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मै अंधा तमाशबीन नहीं हूं

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी से मिलने गया तब वे लेख लिख रहे थे। मैने पूछा क्या लिख रहे हो? सीतारामजी ने कहा एक मिनिट रुको लेख पूर्ण कर पढ़ कर सुनाता हूं।
सीतारामजी ने लेख की शुरुआत ही एक शेर से की।
शायर मोइन अहसान जज्बी ने लिखा है ये शेर।
ऐ मौजे-ए -बला उन को भी जरा दो चार थपेड़े हल्के से
कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफां का नज़ारा करते हैं

ये शेर सुनकर मेरे मुँह से सहज ही निकल गया सटीक है।
सीतारामजी ने कहा आगे सुनो।
अपना देश 15 अगस्त1947 के दिन स्वतंत्र हुआ है।
लेकिन जो साहिल पर बैठ कर तूफ़ान का नजारा करते है,उन्हे तूफां में फसें लोगों का संघर्ष देखने में मजा आता है।
यह सामंती मानसिकता है। सामंती मानसिकता से तात्पर्य पत्थर दिल मनोवृत्ति।
सामंती युग में क्रूरता की पराकाष्ठा थी।
सामंती युग की पराकाष्ठा देशी फिल्मों में अनवर दर्शाई जाती है।
आमजन के श्रम का शोषण, स्त्रियों के देह का शोषण क्रूरता,अवैध धंधों को मिलने वाला शासन,प्रशासन का प्रश्रय,
मादक पदार्थों का बेखौफ धंधा
फिल्मों दर्शाया जाता है।
फिल्मों में उक्त गैर कानूनी कार्यों का विरोध बहुत ही नाटकीय ढंग से दर्शाया जाता है। नाटकीय ढंग से दर्शाने का असर विपरित ही साबित होता है। विपरित से तात्पर्य फिल्मों में सारे अवैध कार्य को महिमा मंडित कर दर्शाया जाता है। महिमा मंडित तरीके दर्शाने के कारण दर्शकों को अवैध कार्यों को अंजाम देने का अप्रत्यक्ष रूप से प्रशिक्षण ही मिलता है।
जब लोगों में सामंती मानसिकता पनप जाती है,तब उनमें मानवीयता समाप्त हो जाती है।
ऐसे लोगों के लिए शायर जमाल एहसानी फरमाते हैं।
उस ने बारिश में भी खिड़की खोल के देखा नहीं
भीगने वालों को कल क्या क्या परेशानी हुई

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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