शशिकांत गुप्ते
क्षमता का शब्दिक अर्थ होता है शक्ति,सामर्थ्य,और मानसिक शक्ति।
प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक शक्ति, सोचने समझने का सामर्थ्य और मानसिक शक्ति एक दूसरें से भिन्न होती है।
मानसशास्त्र के अनुसार हरएक व्यक्ति को अपनी शारीरक शक्ति और मानसिक क्षमता से पूर्ण रूप से अवगत होना चाहिए।
शारीरिक शक्ति से अधिक कोई भी कैसा भी श्रम करना नहीं चाहिए। इसीतरह मानसिक क्षमता से अधिक कोई भी निर्णय,कोई भी दिमाग़ी कार्य नहीं करना चाहिए।
जो भी कोई व्यक्ति उसकी स्वयं की शारीरिक शक्ति से अधिक वजन उठाता है तो उसकी मांसपेशियों में अकड़न और उसके शरीर की कोई हड्डी भी टूट सकती है।यदि कोई व्यक्ति स्वयं मानसिक क्षमता को ज्यादा आंकते हुए कोई अहम निर्णय लेता है, तो निश्चित ही वह निर्णय ग़लत होने की पूर्ण सम्भवना होती है।इसे ही कहतें हैं,स्वयं का Over estimation करना स्वयं को अनुमान से अधिक आंकना। मनोविज्ञान (Psycology) के आधार पर यह अहंकारी मानसिकता का लक्षण है।
स्वयं को ज्यादा आंकना और दूसरों को अपने से कम आंकना मतलब दूसरों को Under estimate करना भी अंहकार ही तो है।
अहंकार ही व्यक्ति के अंदर तानाशाह प्रवृत्ति को जागृत करता है। जिस किस में तानाशाह प्रवृत्ति जागृत होती है,वह हमेशा अपने स्वयं के ऐब को छिपाने के लिए अपनी गलतियों को दूसरों पर थौपने की कौशिश करता रहता है।
ऐसा व्यक्ति अपने इर्दगिर्द हाँ में हाँ मिलाने वालों का जमघट ही रखता है। तानाशाह के हाँ में हाँ मिलाने वालों को ही चाटुकार या भांड कहा जाता है।
यह सब देशी फिल्मों में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है।
फिल्मों में खलनायक के इर्दगिर्द उसकी सुरक्षा के लिए उसके गुर्गे तैनात होतें हैं।
तानाशाह के इर्दगिर्द उसकी सुरक्षा के लिए,सुरक्षा कर्मी तैनात होतें है।इससे यह भी साबित हो जाता है कि,हरएक तानाशाह डरपोक होता है।
एक सुविचार है डर हमेशा अज्ञानता से पैदा होता है
तानाशाही,अंहकार,अज्ञानता,
अपरिपक्वता,और भय सभी आपस में पर्यायवाची शब्द है।
इसीलिए सभी को अपनी क्षमता का ज्ञान होना ही चाहिए।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

