा रोड़ा विचारधारा या आइडियोलॉजी होती है चाहे कोई भी हो- वामपंथ, दक्षिणपंथ, समाजवाद, साम्यवाद, राष्ट्रवाद, ब्राह्मणवाद, अम्बेडकरवाद, कोई भी।
इन सबके चिन्तक एक समय के बाद इन्हीं के ग़ुलाम हो जाते हैं और फिर सत्य से ज्यादा इन्हें अपनी विचारधारा प्यारी हो जाती है। विचारधारा ही इनका जीवन हो जाती है।
किसी भी तरह की विचारधारा से ग्रसित होना तो एक बीमारी है और इससे बचना चाहिये, पर लोग इसके मोह में पड़ कर इसे मैडल जैसे गले में लटकाए घूमते फिरते हैं। इन्हीं बीमार लोगों से प्राकृतिक न्याय और इंसानियत को सर्वाधिक क्षति पंहुची है।
दूसरी तरफ, जिन भी लोगों ने इंसानियत को एक ऊंचाई दी, मानव यात्रा में नए माइलस्टोन दिये वे सब विचारधारा मुक्त थे। मार्क्स मार्क्सवादी नहीं थे, अम्बेडकर अम्बेडकरवादी नहीं थे, गांधी गांधीवादी नहीं थे और ना ही बुद्ध बौद्धवादी। ये सब अपनी समझदारी और अपनी कॉमन सेंस पर चलने वाले लोग थे। इसीलिए जो देखा, समझा, जाना वही कहा।
सत्य या तथ्य किसी भी एक विचारधारा का गुलाम नहीं होता। वो पत्थर की तरह निर्जीव भी नहीं होता कि एक ही जगह पड़ा रहे। वो तो जीवंत होता है, पल पल बदलता है और चंचल हिरन की तरह कभी इस विचारधारा कभी उस विचारधारा में छलांग लगाता रहता है। यदि उसको पाना है तो हमें भी प्रतिपल उसी की तरह बदलना पड़ेगा।
जब कील ठोकनी हो तो हथौड़ा काम में लाया जाता है, पर उसी कील को निकालने के लिए हथौड़ा नहीं, प्लायर काम में लाया जाता है।हर औज़ार का अपना प्रयोग होता है और किसका प्रयोग कहाँ करना है वो आपकी कॉमन सेंस बताती है।
इसी तरह विचारधारा का भी एक टूल या औज़ार जैसा ही प्रयोग करना चाहिए जब जैसी ज़रूरत पड़े। उसका उतना ही महत्व है, इससे ज़्यादा नहीं।
समझदार इंसान हमेशा कॉमन सेंस पर चलता है और सारी विचारधाराएं उसके औज़ार हैं, उसका जीवन नहीं।
इसीलिए जब ज्ञानवापी और ताजमहल जैसे मुद्दे एक साथ आ जाते हैं तो दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनो ही फंस जाते हैं क्योंकि यहां पर तो फैक्ट एक जगह उनकी विचारधारा के अनुरूप है और दूसरी जगह विरुद्ध।
वहीं, कॉमन सेंस पर चलने वाले को यहां दो पालों में खड़े होने से भी कोई दिक्कत नहीं होती। वो तो वहीं खड़ा रहेगा जहां उसे तथ्य दिखाई देगा।
आशीष तेलंग