शशिकांत गुप्ते
परिवर्तन संसार का नियम है।परिवर्तन शब्द का गहन अर्थ है।
परिवर्तनकारी ही क्रांतिकारी होतें हैं।सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाले जितने भी महापुरुष और स्त्रियां हुई वे सभी परिवर्तन की पक्षधर थी।
महात्मा गांधीजी ने भी समाज के कल्याण के लिए सुधारवादी तरीका नहीं अपनाया।गांधीजी ने समाज के कल्याण के लिए हमेशा परिवर्तनकारी तरीका ही अपनाया।
दुर्भाग्य से वर्तमान राजनीति परिवर्तन के विरोधी लोगों की भरमार नजर आ रही है।जो परिवर्तन के विरोधी होतें हैं, वे यथास्थितिवाद के समर्थक होतें हैं।
इन यथास्थितिवादियों में कुछ
जिधर बम उधर हम की मानसिकता के लोग कभी भी स्थिर नहीं रहतें हैं। वर्तमान में कुछ लोग इस कहावत को अप्रत्यक्ष रूप से चरितार्थ करने की पहल कर रहें हैं।
एक ओर पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचने के लिए पटाखें जलाने पर संयम बरतने की सलाह दी जा रही है। दूसरी ओर धार्मिक परंपरा का निर्वाह करने के लिए पटाखें जलाने का सिर्फ समर्थन किया जाता है,बल्कि प्रदूषण फैलाने के लिए लोगों को प्ररित किया जाता है।
दिल्ली दिल है हिंदुस्तान का ऐसा देश की राजधानी के लिए गर्व से कहा जाता है।बदकिस्मती से एक न्यूज का एंकर ही पटाखें जलाने का समर्थक करता है।और जो सजग प्रहरी प्रदूषण फैलाने का विरोध करतें हैं, उनकी आलोचना करता है।यही तो यथास्थितिवाद का प्रत्यक्ष लक्षण है।
आश्चर्य का मुद्दा तो यह है कि,यह सब इक्कसवीं सदी में हो रहा है।
परिवर्तन संसार का नियम है।इस सूक्ति का प्रयोग यथास्थितिवादी कहीं उल्टी दिशा में तो परिवर्तित करने साज़िश तो नहीं रच रहें हैं।
यदि ऐसा षडयंत्र रच भी रहें होंगे तब भी परिवर्तन निश्चित हो कर ही रहेगा।
महान लेखक, विचारक, चिंतक लियो टॉल्सटॉय की सूक्ति है।
हर कोई दुनिया को बदलने के बारे में सोचता है,लेकिन कोई भी खुद को बदलने के बारे में नहीं सोचता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

