डॉ. विकास मानव
नारी के अनेकों नाम रूप हैं। स्वादि परस्मै स्तृ धातु स्तृणोति प्रसन्न करना, तृप्त करना से स्त्री शब्द बनता है। स्तृ + क्विप् + ई = स्तृ= स्त्री जो पुरुष को अपने हावभाव से प्रसन्न करे, तृप्त करे, वह स्त्री है।
स्त्यै संहतौ ध्वनौ (ध्वादि उभय स्त्यायति ते आपस में मिलाना ढेर के रूप में एकत्र करना) से स्त्री शब्द की निष्पत्ति होती है। स्त्यै+ ड्रप् + ङीष्= स्त्री, स्त्यायेते शुक्रशोणित यस्याम् । जिसमें शुक्रशोणित वीर्यरज आपस में मिलकर एक होते गर्भ बनते स्त्यायति गर्भा यस्यामिति, वह स्त्री है। स्तेपू ध्वादि आत्मने स्तेपते रिसना से स्त्री शब्द बनता है।
स्तेप् + ऋप् = स्त्री। जिससे प्रतिमास रक्त रिसता है मासिक स्राव के रूप में, वह स्त्री है। अथवा स्तेन नाम धातु चुराना स्तेनयति-ते से जो पुरुष के वीर्य को चुरा ले अपनी योनि में रख ले, वह स्त्री है।
स्तेन् + ऋय् = स्त्री मन से, वचन से, कर्म से जो पुरुष का सत्कार करे, समर्थन दे, सहयोग करे वह सूत्रि वा स्त्री है। स्त्री द्वारा पुरुष को सतत सेवा मिलती है।
★कुलवती स्त्री के दो नाम हैं-
कुलस्त्री
कुलपालिका।
★शुद्ध स्त्री के दो नाम हैं-
कन्या
कुमारी।
कम् (वैष्णवी शक्ति) + या (जो)। कु= ह्रास, अभाव सूचक अव्यय मारी = मार + ङीप्। मार = कामदेव, मारी = कामदेव की स्त्री स्त्री रति । कुमारी का अर्थ है- रति के अभाव वाली अकामा पुरुष की कामना न करने वाली अविवाहित स्त्री को कुमारी कहते हैं।
★रजस्वला न हुई स्त्री के तीन नाम हैं-
गौरी
नग्निका
अनागतार्तवा
प्रथम बार रजस्वला हुई स्त्री के दो नाम हैं-मध्यमा, दृष्टिरजस्। पति का स्वयं चुनाव करने वाली स्त्री के तीन नाम हैं- स्वयम्बरा, पतिंवरा, वर्या । पहली स्त्री के रहते हुए जिसके पति ने उसके जीवन काल में ही दूसरा विवाह कर लिया हो, ऐसी उस पहिली स्त्री के तीन नाम हैं- कृतसापलिका, अव्यूढा, अधिविन्ना।
गदराये हुए यौवन वाली स्त्री के दो नाम हैं-तरुणी, युवती। तू तरति + उनन् + ङीष्= तरुणी, चढ़ती हुई जवानी वाली वह स्त्री पुरुष को पार कर ले, जोत ले, अपने अधिकार में कर ले। युवती= युवन् + ति ङीप् वा। यौतीति यु + कनिन् । जो पुरुष से मिलने वा संगम करने की अति उत्सुक हो, वह युवती है। पिता के घर रहने वाली उठती जवानी वाली सयानी लड़की को चिरण्टी, सुवासिनी कहते हैं।
पुरुष धन की इच्छा करने वाली स्त्री का नाम है- इच्छावती, कामुका। मैथुन की कामना करने वाली स्त्री के दो नाम हैं-वृषस्यन्ती, कामुकी नियत समय पर नियत स्थान पर नियत प्रेमी से मिलने के लिये जाने वाली स्त्री का नाम है- अभिसारिका ‘या कान्तार्थिनी भर्तुः संकेतस्थानं गच्छति सा अभिसारिका।’
●अमर्यादित दुष्ट स्त्री के आठ पर्याय हैं-
पुंश्चली धर्षिणी, बन्धकी, असती, कुलटा, इत्वरी, स्वैरिणी, पांसुला।
जो स्त्री पुरुष के पास स्वयं जाती है, जिसकी पुरुष के समान चाल चलन होती है, वह पुंश्चली। पुंस् पुमान् इव चलति, पुमांसम् गच्छति वा पुंश्चली। घृष् धर्षति, जो स्त्री घृष्टता करे, ढीठ हो, अमर्यादित व्यवहार करे उसे धर्षिणी =घृष् + णिनि + ङीप् जाना जाय।
बन्घ् बध्नाति, जो स्त्री बाँधे पुरुष को बन्धक बनाये जादू टोना वा बल के प्रयोग से अपने वश में किये रहे और उससे मनमाना व्यवहार करे, उसे बन्धकी कहते हैं। बन्धू + ण्वुल् + ङीप्। बाँधने वाली जो सती नहीं है, जो मिथ्याचारिणी है, उसे असती समझें। जो कुल कुटुम्ब के लियेसाक्षात् टंक टांकी कुठार कुल्हाड़ी है, वह कुलटा है।
कुल का नाश करने वाली कुलटा के ये लक्षण हैं-
कुलपतनं जनगह बन्धनमपि जीवितव्यसन्देहम्।
अंगीकरोति कुलटा सततं परपुरुषसंसक्ता।
कुल में दाग लगाना, लोकनिन्दा, बन्धन और जीवन को समाप्त करना- इन सबको परपुरुषरता कुलटा स्वीकार कर लेती है।
● इण गतौ + क्यप् तुक् + ङीष्= इत्वरी, जो निर्बाध रूप से गमनागमन करे वह स्त्री इत्वरी व्यभिचारिणी है।
●स्वर (चुरादि उभय स्वरयति- ते दोष निकालना कलंक लगाना बुरा भला कहना निन्दा करना) + अण्= स्वैर। जो स्त्री कुल में कलंक लगाये, अपने पति की निन्दा करे, उसे स्वैरिणी समझना। स्व + ईर् + णिनि + ङीप् = स्वैरिणी, स्वेन ईरितुं शीलमस्य स्वेच्छाचारिणी, अनियंलित निरंकुश, मनमानी करने वाली। स्व स्वरति भ्वा .पर + अण् + णिनि+ ङीप् =स्वैरिणी जो पति को पीड़ा दे, वा स्व क्रयादि पर स्वणाति चोट पहुँचाये मारे, वह स्वैरिणी है।
●पंस पसि नाशने चुरादि उभय पंसयति ते नाश करना भ्रष्ट करना से पांसुला शब्द बना है। जो स्त्री अपने कुलधर्म का नाश करे, आचार से भ्रष्ट हो, वह पांसुला है। पंसू + कु. दीर्घ पांसुः चूर्ण धूल, जो धूलयुक्त वा मैली गंदी है, उसका नाम पांसुला ।पांसु + लच् + ङीप्= पांसुला, तन-मन से गंदी अपवित्र स्त्री।
ऐसी दुष्टा स्त्रियों के कुण्डलीगत योगों का वर्णन ज्योतिर्विदों ने विस्तार से किया है।
★१. “लग्नाधिपो वाथ मदालयेशे वगैगत: पापनभश्चराणाम्।
मदे तनौ वा खलखेटवर्ग: तदा कुलं मुञ्चति चञ्चलाक्षी॥
[जन्म (लग्नेश वा सप्तमेश पापमहों के वर्ग (नवांश) में हों अथवा लग्न एवं सप्तम में पापग्रह के वर्ग हों तो वह स्त्री कुल को छोड़ दे वा कुलटा होवे |]
★२. ‘पापान्तराले यदि लग्नचन्द्र स्यातां शुभालोकनवर्जितौ तौ।
अनंगलोला खलसंगमेन कुलद्वयं हंति तदा मृगाक्षी॥
【यदि लग्न और चन्द्रमा पापग्रहों के बीच में हों, शुभ दृष्ट न हो अथवा पापयुक्त ही हों तो वह स्त्री पति-पिता दोनों के कुल का नाश करती है।】
★३. व्ययेष्टमे भूमिसुतस्य राशावगी सपाचे भवतीह रण्डा।
मदे कुलीरे सखी कुजेऽपि धवेन हीना रमतेऽन्यलोकैः॥
【मंगल की राशि (१, ८) में राहु बारहवें आठवें स्थान में पापयुक्त हो तो वह स्त्री रोड होवे। अथवा, सप्तम भाव में कर्क का सूर्य, मंगल सहित (से युक्त) हो तो पतिहीन होकर स्त्री अन्य पुरुषों से रमण करे ।】
★४. तनी चतुर्थे निधने व्यये वा मदालये पापयुक्तः कुजश्चेत्। अनंगलीला प्रकरोति जारैः पति तिरस्कृत्य विलोलनेत्रा॥
[ यदि जन्म लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम द्वादश में पापयुक्त मंगल हो तो वह चंचला अपने पति का तिरस्कार करके जार के साथ रति करती है।]
★५. परस्पराशोपगतौ भवेतां महीजशुक्रौ जननेंगनायाः।
स्वयं मृगाक्षी ह्यभिसारिकेव प्रयाति कामाकुलितान्यगेहे॥
[ यदि स्त्री के जनते समय में मंगल शुक्र के नवांश में तथा शुक्र मंगल के नवांश में हो तो वह मृगाक्षी अभिसारिका के समान कामातुर होकर दूसरे के घर जावे ]
★६. “पापग्रहे सप्तमगे बलोनेऽशुभेन दुष्टे पतिसौख्यहीना।
स्यातां मदे भौमकवी सचन्द्रौ पत्याज्ञया सा व्यभिचारिणी स्यात्॥
[बलहीन पाप ग्रह सप्तम स्थान में हों, उसे शुभ ग्रह न देखें तो स्त्री को पति का सुख न होवे। यदि सप्तम स्थान में मंगल शुक्र चन्द्रमा हो तो वह स्त्री पति की अनुमति से व्यभिचार में लीन रहती है।
★७. मन्दारराशी ससिते शशांके खलेक्षिते लग्नगते मृगाक्षी।
मात्रासहैव व्यभिचारिणी स्वागदे खलांशे व्रणविद्धयोनिः॥
[ शनि और मंगल की राशि (१०, ११, १, ८) में शुक्र सहित चन्द्रमा पाप दृष्ट लग्न में हो तो वह स्त्री अपनी माता सहित व्यभिचार करती है। यदि सप्तम में पापग्रह का नवांश हो अथवा शुक्र एवं चन्द्रमा पाप नवांश में सप्तम में हों तो भी ऐसा हो तथा इस स्त्री की योनि में घाव होता है।]
बिना बच्चे वाली स्त्री को अशिश्वी कहते हैं-‘अशिश्वीशिशुना बिना। पति और पुत्र से रहित स्त्री को अवीरा कहते हैं-‘अवीरानिष्पति सुता।’ धवरहित स्त्री के दो नाम हैं-विश्वस्ता, विधवा।
■श्वस् (अदादि पर श्वसिति आह भरना ऊंचा साँस लेना वेदना ग्रस्त होना) + क्त = श्वस्त अर्थात् दुःखी।
वि+श्वस्त + टाप्= विश्वस्ता का अर्थ है पति के मर जाने से दुःखी स्त्री, विश्वसनीय वा निर्भय स्त्री, श्वासहीन मृत स्त्री, अपमानित स्त्री।
श्वस् (अव्यय)= आने वाला कल, भविष्य।
श्वस्ता = भविष्यवाली, जिसका अच्छा भविष्य हो।
वि+श्वस्ता= विश्वस्ता जिसका भविष्य ही न हो, आगामी समय बुरा हो, दुःखमय हो ऐसी स्त्री को विश्वस्ता कहते हैं। बिना भर्ता के कौन उसका पालन पोषण रक्षण करे ? इसलिये विश्वस्ता = विधवा।
धु (धुनोति-धुनुते) + अप् = धव अर्थात् पति। धव+टाप् = धवा पतिवाली पतियुक्ता।
वि + धवा = पतिहीना जिसके पति को मृत्युदेव ने छीन लिया है, वह विधवा है। जो स्त्री को कम्पित करता स्मन्दित करता अनुशासित करता, वह धव वा पति है। ज्योतिष के आचार्यों ने विधवा होने के कई योग बताये हैं।
★१. ‘निशाकरात्सप्तम भाव संस्था महीजमन्दागुदिवाकराश्चेत्।
तनोरिभे जन्मनि नैधने वा दिशति वैधव्यमलं मदेवा॥
[ चन्द्रमा से सप्तम स्थान में मंगल, शनि, राहु, सूर्य हो तो निश्चय वैगव्य करते हैं तथा जन्म काल में शत्रु राशि के अथवा सप्तम या अष्टम में हो तो भी वैधव्य करते हैं।
★२. “पापग्रहे सप्तमलग्नगेहे भर्ता दिवं गच्छति सप्तमाब्दे ।
निशाकरे चाष्टम वैरिभावे तदाष्टमाब्दे निधनं प्रयाति।।
[जन्म में जिसके सप्तम एवं लग्न में पापग्रह हो, उसका पति विवाह से सातवें वर्ष स्वर्ग चला जाता है। यदि चन्द्रमा ६ ।८ में हो तो आठवें वर्ष में भर्ता मरे।]
★३. सप्तमेशेऽष्टमे यस्याः सप्तमे निधनाधिपः
पापेक्षणयुतो बाला वैधव्यं लभते ध्रुवम्॥
[ जिस नवयौवना के जन्म लग्न से सप्तमेश अष्टम में तथा अष्टमेश सप्तम में पापदृष्ट/ पापयुक्त हो तो निश्चय ही बाल (शीघ्र वैधव्य की प्राप्ति होती है।]
★४. सप्तमाष्टपती षष्ठे व्यये वा पापपीडित तदा वैधव्याति नारी नैवाज सशय:।।
जिस स्त्री के सप्तम अष्ठम भावों के स्वामी पाप पीड़ित होकर छठें या बारहवें भाव में पड़े हों, वह निस्सन्देह वैधव्य प्राप्त करती है।
पहले बाल विवाह होता था। अब ऐसा नहीं होता। अतः बालविधवा योग का अर्थ है-पति के रहते हुए भी पति सुख से वंचित होना। कुछ बाल विधवा योग ये हैं +
●१. सप्तमे भीमे पाप दृष्टे बालविधवा।
●२. भौमराही सप्तमेष्टमे व्यये विधवा।
●३. लग्नचन्द्रान्यतरतः पापा: सप्तमेष्टमे वा विधवा।
◆ ४. यूनेमे पापे विवाहोत्तर सप्तमाब्दे रण्डा।
●५. पष्ठेऽष्टमे चन्द्रेऽष्टमाब्दे रण्डा।
●६. सप्तमे रन्ध्रेशे सप्तमेशे पापदृष्टे नवोढ़ा रण्ड़ा।
●७. पष्ठाष्टमेश पष्ठे वा व्यये पापयुते नवोढ़ा रण्डा।
( जातकतत्वम् )
स्त्री की कुण्डली और इस्ट्रोलॉजी :
१. सप्तम में मंगल पापदृष्ट हो तो बालविधवा।
२. मंगल की राशि १,८ में राहु सप्तम / अष्टम / व्यय में हो तो बालविधवा योग।
३. लग्न एवं चन्द्रमा से सप्तम अष्टम में पाप ग्रह हो तो विधवा।
४. लग्न एवं सप्तम में पाप ग्रह होने से विवाह से सातवें वर्ष पति की मृत्यु होती है।
५. पष्ठ/ अष्टम में चन्द्रमा (शुभ प्रभावहीन होने पर) विवाह के आठवे वर्ष बाद मृत्यु देता है, पति को।
६. अष्टमेश सप्तम में तथा सप्तमेश को पापग्रह देखें तो नवविवाहिता विधवा होती है।
७. पष्ठ/ अष्टम के स्वामी षष्ठ वा द्वादश में पापयुक्त हों तो नवोढ़ा विधवा होती है।
बूढ़ी स्त्री के दो नाम है-
वृद्धा
पलिक्नी।
जो आयु से बहुत अधिक बड़ी वृद्ध हो, वृद्धा कही जाती है। जिसके केश पक गये सफेद हों, वह पलिक्नी 【पलित + अच् तस्य क्न ङीप् है।】
स्वयं जानकार स्त्री को प्राशी, प्रज्ञा कहते हैं।
बुद्धिमती स्त्री को प्राशा, धीमती कहते हैं।
मदालसा ऐसी ही स्त्री थी जिसने अपने पुत्रों को मुक्ति का मार्ग दिखलाया। प्राज्ञा प्राज्ञी नारी को मेरा प्रणाम । गार्गी, याज्ञवल्क्य पत्नी भारती, मण्डन मिश्रपत्नी सदैव प्रणम्य हैं।
★ मन्त्रार्थ करने वाली स्त्री आचार्या तथा पढ़ाने वाली स्त्री उपाध्यानी होती है। ऐसी स्त्रियों का अभाव नहीं ये भी नित्य आदरणीय है। वीरपुरुष की स्त्री को वीरपत्नी, वीरभार्या तथा वीरपुत्र को जन्म देने वाली स्त्री को वीरमातृ, वीरसू कहते हैं। ये भी नित्य आदरणीय हैं। बाल संवारने वाली चोटी गूंथने वाली, पराये घर में रहते हुए भी स्वतन्त्र, नौकरानी का नाम सैरन्ध्री है। काल की गति को कौन जानता है ? कि द्रौपदी जैसी स्त्री को सैरन्ध्री बनना पड़ा।
सैरन्ध्री के लक्षण है-
चतुःषष्टिकलाभिज्ञा शीलरूपादि सेविनी। प्रसाधनोपचारशा सैरन्ध्री परिकीर्तिता॥
【गेरुवा कपड़ा पहनने वाली अधेड़ वा विधवा स्त्री को कात्यायनी कहते हैं। ‘कात्यायन्यर्द्धवृद्धा या
काषायवसनाऽथवा- (अमर)】
【दुर्गा को कात्यायनी कहते हैं। सा कात्यायनी पातु माम्।】
★जो स्त्री घर द्वार छोड़कर अटन करती, काम विमुख हो भिक्षा माँग कर जीवन निर्वाह करती, वह प्रव्रज्यिनी कहलाती है।
स्त्री प्रव्रज्या योग यह है :
१. क्रूरेऽस्ते धर्मगप्रव्रज्या।
२. ज्ञारेज्याच्छाबलिनः स्त्रीलग्नजा ख्याता ब्रह्मवित्।
(जातक तत्वम्)
स्त्री की कुण्डली में सप्तम में क्रूर ग्रह हो तथा नवम में शुभ ग्रह हो तो वह नवमगत मह के शील के अनुसार संन्यास ले लेती है।
यदि बुध मंगल बृहस्पति शुक्र बलवान् हो और लग्न में स्त्री (सम) राशि हो तो स्त्री विख्यात और ब्रह्मलीन होती है।
वेश्या स्त्रियों के चार नाम हैं-
वारस्त्री
गणिका
रंडी
रूपजीवा।
संसार के हर समाज में रूपजीवा स्त्रियों होती हैं। यह समाज की आवरण होती हैं। वृ + घञ्= वार, आवरण। ये पूरे समाज को विकृत होने = से बचाती हैं। कामुक लम्पट पुरुष इनके पास आकर अपनी वासना तृप्ति करते हैं।
इससे कुलवधुओं का अपहरण वा बलात्कार/ शीलभंग नहीं होता। वारस्त्री अपने नाच गान नटन एवं भाव भंगिमा से पुरुष को सुख देती है। जहाँ वेश्याओं का समुदाय नहीं है, वहाँ का पूरा समाज भीतर से विकृत होता है। जैसे बस्ती में नाली न होने से गन्दगी चारों ओर फैलती है, वैसे ही आजकल घोषित वेश्याओं के अभाव में असंस्कृत किन्तु सभ्य स्त्रियों वेश्या बन गई हैं।
विद्यालय महाविद्यालय, विश्वविद्यालय कार्यालय गली मुहल्ले इससे आक्रान्त हैं। अघोषित वेश्याएँ पृण्य हैं। जबकि घोषित वेश्याएँ सम्मान्य हैं। वेश्या का दर्शन शुभ शकुन है। ऐसा हमारा शास्त्र कहता है वेश्या विष्णु है। इसलिये वेश्याओं को मेरा नमस्कार।
दत्तात्रेय ने गणिका को गुरू बनाया था। प्रेमी-प्रेमिका के बीच वार्ता का आदान प्रदान करने वाली स्त्री को दूती, सञ्चारिका कहते।
स्त्रियों को बहका फुसला कर उन्हें पर पुरुष से मिलाने, भ्रष्ट करने वाली स्त्री को कुटनी, शम्भली कहते हैं।
लक्षण देखकर शुभाशुभ बतलाने वाली स्त्री को विश्निका ईणिका, देवहा कहते हैं।
वह स्त्री जिसका दो बार विवाह हो, उदरी, पुनर्भू, दिधिषू की संज्ञा से बोधित होती है।
मासिक धर्मगत स्त्री के ८ नाम है-
रजस्वला स्त्रीधर्मिणी, अवि, आत्रेयी, मलिनी, पुष्पवती ऋतुमती, उदक्या.
रजनिघण्टु में लिखा है :
द्वादशात्वत्सरादूर्ध्वं पञ्चाशत्समाः स्त्रियः।
मासि मासि भगद्वारा प्रकृत्यैवार्त्तवं स्रवेत्॥
आवस्रावदिवसादृतुः पोडशरात्रयः।
गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एवं समयः स्मृतः॥
१२ वर्ष के उपरान्त ५० वर्ष तक स्त्रियों के भग द्वारा प्रतिमास स्वभावतः रक्तस्राव होता है। स्त्रियों के योनिमार्ग से प्रतिमास निकलने वाले रक्त के तीन नाम है-रजस्, पुष्प, आर्तव। जिस स्त्री का रजोधर्म रुक गया हो उसे निष्कला, विगतार्तवा कहते हैं।
ऐसी स्त्री गर्भधारण के योग्य नहीं होती। पुष्पवती स्त्री अस्पृश्य होती है। भागवत में एक कथा है। इन्द्र ने त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप का वध कर दिया, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या का दोष लगा। इससे मुक्त होने के लिये उन्होंने इसे चार बराबर भागों में बाँट कर, पृथ्वी, वृक्ष, जल एवं स्त्री को दे दिया।
पृथ्वी पर ऊसर/ मरु भूमि के रूप में, वृक्ष पर गोंद के रूप में, जल पर फेन के रूप में तथा स्त्री देह पर मासिक आर्तव के रूप में यही ब्रह्महत्या दृष्टिगोचर होती है।
इसके बदले में इन्द्र ने इन सबको वर दिया। जिसके प्रभाव से पृथ्वी का गड्ढा धीरे-धीरे अपने आप भर जाता है, वृक्ष को काटने पर भी उससे शाखाएँ निकलती हैं, निर्झरों का जल कभी कम नहीं होता तथा स्त्री को सर्वदा सहवास सुख मिलता है। सहवास सुख के लोभ से स्त्री ने इस चतुर्थांश ब्रह्महत्या को ग्रहण किया है। रजोधर्म काल में वह इसीलिये ब्रह्मघातिनी होती है।
उसका स्पर्श करने से प्रायश्चित करना पड़ता है। यह स्मृति धर्म है। रजस्वला स्त्री का बनाया हुआ भोजन एवं स्पर्श में प्रतिमाह करता हूँ। यह बाध्यता है, आज के युग परिवेश की।
जो पुरुष रजस्वला स्त्री का स्पर्श नहीं करते उनकी प्रज्ञा तेज, बल, दृष्टि और आयु की वृद्धि होती है। ऐसा मनु का कहना है।
तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम्।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुः आयुश्चैव प्रवर्धते।
(मनुस्मृति ४।४२ )
रजस्वला स्त्री से वार्तालाप नहीं करना चाहिये।
नोदक्ययाभिभाषेत।
[न उदक्यया अभिभाषेत ]
(मनु. ४।५७.)
पत्नी को पति अपने से पृथक् न समझे।
एयो भर्ता सा स्मृतांना।”
(मनु. ९।४५)
जो पति है वही पत्नी है। दोनों में अभेद है। दोनों समान हैं। स्त्री और पुरुष एक ही तुला के समान आकार रूप रंग भार गुण वाले दो पलड़े हैं। ये दो पलड़े जिस दण्ड से त्रिगुणात्मक काम रूप रस्सी से जुड़े हैं, उसे धर्म कहा जाता है। इस धर्मदण्ड का आलम्ब है-ईश्वर जो कि अनाधार एवं अप्रमेय है।
न्याय तो यही है कि दोनों पलड़ों पर समान भार हो। पलड़े परस्पर ऊंचे नीचे न हों। दण्डी सीधी हो। दण्ड के केन्द्र मध्य में आलम्ब हो। दाम्पत्य धर्म की यह तुला गृहस्थ के लिये एक आदर्श है। स्त्री एवं पुरुष आमरण (जीवनपर्यन्त) परस्पर मेल के साथ धर्मादि कार्यों में सहयोग देते हुए जीवन जियें। यहाँ स्त्रीपुरुष / पतिपत्नी का संक्षिप्त / सार धर्म है।
अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिकः।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः॥
(मनु. ९।१०१)

