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मैं खुश हूं, मेरे आंसुओं पर ना जाना… !

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सुसंस्कृति परिहार

उनके आंसू देखकर देश में तरह तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं क्या रोना भी किसी से पूछकर होना चाहिए।कब और कहां? ये तो ख़ुशी और ग़म की अमानत है जो छिपाए नहीं छिपती।ज्यादा चर्चित होते हैं ख़ुशी के आंसू क्योंकि इनके साथ पार्टी वार्टी और नाच गाने का भी जायका जुड़ा होता है । लेकिन कोरोना का नाश हो जिससे नाच गान फीका हो गया लेकिन दारु शारू का जलवा जरूर बरकरार है।कुछ लोग इन्हें मगरमच्छी आंसू बता रहे हैं तौबा तौबा।

कहां इंसानी फितरत कहां ये मगर मच्छ।भला इंसान की ऊंचाई तक कोई जानवर पहुंचा है । एक अकेले इंसान में सब हो सकते हैं चूहा ,बिल्ला ,कुत्ता,गधा, लोमड़ी ,शेर वगैरह वगैरह।जानवर को पहचान सकते हैं पर  इंसान में कब कौन रुप सामने आ जाए यह नहीं समझा जा सकता। मगरमच्छ के पीछे सयाना कौवा भी तो हो सकता है जो विष्ठा के लिए प्रसिद्ध है।बहरहाल बात खुशी के आंसुओं पर ही केन्द्रित की जाए।ये ख़ुशी के आंसू उस वक्त भी आए थे जब हमारे साहिब जी संसद भवन की सीढ़ियां चढ़ते हुए रो पड़े थे ।ये खुशी के आंसू ही तो थे जिसका ख़्वाब में भी अंदेशा नहीं हो और वह मुराद पूरी हो जाए। ऐसी ख़ुशी जब जब मिलेगी आंसू आ जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है।काशी में कलेक्टर के सामने रोना भी प्रसन्नता का ही द्योतक है।काशी का विश्वनाथ मंदिर कितने आसान तरीके से अपने नये स्वरुप में आ गया मुसलमानों ने कितने मंदिर तोड़े होंगे,कितना इतिहास मिटाया होगा बिना बवाल,बिना सवाल मिली कामयाबी पर रोना क्या ख़ुशी का प्रतीक नहीं है।इधर गंगा जी ने घाट घाट कितनी सावधानी से सफाई कर दी जिसकी गणना का काम मुमकिन नहीं ऐसा तो हिटलर भी नहीं कर पाया वह  गैस चैंबर बना के बदनाम हो गया।गंगा में मुक्ति  की लोगों की साध भी पूरी हो गई और इम्युनिटी हीन लोगों की संख्या भी घट गई।ऐसे लोग भला किस काम के।हर्रा लगा ना फिटकरी रंग चोखा हो गया । फिर रोना आना स्वाभाविक है।ये तो अचानक लाटरी लगने जैसा है जब सुनकर लोग रो पड़ते हैं।

रोना अनायास कभी नहीं होता उसकी पहचान ज़रा कठिन होती है जब हज़ारों लाशें नदी में तैर कर ज़िंदगी का सफर तय कर रही हों तब आंसू ना आएं लेकिन जब एक जरुरत मंद लाभार्थी मोदी में भगवान देखने लगे तो भला कौन होगा जो आंसू रोक पाए।एक घटना और याद आ रही है पुलिस स्मारक यानि शहीदी स्थल पर भी रोना ज़रुर आना ही चाहिए एक जगह रो लेना बेहतर है क्योंकि उनकी शहादत तो उनका कर्त्तव्य होता है जितने लोग कर्त्तव्य करते हुए शहीद होंगे उससे देश की प्रतिष्ठा बढ़ती है।पुलवामा जैसी घटनाएं महत्वपूर्ण नहीं होती।कोरोना से मरने वालों की मौत पर भी क्या रोना ?ये तो नियति का खेल है जी। रोहित बेमुला की मौत पर भी उनका रोना सवाल की तरह उछला था।वे भूल जाते हैं रोहित की मौत पर रोना कितना महत्वपूर्ण और लाभकारी हुआ। विवेकानंद का कमरा खोलते वक्त उनके सिसकने के भी गूढ़ार्थ समझने होंगे।जब 2014 में वे संसदीय दल के नेता चुने गए तो उनकी भावुकता देखते ही बनती थी । साहिब का रुदन सामान्य नहीं बल्कि गहरे अर्थ लिए होता है जिसे समझना अब शायद ज्यादा आसान हो गया है । पहले लोग उन्हें रोता देख भावुक हो जाते थे आजकल वे भी इसके पीछे के खुशी के रहस्य को समझने लगे हैं।ये अच्छी और समझदारी की बात है।
 यहां मेरा आशय सिर्फ और सिर्फ इस बात से अवगत कराना है कि ये आंसू नकली नहीं जिन्हें मगरमच्छी कहा जा रहा है ये आंसू दिल की जुबान है जो हर्ष फायर की तरह हर्ष प्रकट कर रहे हैं ।एक फिल्मी गीत बार बार याद आ रहा है मुबारक हो सबको समां ये सुहाना,मैं ख़ुश हूं मेरे आंसुओं पर ना जाना।साथियो बहुत मुबारक हो आप सबको समां ये सुहाना। 

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