डॉ. विकास मानव
कल्पना उस विचार शक्ति का नाम है, जो अन्तःकरण में ऐसी ऐसी वस्तुओं को उपस्थित करती है जो इन्द्रियों के सम्मुख उपस्थित नही होती।
कल्पना वह क्रियात्मक मानसिक विचारशक्ति है, जो अन्तःकरण में अवास्त्विक वस्तुओं के स्वरूप में उपस्थित करके कला,काव्य,चित्र आदि के रूपमें अभिव्यक्ति होती है।
परमात्म की दो शक्तियाँ हैं :
१.आवरण शक्ति
२.विक्षेप शक्ति
अध्यात्म रामायण जो वेदव्यास रचित है, उसके अरण्यकाण्ड सर्ग चार के 22वें श्लोक से 26 वें श्लोक तक में तथा पैंगलोपनिषद के प्रथम अध्याय में सुन्दर विवेचना है।
यहाँ हम अध्यात्मरामायण के उपरोक्त सर्ग के कुछ श्लोक लेते हैं :
सैव माया तयैवासौ संसारः परिकल्प्यते।
रूपे द्वे निश्चिते पूर्वं मायायाः कुलनन्दन।।२२
विक्षेपावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत्।
लिङ्गाद्यब्रह्मपर्यन्तं स्थूलसूक्ष्मविभेदत:।।२३
हे प्रभु वह आपकी माया ही है जो सर्वप्रथम जगत की कल्पना करती है। उस माया के दो रूप पहले से ही निश्चित किये गए हैं। वे हैं विक्षेप शक्ति और आवरणशक्ति।
उस माया की प्रथम विक्षेपशक्ति के द्वारा माया ही पहले स्थूल और सूक्ष्मभेद से ब्रह्मा(जो न होने पर भी माना जाता है किन्तु पूजा नही जाता) से लेकर महत्तत्त्व तक की कल्पना करती है।
अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमावृत्य तिष्ठति।
मायया कल्पितं विश्वं परमात्मनि केवले।।२४
माया की दूसरी शक्ति आवरणशक्ति है जो सम्पूर्ण ज्ञानको आवरित करके (ढक करके) स्थित रहती है। यह सब माया के द्वारा परमात्मा में कल्पित है। आवरणशक्ति मात्र ज्ञान को आवरित करती है। विक्षेपशक्ति जगत का प्रसार करती है।
ऋग्वेद मण्डल१०, सूक्त १२९ , की ऋचा क्रमांक २, ६ और ७ में बहुत सुन्दर वर्णन है।
माया से सब कल्पित होने से ही इस जगत का प्रतिपल बदलाव होता रहता है। इस सृष्टि का रूप माया की कल्पना अर्थात् विचारशक्ति से प्रतीति मात्र भर है, इसका स्थायित्व नही है। इस लिए आगे कहा है :
श्रूयते दृश्यते यद्यत्स्मर्यते वा नरैः सदा।
असदेव हि तत्सर्वं यथा स्वप्नमनोरथौ।।२५, २६
यह जो सुना जाता है, देखा जाता है, मनुष्यों द्वारा सदैव स्मरण किया जाता है यह सब स्वप्न में देखे गए अर्थरूप वित्त, पुत्र , सुन्दर रूपवान पत्नी, राज कोष आदि स्वप्न के मनोरथों की तरह सब असत्य है।

