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*लोग मरते हैं तो मरते रहें? रुद्राक्ष में पुण्य की तलाश

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वीरेंद्र नानावटी

#हजा़रोंबरसों के पाखंड ने हमारी न केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को लहूलुहान कर  दिया… अपितु पाखंड के इन्हीं पोखरों ने सालों तक लूले-लंगड़े राजनैतिक नेतृत्व और भ्रष्ट नौकरशाही को अपनी क़ोख से जन्म दिया…!#हमारी प्राणग्रंथियों में वो हार्मोन ही ग़ायब हैं, जो #ज्ञान और #मेधा को उत्सर्जित कर सकें!

#पाखंड के पोखर में एक डुबकी और मोक्ष

की प्राप्ति…! परीक्षा की एक डुबकी और सफ़ेदपोश स्वर्ग की माल देने वाली कुर्सी…!

#चापलूसी के पोखर में एक डुबकी और सत्ता सुन्दरी का आलिंगन!!#चुनाव की एक डुबकी से लोकतंत्र को हथियाने का हुनर..!

#योग्यता की ऐसी-तैसी..!भाड़ में जाए..!!

जब दो कौड़ी के लोगों से काम चल रहा है.. तो फिर क़ाबिलों की तलाश में वक़्त ज़ाया क्यों करें..??

२..#हिन्दुत्व  सदियों की सांस्कृतिक विरासत है! ज्ञान और आध्यात्म का शिलालेख है…!!

लेकिन पाखंडियों ने कैसे इसे बाजाऱ का फ़रेब बना दिया… !

पुण्य बांटने वाली एजेंसियों और स्टाकिस्टों के कथित पाखंड के लिहाज से,

*****जो सुख धन बरसाने वाले वचनों और प्रवचनों में है…. वो तुच्छ सेवाओं में कहां है???

जो आनंद कथाओं और धार्मिक तिलस्मी बाज़ीगरी में है….वो वेदना के घावों के उपचारों में कहां है???

 सीधे ईश्वर से साक्षात्कार! डायरेक्ट डाइलिंग!!

ये ईश्वरीय भक्ति अनाथालयों, वृध्दाश्रमों, चिकित्सा सेवाओं में कहां है?.

#कबीर आज होते तो पुण्य की कमाई में लगे धन कमाने के अतृप्त अवतारों और कथित अवधूतों पर ये चुटिला प्रहार और तिलमिला देने वाला व्यंग्य ज़रूर करते!

#बरसों की बौद्धिक छटपटाहट के साथ ये सुलगते सवाल आज भी कायम है…हम कब तक  प्रवचनों के झाँसों, पुण्य लुटाने वाली करोड़ों की कमाई से निकले कथाओं के तमाशों और अकूत धन की लूट के लिए फेकें गए कथित आश्रमों के नये बाज़ारवाद के पाँसों की ठगी के शिकार होते रहेंगें! दुर्भाग्य से हमारे कथित महान नेता हर चुनावों में इन  दुकानी बाबाओं,हताश हवनबाज़ों और कर्मकांड के आसमां से टपके अवधूतों को महिमामंडित करने का घोर पाप करते रहे हैं… बजाय उन्हें हतोत्साहित करने के!लोकतांत्रिक मूल्यों और मुद्दों का ऐसा ढ़ोंगी, अधकचरा आध्यात्मिक तिलस्म शायद ही दुनिया में देखने को मिले! ऐसे छद्म आध्यात्म प्रबंधन का सबसे घिनौना चेहरा है इस किस्म के संतों का मार्केटिंग फ़रेब और इस फ़रेब को सियासी परवान चढ़ाता निकृष्ट और दो कौड़ी का राजनैतिक नेतृत्व। जो कौम एक डुबकी लगाकर मोक्ष चाहती हो..तीन घंटे की परीक्षाओं के बाद सफेदपोश स्वर्ग की कुर्सी हथियाना चाहती हो…लुटियन बाबाओं के आश्रमों में जाकर पुण्य बटोरना चाहती हो..उस कौम की प्राणग्रंथियों में वो हार्मोन ही  नदारत हैं जो उसे ज्ञान, शोध और अनुसंधान की गहराइयों में डुबकी लगाने का जज़्बा दे सके। इसीलिये हमारे शंकराचार्य और कथित महामंडलेश्वर भी हिन्दुत्व के इसी चलन/आचरण के पैरोकार बने हुए हैं। सैय्यूओं,निराशारामों,कामपालों, अरामरहीमों,अनित्यानंदों और कितने, गोदीमाँ,…अनिर्मल बाबाओं, दीक्षितों..अदातीमहाराजों,और हजारों महान अवतारियों से आध्यात्म का जो बाज़ार अटा पड़ा हो…वहाँ ज्ञान की खोज़ गटर में डुबकी लगाने जैसा है। फ़रेब का ये तिलस्म भी धुआंधार मार्केटिंग पर दौड़ रहा है। क्योंकि ज्ञान की नदियाँ सूख चुकी है… और आध्यात्म की इन गटरों में सुख के मोती पाने की सनातन वज्र मूर्खताएँ जारी है..।

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