-तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा केवल राजनीतिक स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और न्याय में निहित है। 15 अगस्त 1947 को देश ने राजनीतिक गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ दीं, लेकिन सामाजिक गुलामी की जंजीरें अब भी भारतीय समाज को जकड़े हुई थीं। जाति-आधारित भेदभाव, अस्पृश्यता और ऊँच-नीच की मानसिकता उस स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी चुनौती बनी रही, जिसे संविधान के प्रावधानों ने सामने से स्वीकार किया।
इसी ऐतिहासिक संदर्भ में जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण की अवधारणा प्रस्तुत की, तो वह केवल कुछ सीटों या नौकरियों के लिए नहीं था। यह उन वंचित और शोषित वर्गों को सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास देने की एक क्रांतिकारी पहल थी, जिन्हें हजारों वर्षों तक शिक्षा, संपत्ति, मंदिर, कुएँ, और यहाँ तक कि छाया तक से वंचित रखा गया था। अंबेडकर ने साफ़ कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है, यदि वह सामाजिक और आर्थिक न्याय में परिणत न हो।
लेकिन विडंबना यह है कि स्वतंत्रता के 78 वर्ष बाद भी आरक्षण और अंबेडकर को लेकर भ्रम, विकृति और षड्यंत्र गहराई तक समाज में व्याप्त हैं। “आरक्षण सिर्फ़ दस साल का था” जैसी अर्धसत्य बातें, या “आरक्षण योग्यता का अपमान है” जैसे तर्क, केवल सामाजिक न्याय को कमजोर करने के औजार हैं। वहीं अंबेडकर का 1951 में दिया गया त्यागपत्र इस बात का प्रतीक है कि सत्ता-संचालक वर्ग सामाजिक सुधार के लिए कभी उतना गंभीर नहीं रहा, जितना उसे होना चाहिए था।
अतः यह आवश्यक है कि हम आरक्षण और अंबेडकर के त्यागपत्र का पुनर्पाठ करें—ऐतिहासिक दृष्टि से, संवैधानिक दृष्टि से और समकालीन संदर्भ में भी। क्योंकि यह विमर्श केवल अतीत का विश्लेषण नहीं है, बल्कि आज के भारत की आत्मा और उसके भविष्य की दिशा तय करने वाला प्रश्न है।
आरक्षण की सच्चाई और अंबेडकर का त्यागपत्र: एक ऐतिहासिक और समकालीन पुनर्पाठ:
भारत में सामाजिक न्याय की परिकल्पना किसी दया, भीख या दंड की उपज नहीं है। यह उस ऐतिहासिक अन्याय की प्रतिक्रिया है, जो हज़ारों वर्षों तक चली सामाजिक असमानता और जातिगत उत्पीड़न का परिणाम रही है। इस पृष्ठभूमि में जब संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण की अवधारणा प्रस्तुत की, तो उसका उद्देश्य केवल सरकारी नौकरियों या शैक्षणिक संस्थानों में सीट सुरक्षित करना नहीं था। यह उस सामाजिक सेतु का निर्माण था जो एक असमान समाज को समता की ओर ले जाने वाला मार्ग बन सके।
भारत का संविधान उस ऐतिहासिक चेतना का परिणाम है, जो सदियों से शोषित, वंचित और बहिष्कृत समाज की मुक्ति की आकांक्षा में जन्मी थी। जब देश 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, तब राजनीतिक आज़ादी तो मिली, परंतु सामाजिक समानता का सपना अब भी दूर था। जातिगत भेदभाव, सामाजिक ऊँच-नीच और वर्चस्ववादी मानसिकता उस भारत की नींव में गहराई तक धँसी हुई थी, जो खुद को ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ कहने को तैयार था।
इस परिस्थिति में, डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण की प्रक्रिया के माध्यम से एक क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रयास किया — उन्होंने भारत को केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, एक सामाजिक नैतिक राष्ट्र बनाने की आधारशिला रखी। आरक्षण उसी क्रांति का उपकरण था — समानता की ओर उठाया गया एक ठोस, संवैधानिक कदम।
लेकिन स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी आरक्षण और अंबेडकर को लेकर समाज का एक बड़ा हिस्सा या तो अनभिज्ञ है या जानबूझकर विकृत धारणाओं से ग्रसित है। “आरक्षण सिर्फ़ 10 साल के लिए था,” जैसे वाक्य, सुनने में मासूम लग सकते हैं, पर वे एक गहरी साज़िश का हिस्सा हैं, जो इस देश के सबसे बड़े सुधारक और उनके विचारों को निष्क्रिय करने की कोशिश करते हैं। यह निबंध एक प्रयास है — उस भ्रम, विडंबना और षड्यंत्र को उजागर करने का, जो आरक्षण और अंबेडकर के त्यागपत्र के इर्द-गिर्द बुना गया है। यह सिर्फ़ अतीत की बात नहीं, यह आज के भारत की आत्मा की लड़ाई है।
भारत का संविधान केवल एक राजनीतिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह एक जीवित सामाजिक क्रांति की अभिव्यक्ति है। इसका उद्देश्य केवल सत्ता-संरचना का निर्माण करना नहीं था, बल्कि एक ऐसे समाज की नींव रखना था जिसमें “मनुष्य मात्र” का सम्मान हो, और जाति, लिंग, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी का अपमान न हो। इस दृष्टि से संविधान निर्माण की प्रक्रिया स्वयं एक सामाजिक आंदोलन थी, जिसकी धुरी पर खड़े थे डॉ. भीमराव अंबेडकर।
सदियों तक भारत की जाति-व्यवस्था ने करोड़ों लोगों को शिक्षा, संपत्ति, सम्मान और अवसर से वंचित रखा। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कठोर अनुशासन में “अस्पृश्य” कहे जाने वाले लोग मनुष्य तक नहीं माने जाते थे। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जब अंबेडकर ने आरक्षण की परिकल्पना की, तो यह किसी दया का परिणाम नहीं था, बल्कि उस सामाजिक अन्याय की भरपाई थी, जो भारतीय सभ्यता के भीतर सबसे बड़ी अमानवीयता के रूप में खड़ा था। आज जब हम “आरक्षण” और “अंबेडकर के त्यागपत्र” पर चर्चा करते हैं, तो यह केवल अतीत की घटनाओं का विश्लेषण नहीं है, बल्कि यह वर्तमान भारतीय समाज की गहरी जड़ों को देखने का प्रयास भी है।
1. “आरक्षण सिर्फ़ 10 साल के लिए था” — इस एक मिथ्या वाक्य है:
अक्सर कहा जाता है कि आरक्षण सिर्फ़ 10 वर्षों के लिए था। यह वाक्य संविधान के अनुच्छेद 334 के संदर्भ में कहा जाता है, जो संसद और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण (संसदीय सीटें) की समयसीमा को निर्दिष्ट करता है। यह समय सीमा हर दस वर्षों में संसद द्वारा बढ़ाई जाती रही है। लेकिन शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण का समय-सीमा से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। डॉ. अंबेडकर ने स्वयं कहा था कि —“जाति जब तक रहेगी, तब तक आरक्षण की आवश्यकता रहेगी।” अतः जब जातीय भेदभाव का अंत नहीं हुआ, तो आरक्षण को समाप्त करने की बात कैसे की जा सकती है?
संविधान और आरक्षण का संवैधानिक ढाँचा: भारत के संविधान में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था की गई।
· अनुच्छेद 15(4): शैक्षणिक संस्थानों में विशेष प्रावधान
· अनुच्छेद 16(4): नौकरियों में आरक्षण
· अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन
· अनुच्छेद 46: सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए राज्य का विशेष उत्तरदायित्व
· अनुच्छेद 334: संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की समयसीमा (जिसे हर दस साल में बढ़ाया गया)
इससे स्पष्ट है कि “सिर्फ़ 10 साल के लिए आरक्षण” वाली धारणा एक अर्धसत्य है। वास्तव में 10 साल की सीमा केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व (सीट आरक्षण) के लिए थी, जबकि नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की समयसीमा नहीं थी।
2. अंबेडकर का त्यागपत्र: एक प्रतीकात्मक विद्रोह:
1951 में अंबेडकर ने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह केवल एक व्यक्ति का इस्तीफा नहीं था, बल्कि एक वैचारिक विस्फोट था। उनका मुख्य आक्रोश यह था कि हिंदू कोड बिल, जिसे वे स्त्रियों को समान अधिकार देने वाला ऐतिहासिक कदम मानते थे, उसे संसद में पास करने की इच्छाशक्ति सत्ताधारी वर्ग में नहीं थी। अंबेडकर का मानना था कि अगर महिलाओं को संपत्ति और विवाह में बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया, तो संविधान का “समानता का सिद्धांत” अधूरा रह जाएगा। त्यागपत्र देते हुए उन्होंने कहा — “मैं उस सरकार में नहीं रह सकता जो सामाजिक सुधार के लिए आवश्यक साहस नहीं दिखा सकती।” यह इस्तीफा एक चेतावनी थी — कि अगर सत्ता सामाजिक न्याय को दरकिनार करेगी, तो संविधान केवल कागज़ का टुकड़ा बनकर रह जाएगा।
1951 में जब डॉ. अंबेडकर ने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दिया, तो यह सिर्फ़ एक सरकारी कुर्सी छोड़ने का निर्णय नहीं था। यह उस आंतरिक पीड़ा का सार्वजनिक उद्घोष था, जिसमें संविधान निर्माता को यह महसूस हुआ कि जिन उद्देश्यों से उन्होंने संविधान में समानता, स्वतंत्रता और बंधुता के मूल्यों को गढ़ा था, उन्हीं उद्देश्यों को सत्ताधारी वर्ग ने तिलांजलि दे दी है। उन्होंने कहा था–“मैं ऐसे किसी सरकार में नहीं रह सकता, जो हिंदू कोड बिल तक लाने की इच्छाशक्ति न रखे — जो भारत की महिलाओं को बराबरी देने वाला पहला क्रांतिकारी कदम था।” अंबेडकर का त्यागपत्र अपने साथ सामाजिक चेतना का वह दस्तावेज लेकर आया, जिसे आज भी जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है।
3. विरोध की राजनीति: अंबेडकर और आरक्षण के विरुद्ध साज़िशें:
आरक्षण के विरोध में जो स्वर उठते हैं, वे अक्सर “योग्यता” की आड़ में छिपे जातिगत पूर्वाग्रह होते हैं। जो लोग कहते हैं कि “मेहनत से सब कुछ संभव है”, वे यह भूल जाते हैं कि सदियों की सामाजिक गुलामी केवल किताबें पढ़ने से समाप्त नहीं होती। अगर एक दलित बच्चा UPSC में टॉप करता है, तो कहा जाता है — “आरक्षण से आया होगा।” लेकिन अगर वही बच्चा नौकरी के लिए दर-दर भटकता है, तो कोई नहीं पूछता — “क्यों नहीं मिला उसे मौक़ा?” यह विरोध नहीं, बल्कि गहरी नफरत है — वह नफ़रत जो बाबासाहेब के विचारों से, दलितों के आत्मसम्मान से और संविधान की समता की भावना से जलती है।
4. आरक्षण पर झूठा विमर्श: मीडिया, समाज और सत्ताधारी वर्ग की भूमिका :
आज का मीडिया और सत्ता तंत्र एक सोची-समझी रणनीति के तहत यह प्रचार करता है कि आरक्षण देश के विकास में बाधा है। यह सच नहीं है। देश में डॉक्टरों की कमी, शिक्षकों की अनुपस्थिति, भ्रष्टाचार, और पूंजीवादी शोषण — ये सभी आरक्षण से नहीं, बल्कि निष्क्रियता, जातिवाद और पूंजी केंद्रित नीति निर्माण से उपजे हैं। जब सामान्य वर्ग का कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार में पकड़ा जाता है, तो दोष “व्यवस्था” का होता है। लेकिन जब कोई दलित अधिकारी आगे बढ़ता है, तो शक उस पर नहीं, उसकी जाति पर किया जाता है।
1932 का पूना पैक्ट भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था। ब्रिटिश सरकार ने डॉ. अंबेडकर को “डिप्रेस्ड क्लासेज़” के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) का अधिकार दिया था। लेकिन गांधीजी ने इसका विरोध किया और “आमरण अनशन” किया। अंततः समझौते के रूप में पूना पैक्ट हुआ, जिसके तहत पृथक निर्वाचक मंडल तो समाप्त हुआ, पर अनुसूचित जातियों के लिए विधायिकाओं में आरक्षित सीटों की गारंटी दी गई। यहीं से “आरक्षण” केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक न्याय के बड़े विमर्श का हिस्सा बना। अंबेडकर ने स्पष्ट कर दिया था कि — “राजनीतिक शक्ति के बिना कोई भी समुदाय सामाजिक मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।”
आज भी मीडिया अक्सर यह प्रचार करता है कि आरक्षण “देश के विकास में बाधा” है। UPSC, IIT या मेडिकल कॉलेज में किसी दलित-पिछड़े छात्र की सफलता को उसकी मेहनत नहीं, बल्कि “आरक्षण का लाभ” बताकर छोटा किया जाता है। इसी प्रकार, दलित अधिकारियों या न्यायाधीशों पर उनके निर्णयों को “जातिवादी” बताकर सवाल उठाए जाते हैं। परंतु जब ऊँची जातियों के लोग अपने नेटवर्क, पूंजी और रिश्तेदारी से आगे बढ़ते हैं, तो उसे “मेहनत और प्रतिभा” कहा जाता है।
5. सोच की गंदगी: असली समस्या आरक्षण नहीं, जातिवाद है:
जाति व्यवस्था: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक अन्याय: इस देश में जाति पूछना सामान्य है, लेकिन योग्यता का सम्मान जाति देखकर तय किया जाता है। इंटरव्यू बोर्ड में बैठे लोग अक्सर मुस्कान के पीछे छिपा भेदभाव करते हैं। दलित लड़कियाँ अगर IAS बनती हैं, तो उन्हें सोशल मीडिया पर गालियाँ दी जाती हैं — “ये कुर्सी तुम्हें नहीं, तुम्हारी जाति को मिली है।”सवाल यह नहीं है कि आरक्षण कब तक चलेगा, सवाल यह है कि जातिवादी मानसिकता कब बदलेगी?
:भारतीय समाज का सबसे पुराना और सबसे स्थायी संकट जाति व्यवस्था है। वर्णाश्रम धर्म से शुरू हुई यह व्यवस्था धीरे-धीरे जन्माधारित जातियों में बदल गई। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की व्यवस्था ने समाज को एक असमान पिरामिड में बाँट दिया। सबसे निचले पायदान पर शूद्र और “अस्पृश्य” कहे जाने वाले लोग थे, जिन्हें शिक्षा, भूमि और सम्मान से वंचित रखा गया। मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने इस असमानता को “धार्मिक विधान” बना दिया। यह केवल सामाजिक बहिष्कार नहीं था, बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर दलितों और पिछड़ों का शोषण था। अंबेडकर ने इस व्यवस्था को “सांस्कृतिक गुलामी” कहा। उनका मानना था कि जाति केवल श्रम का बँटवारा नहीं, बल्कि श्रमजीवियों का स्थायी दासत्व है।
6. मंडल आयोग और आरक्षण पर नई बहस
1979 में गठित मंडल आयोग ने पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की। 1990 में जब इसे लागू किया गया, तो पूरे देश में विरोध और आंदोलन हुए। आरक्षण विरोधी आंदोलनों ने दिखाया कि समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी जातिगत विशेषाधिकार छोड़ने को तैयार नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों में छात्रों ने आत्मदाह तक किया। विरोध का तर्क वही था — “आरक्षण योग्यता का अपमान है।” लेकिन यह भूल गया कि सदियों तक जाति विशेष ने योग्यता को अपने वर्चस्व का पर्याय बना रखा था।
7. अंबेडकर: इतिहास नहीं, अस्तित्व हैं:
डॉ. अंबेडकर ने संविधान लिखा — वही संविधान जिसने भारत को लोकतंत्र, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का रास्ता दिया। लेकिन यह कितना विडंबनापूर्ण है कि भारत के इस सबसे बड़े राष्ट्रनिर्माता को उसके जीवनकाल में ही नहीं, मृत्यु के बाद भी ग़लत समझा गया, बदनाम किया गया। उनकी किताबें स्कूलों से हटाईं गईं, विचारों को राजनीतिक दलों के वोट बैंक तक सीमित कर दिया गया। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि अंबेडकर कोई व्यक्ति नहीं, विचार की आग हैं। “अगर तुम नहीं जागे, तो तुम्हें झुकना पड़ेगा।”
डॉ. अंबेडकर ने चेताया था कि —“हमने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, पर जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं आती, तब तक यह स्वतंत्रता अधूरी है।” आज यह चेतावनी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। आरक्षण केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का माध्यम है। इसे खत्म करने की बात करना, दलित-पिछड़े-आदिवासी समाज की सदियों की पीड़ा को नकारना है। अगर भारत को वास्तव में महान बनना है, तो अंबेडकर को केवल मूर्तियों और जयंतियों तक सीमित नहीं करना होगा। उनके विचारों को शिक्षा, नीति और समाज की चेतना में उतारना होगा।
8. आरक्षण नहीं, जातिवादी सोच भारत को खोखला कर रही है:
Ø यह लड़ाई आरक्षण की नहीं, सोच की है। आरक्षण एक सामाजिक पुल है, जो सदियों पुराने उत्पीड़न और आज के संवैधानिक भारत के बीच खड़ा है। लेकिन जब तक यह समाज जाति देखकर सम्मान देगा, नाम पूछकर अवसर छीन लेगा, तब तक भारत कभी महान नहीं बन सकता। जो लोग अंबेडकर को “ब्रिटिश एजेंट” या “हिंदू विरोधी” कहते हैं, वे न केवल इतिहास से द्रोह कर रहे हैं, बल्कि करोड़ों दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के वर्तमान और भविष्य से भी। अब समय है, अंबेडकर को केवल मूर्तियों में नहीं, विचारों में ज़िंदा रखने का।
हम एक ऐसे समय में खड़े हैं, जहाँ संविधान की आत्मा और सामाजिक न्याय की मूल भावना दोनों पर बहुआयामी हमले हो रहे हैं। अंबेडकर के विचारों को “वोट बैंक की राजनीति” कहकर खारिज किया जा रहा है, और आरक्षण को देश के विकास में “बाधा” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह न केवल ऐतिहासिक रूप से ग़लत है, बल्कि यह नैतिक रूप से भी एक गंभीर अपराध है — उस सत्य के विरुद्ध, जिसने भारत को एक लोकतांत्रिक, समतामूलक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की आकांक्षा दी थी।
आरक्षण कोई कृपा नहीं है — यह उस ऐतिहासिक अन्याय की मान्यता है, जो जाति आधारित व्यवस्था ने भारत के करोड़ों लोगों के साथ किया। यह व्यवस्था की मरम्मत है, न कि किसी की योग्यता का अपमान। अगर देश में आज भी जातिवादी सोच जीवित है, तो आरक्षण की आवश्यकता और भी अधिक जीवंत और वैध है।
Ø अंबेडकर का व्यापक दृष्टिकोण: केवल आरक्षण नहीं, आर्थिक लोकतंत्र: अंबेडकर का दृष्टिकोण केवल आरक्षण तक सीमित नहीं था। वे आर्थिक लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि जब तक भूमि सुधार, उद्योगों में श्रमिकों के अधिकार और स्त्रियों की बराबरी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक सामाजिक समानता अधूरी है। यही कारण था कि उन्होंने हिंदू कोड बिल, मजदूर अधिकार, और राज्य के आर्थिक हस्तक्षेप की वकालत की। लेकिन यह सब उस समय की राजनीति के लिए बहुत “क्रांतिकारी” था, और उन्हें हाशिये पर धकेला गया।
Ø डॉ. अंबेडकर ने चेताया था कि —“हमने राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली है, पर जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं आती, तब तक यह स्वतंत्रता अधूरी है।” आज जब दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के बच्चे पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी बनकर विश्वविद्यालयों में पहुँचते हैं, या आईएएस जैसी परीक्षाओं को पास करते हैं, तब उनकी सफलता को आरक्षण का “उपकार” बताकर नीचा दिखाना, केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं — यह पूरे संविधान और उसमें निहित विचारधारा की अवमानना है। इसलिए, अगर हम सचमुच भारत को एक समतामूलक और महान राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हमें आरक्षण को संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं, सामाजिक पुनरुत्थान की क्रांति के रूप में देखना होगा। हमें अंबेडकर को केवल जयंती पर पुष्प अर्पण करने की औपचारिकता से ऊपर उठकर, उनके विचारों को अपने संघर्षों, नीतियों और जीवन में उतारना होगा। क्योंकि जब तक अंबेडकर ज़िंदा हैं — संविधान जिंदा है। जब तक संविधान ज़िंदा है — भारत में न्याय और समानता की आशा जिंदा है।
8. समकालीन संदर्भ: आरक्षण पर नए हमले:
आज जब निजी क्षेत्र (Private Sector) का विस्तार हो रहा है, तो वहाँ आरक्षण लागू नहीं है। इसका परिणाम यह है कि सरकारी क्षेत्र में भले ही कुछ अवसर मिले हों, पर निजी क्षेत्र में दलित-पिछड़े फिर से हाशिये पर हैं। इसके अलावा, 2019 में “आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग” (EWS) के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया। यह पहली बार था जब आरक्षण जातिगत भेदभाव के बजाय आर्थिक आधार पर दिया गया। आलोचकों का मानना है कि यह दलित-पिछड़े आरक्षण को कमजोर करने और “सामान्य वर्ग” की नाराजगी शांत करने का कदम था। आरक्षण को दोष देने से पहले हमें समझना होगा कि असली समस्या जातिवाद है। जब तक इंटरव्यू बोर्ड जाति देखकर मुस्कुराएगा, जब तक दफ्तरों में दलित अधिकारियों को तिरस्कार झेलना पड़ेगा, जब तक दलित IAS अधिकारियों की बेटियों को “आरक्षण की बेटी” कहकर गाली दी जाएगी — तब तक भारत समान नहीं हो सकता।
साराशत: डॉ. अंबेडकर ने जिस भारत की कल्पना की थी, वह केवल कागज़ी आजादी से संतुष्ट नहीं था। वह एक ऐसा राष्ट्र था, जहाँ हर नागरिक समान अवसर पाए, जहाँ किसी का मूल्यांकन उसकी जाति, धर्म या लिंग से नहीं

