*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
सोशलिस्ट नेता मधुलिमये ने अपने एक लेख ‘आचार्य नरेन्द्र देव : ए
पोलिटिकल अप्रेजल’ में लिखा है कि आचार्य नरेन्द्र देव प्रथम कोटि के
विद्वान, शिक्षाविद, चिंतक, सोशलिस्ट पार्टी के वरिष्ठतम नेता, स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदारी, अनेकों बार जेल का बंदी जीवन भोगा उनको डॉ.राममनोहर लोहिया
का बहुधा कॉफी हाउस में जाना पसंद नहीं था। दिसंबर 1948 में उन्होंने (आचार्य जी) मुझसे लखनऊ में लोहिया की इस आदत के बारे में बताते हुए कहा कि “तुम लोहिया को
क्यों नहीं कहते कि वो कॉफी हाउस में लफंगों की इस संगत में क्यों अपंना अपना समय बर्बाद करते हैं। आचार्य जी ने बाद के वर्षों में भी अपनी इस शिकायत को दौहराया।
डॉ. साहब का इसपर अपना स्पष्टीकरण था। उन्होंने कहा कि मेरा अपना कोई घर नहीं है। मुझसे मिलने वालों का तांता लगा रहता है, मैं नहीं चाहता कि मेरे से मिलने वाले लोगों की मेजबानी का बोझ मेरे मेजबान पर पड़े। इसलिए मैं उनसे
कॉफी हाउस में मिलता हूँ। बीस के
दशक में बर्लिन बुद्धिजीवियों के आकर्षण का केंद्र था। बढ़ते हुए अधिकनायकवादी नाजीवाद तथा कम्यूनिज्म के आंदोलन के बावजूद तीसर्वे दशक के शुरुआती दौर में भी बर्लिन तथा पश्चिमी यूरोप के अन्य शहरों के कॉफी हाउस में मानसिक रूप से स्फूर्तिदायक लोग आते थे। जिसमें नवविचारक लेखक, चित्रकार, वास्तुकार, संगीतज्ञ तथा नाटयकार इत्यादि होते थे। लोहिया कॉफी हाउस की बहस मुबाहसा से भी काफी जानकारी पाते थे। यहाँ तक भी कि, पानवाला, सड़क के किनारे चाय बेचने वाले, जूते की मरम्मत पालिश करने वालों के साथ बातचीत से उन्हें वैचारिक मन्थन में मदद मिलती थी।
परंतु पुराने ज़माने के लोग जैसे आचार्य नरेन्द्र देव जी, लोहिया के इस विशेष गुण को समझ नहीं पाते थे। लोहिया अन्य नेताओं से अलग, अपने और साधारण लोगों के बीच में कभी कोई फासला बनाकर नहीं रखते थे। मैं लोहिया के अलावा और
किसी ऐसे पुरुष या स्त्री को नहीं जानता जो महारानी अथवा मेहरानी के बीच की समानता के इस मानवीय मूल्य की इस तरह कद्र करता हो।
मुझे याद है कि सितंबर 1967 के अंत में डॉ. साहब ने मुझे अपने यहां बुलवाया। मैं उनको लेकर संसद भवन गया। हम दोनों स्टैनोग्राफरों के बैठने के स्थान पर गए, वहाँ पर उन्होंने टाइप करने के लिए कुछ डिक्टेट किया तथा मुझे कनाट प्लेस के इण्डियन कॉफी हाउस ले जाने के लिए कहा। उनकी तबियत ठीक नही
थी उनका रक्तचाप बहुत बढ़ा हुआ था। मैं उनको लेकर कॉफी हाउस गया, मैंने उनको एक कप कॉफी जिसमें बहुत सारा दूध मिलाया हुआ था पीने को दी। चाहे वह संसद
का सेंट्रल हॉल हो अथवा टैन्ट वाला कॉफी हाउस, लोहिया को केवल एक कप कॉफी पीने तक रोकना, संभव नहीं था यह मेरी उनसे अंतिम मुलाकात थी।

