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*आस,भ्रम और घास*

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी से मै ने कहा पिछले दो दिनों से अपनी चर्चा कहावतों पर ही हो रही है।
आज मैं आपसे निम्न कहावत के बारे में पूछना चाहता हूं? सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है इस कहावत से क्या तात्पर्य है?
सीतारामजी ने कहा यह कहावत मानसिक रोग से ग्रस्त लोगों के लिए कही गई है।
इस मानसिक रोग के लक्षण मतलब भ्रमित होने की पराकाष्ठा है।
इस कहावत को समझने के लिए यह किस्सा सुनना जरूरी है।
एक कुम्हार के पास एक गधा था,वह गधा सिर्फ और सिर्फ हरे रंग की घास ही खाता था।
जब सर्वत्र घास सुख गई थी, तब उस गधे ने घास खाना बंद कर दिया।
कुम्हार को उसके एक मित्र ने सलाह दी, गधे की आँखो पर हरे रंग चश्मा लगा दो।
हरे रंग के चश्में के कारण गधे को सर्वत्र घास हरी हरी दिखाई देगी और वह घास खाने लग जाएगा।
सीतारामजी ने मुझसे कहा घास का महत्व तो ऐतिहासिक है,समय आने पर महाराणाजी को अपना प्रताप दिखाने के लिए घास की रोटी खानी पड़ती है।
मैने कहा इन दिनों तो भ्रम के चश्मे पहनाने का सियासी खेल बहुत खेला जा रहा है।
भ्रम का नतीजा क्या होता है,यह शायर सलीम अहमद के इस शेर बयां होता है।
घास में जज़्ब हुए होंगे जमीं के आँसू
पांव रखता हूं तो हल्की सी नमी लगती है

इसीतरह भ्रम का चश्मा पहनने से आदमी स्वप्न लोक में विचरण करने लग जाता है।
ऐसी भ्रम पूर्ण मानसिकता का परिणाम शायर शकेब जलाली अपने इस शेर में स्पष्ट करते हैं।
मै शाख से उड़ा था सितारों की आस में
मुरझा के आ गिरा हूं सर्द घास में
अंत में मैने सीतारामजी से कहा ये भ्रम फैलाने वाले भी अपनी जोर आजमाइश हमेशा भोली जनता पर ही करते हैं।
इस संदर्भ में शायर कैफ भोपाली का यह शेर मौजू है।
घास के घरौंदो से ज़ोर आजमाइश क्या
आंधिया भी पगली है बर्क़ भी दिवानी है

(बर्क़= बिजली)

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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