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हँसिये निगले हैं तो तकलीफ तो होगी ही…

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हमारे प्रधान मन्त्री मोदी ने जिस दिन अमरीका में ‘फिर एक बार – ट्रम्प सरकार’ का नारा दिया था, उसी दिन से मैं दहशत में था। मुझे पक्का भरोसा था कि इस अनुचित, अनावश्यक आह्वान का जवाब हमें कभी न कभी झेलना ही पड़ेगा।  उस दिन मैंने अपने मित्रों से कहा था – ‘यह ठीक नहीं हुआ। मोदीजी को ऐसा नहीं करना चाहिए था।’ मेरे परिचितों, मित्रों, साथी एजेण्टों में मोदी समर्थकों की भरमार है। ये सब मेरे हितचिन्तक हैं। कुछ तो मेरे ‘संरक्षक’ की तरह मेरी चिन्ता और सहायता करते हैं। लेकिन मेरी इस बात पर सबने मुझे आड़े हाथों लिया था। कहा था कि मोदी दुनिया में भारत को इज्जत दिलवाने में लगे हैं और मैं हूँ कि उनकी इस ‘राष्ट्रसेवा’ को ‘अनुचित’ कह रहा हूँ। कुछ कृपालु तो कुछ दिनों तक मुझसे ‘अण्ठाए’ रहे। अबोला ले लिया। लेकिन बात-आई गई हो गई और धीरे-धीरे वे सबके सब पूर्ववत ही मुझ पर महरबान हो गए।
सन् 2007 से मैं ‘ब्लॉग’ की दुनिया में आया। तब से कुछ प्रवासी भारतीयों से सम्पर्क हुआ। अधिकांश से सम्पर्क टूट गया किन्तु अमरीका-आस्ट्रेलिया में रह रहे तीन ब्लॉगरों से अभी भी सम्पर्क बना हुआ है। यह संयोग ही है कि मोदी के इस आह्वान से ये तीनों के तीनों मुझसे सहमत थे। (शायद ‘हमखयाल’ होंगे।) इनका भी कहना था कि ट्रम्प से दोस्ती जताने के अतिरेकी उत्साह में मोदी ने यह ठीक नहीं किया। अमरीकी ब्लॉगर ने तो साफ-साफ कहा कि उनके अमरीकी मित्रों ने मोदी के इस आह्वान को ‘अमरीका के आन्तरिक मामलों में भारतीय प्रधान मन्त्री का अनुचित और आपत्तिजनक हस्तक्षेप’ माना और खिन्नता जताई। इन प्रवासी भारतीयों ने माना कि मुमकिन है कि उनकी ही तरह अन्य प्रवासी भारतीयों को भी ऐसे ही उलाहने झेलने पडे़ हों। 
कृषि कानूनों की वापसी को लेकर चल रहे किसान-आन्दोलन के दौरान 26 जनवरी को हुई अप्रिय, आपत्तिजनक, अस्वीकार्य हिंसा के बाद किसानों को रोकने के लिए सरकार ने अवरोध खड़े करने, राष्ट्रीय राजमार्गों पर चौड़ी-गहरी खाइयाँ खुदवाने, मोटी-मोटी दीवालें चुनवाने, नुकीली कीलें बिछवाने, कँटीली बाड़ लगवाने के जो उपक्रम किए वह सब ‘मोर्चाबन्दी’ को कोसों पीछे छोड़कर ‘किलाबन्दी’ तक पहुँच गया। दुश्मन की फौज की तरह किसानों को घेर लिया गया। उनका राशन-पानी, बिजली, इण्टरनेट सब कुछ प्रतिबन्धित कर दिया ताकि वे भूख-प्यास से बिलबिला कर या तो लौट जाएँ या फिर प्राण त्याग दें। जलियाँवाला बाग में भी अंग्रेजों ने यही किया था – भारतीयों के, निकलने के सारे रास्ते (वहाँ एक ही रास्ता था) बन्द कर, उन्हें गोलियों से भून दिया था। यह सब मुझे चौंका भी रहा था और व्यथित भी कर रहा था। ‘दृढ़ निश्चयी’ होने का अर्थ अत्याचारी, क्रूर, अमानवीय होना नहीं होता। किन्तु सरकार का यही स्वरूप सामने आया। गए तीन-चार दिनों से मुझे लगातार लग रहा था कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय इस सब को ‘मानवीय दृष्टि’ से देख कर तदुसार प्रतिक्रिया न करने लगे। यह देश की छवि के लिए तो बुरा होगा ही, विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए कितना असुविधाजनक होगा? इसी भावना के अधीन मैंने दो फरवरी की रात लगभग नौ बजे, एक वाक्य की एक पोस्ट फेस बुक पर डाली थी।
आज मैंने देखा कि ख्यात अन्तराष्ट्रीय पॉप स्टार गायिका रिएना और पर्यावरण क्षेत्र में काम करनेवाली ख्यात अन्तरराष्ट्रीय कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भारत के किसान आन्दोलन का समर्थन करते हुए ट्वीट किए। इन ट्वीटों पर हंगामा होना ही था। हुआ भी। मोदी समर्थक, आईटी सेल कुनबा इन दोनों पर टूट पड़ा। उन्हें टूट पड़ना ही था। इसी काम के लिए उन्हें भुगतान जो मिलता है! लेकिन इन दोनों विदेशी महिलाओं के समर्थन में भी लोग खुलकर आए और आईटी सेल कुनबे पर भारी पड़ गए। भारत सरकार ने भी रिएना के ट्विीट पर आपत्ति जताई और परामर्श दिया कि बात को पूरी तरह समझे बगैर टिप्पणी न करें।  रिएना को भारत सरकार द्वारा इस तरह महत्व देकर जवाब देना मुझे हैरान कर गया। राजनयिक (डिप्लोमेटिक) सन्दर्भों में रिएना की हैसियत क्या है? हमारी सरकार कब से और क्यों इस तरह व्यक्तिगत टिप्पणियों को महत्व देने लगी? हम सरकारों से बात करेंगे या दुनिया के एक-एक आदमी से?
इसी तरह अमरीकी उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस की भानजी मीना हैरिस ने भी भारतीय किसानों के समर्थन में ट्विीट किया। मीना हैरिस का ट्विट मुझे ‘खतरनाक’ लगा। राजनयिक शिष्टाचार के तहत व्हाइट हाउस भले ही चुप रहे किन्तु राष्ट्रपति बाइडन भी अन्ततः राजनीतिक व्यक्ति हैं। उनकी अपनी राजनीतिक बाध्यताएँ और पसन्दगी होगी ही। क्या वे भूल जाएँगे भारतीय प्रधान मन्त्री ने अमरीकी धरती पर, उनके प्रतिद्वन्द्वी के पक्ष में चुनाव प्रचार किया था?  
किसान सही हैं या गलत, यह हमारा अपना मामला है जिसे हम अपने तरीके से, अपने स्तर पर निपटेंगे। सरकार हमारी है। हमने ही इसे चुना है। हम परस्पर असहमत हो सकते हैं लेकिन परस्पर बैरी नहीं हैं। यह खेदजनक है कि सरकार का बर्ताव किसानों के साथ अवश्य शत्रुतापूर्ण है। फिर भी मैं किसी भी विदेशी टिप्पणी को स्वीकार नहीं करता।
लेकिन इन विदेशी टिप्पणियों का विरोध हम किस मुँह से करें? हमारा प्रधान मन्त्री अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान, विदेशी धरती पर वहाँ की एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में प्रचार करे और हम इसका (अपने प्रधान मन्त्री की इस गतिविधि का) समर्थन करें तो विदेशियों को हमारे बारे में बोलने से कैसे रोक सकते हैं? है हमारे पास इतना नैतिक आत्म-बल? हमने बबूल बोए हैं तो फसल भी बबूल की ही तो होगी!
यही बात मुझे पेरशान किए हुए है। हमने दूसरों के फटे में अपनी टाँग अड़ाई। अब दूसरे हमारे फटे में टाँग अड़ा रहे हैं तो हमें तकलीफ हो रही है। अमरीकावासी ब्लॉगर से बातों के दौरान मैंने अपनी परेशानी बताई और उनकी मनोदशा पूछी तो मानो उनकी दुखती रग छू ली। मर्मान्तक पीड़ाभरे स्वरों में उन्होंने जो कुछ कहा उसे जस का तस यहाँ रख पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। लेकिन उनकी बातें सुनकर मुझे एक लोक-कथा याद आई। मैंने वह लोक-कथा निश्चय ही अपने ब्लॉग पर दी होगी। लेकिन यहाँ देने से खुद को रोक नहीं पा रहा।
एक आदमी अच्छा-भला अपने घर पर बैठा था। दूसरा एक आदमी आया और बोला – ‘अपने बेटे को समझाओ और रोको। वर्ना तकलीफ में आ जाओगे।’ बाप ने पूछा – ‘क्यों? क्या कर रहा है मेरा बेटा?’ दूसरा आदमी बोला – ‘वाहवाही लूटने के लिए, बाजार में मजमा लगा कर हँसिये निगलने का कारनामा बता रहा है।’ बाप अपने बेटे से पहले ही दुःखी था। झल्लाकर बोला – ‘निगलने दो स्साले को। सुबह हँगने जाएगा तब मालूम पड़ेगा।’ सुनकर, सलाह देनेवाला आदमी चुपचाप चला गया।
हँसिये निगले हैं। तकलीफ तो होनी ही थी। हो रही है। चिल्लाना समझदारी नहीं है। चुपचाप सहन करने में ही समझदारी है।—– 
 श्री विष्णु बैरागी की वॉल से

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