शशिकांत गुप्ते
दो हजार का नोट बहुत महत्वपूर्ण है। जब यह नोट प्रचलन में आने वाला था। तब एक चैनल ने तो डरा ही दिया था।
चैनल ने दो हजार के नोट में छीपी हुई एक ऐसी नैनो चिप बताई थी। इस नैनो चिप के कारण यदि दो हजार का नोट ज़मीन में भी कोई गाड़ दे। तो भी पकड़ा जाएगा। इस फेक न्यूज के प्रसारण के पीछे उक्त समाचार माध्यम का आशय यह था कि, नोटबंदी के बाद देश में कोई भी व्यक्ति काला धन जमा कर ही नहीं पाएगा?
वास्तव में जब दो हजार का नोट जारी हुआ, तब पंद्रह लाख प्रति व्यक्ति, दो करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष, और महंगाई की मार से बचाने वाले जुमलों की तरह सारी भ्रांतियां दूर हो गई।
आज दो हजार के नोट धीरे धीरे बाजार से नदारद हो रहें हैं। दो हजार के नोट प्रचलन में दिखाई नहीं दे रहें हैं।
इस मुद्दे पर बहस निर्रथक है।
वैसे इनदिनों किसी भी अहम मुद्दे पर बहस का कोई औचित्य ही नहीं रहा है। कुछ एक समाचार माध्यमों को छोड़ शेष माध्यम मुख्यमुद्दो पर पक्षपात ही नहीं करतें हैं,बल्कि एक ही पक्ष के समर्थक की भूमिका अदा करते हुए दिखाई देतें हैं।
अहम मुद्दा तो यह है कि, दो हजार की क़ीमत क्या है?
इस साधारण प्रश्न का जवाब यही हो सकता है कि, दो हजार का मतलब दो सौ रुपये के दस नोट। या सौ रुपये के बीस नोट।
हाँ यह सही जवाब है। यह कोई कौन बनेगा “करोड़पति” का प्रश्न नहीं है? ना ही कोई द्यूत क्रीड़ा का खेल है।
सवाल है दो हजार का क्या महत्व?
यह प्रश्न सीधे सीधे सियासी है?
सियासी होने का कारण है, चुनावी चंदे से संबंधित है?
कोई व्यक्ति चुनावों में सिर्फ दो हजार रुपयों का चंदा देने की औक़ात रखता है। वह देश का सबसे प्रामाणिक व्यक्ति माना जाएगा?
ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति को चुनावी चंदा देने के बाद अपनी स्वयं की सम्पूर्ण जानकारी देना अनिवार्य है। और जो कोई दो हजार से अधिक या करोड़ों का इलेट्रोल बांड खरीदने की क्षमता रखता उसे किसी प्रकार की कोई जानकारी देना अनिवार्य नहीं है।
दो हजार रुपयों तक का चुनावी चंदा देने वाला व्यक्ति स्वयं को गौरवांवित समझतें हुए। किसी शायर द्वारा रचित इस शेर को याद करता है।
यहाँ झूठों को तमगे बांटे जा रहें हैं
मै सच्चा हूँ तो परखा जाता हूँ
उक्त शेर ही याद करने का कारण बहुत ही व्यवहारिक है? आमजन जब बाजार से पच्चीस किलों तक का खाद्य पदार्थ पैकिंग में खरीदेगा तो उसे जीएसटी देना पड़ेगी। और जो पच्चीस किलों से ज्यादा खरीदने की क्षमता रखता है,तो वह कर मुक्त होगा।
इनदिनों सब मुमकिन है। होना भी चाहिए। कारण विकास,विश्वास के साथ गलबहियां जो कर रहा है। यकीन ना हो तो समाचार पत्रों में विशालकाय विज्ञापनों को देख लो। विज्ञापनों में ही सब कुछ उपलब्ध है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

