अग्नि आलोक

*चुनाव आयोग,संविधान और सुप्रीम कोर्ट:चुनाव आयोग नंबर वन जनतंत्र का शत्रु !* 

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सुसंस्कृति परिहार 

आजकल वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा बुलंदी पर है।यह भारत के हर आंदोलन में दोहराया जा रहा है यहां तक कि पड़ौसी देश नेपाल में कुछ परिवर्तन के साथ प्रयोग हुआ है। आजकल चुनाव आयोग को नंबर वन जनतंत्र का शत्रु माना जा रहा है।जबसे प्रति पक्ष नेता राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस में आंकड़ों और प्रमाणों के आधार पर वोट चोरी का कच्चा चिट्ठा खोला है तब से लगातार भारत के कोने कोने से वोट चोरी की धांधली के मामले लगातार सामने आते जा रहे हैं।इस बीच प्रधानमंत्री के वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में हुई चुनाव की पकड़ी गई भारी गड़बड़ी से सत्ता प्रमुख की चूलें हिली हुई हैं।यह सब बिना चुनाव आयोग के सहयोग के बिना असंभव है।

इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा सरकार ने अपनी जीत को स्थायित्व देने के लिए आयुक्त के त्रिसदस्यीय चुनाव प्रक्रिया से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर अपने बहुमत का दुरुपयोग किया है।इस समिति में पहले एक सदस्य भारत सरकार का,दूसरा सदस्य लोकसभा में प्रतिपक्ष नेता और तीसरा सदस्य सीजेआई होता था। संशोधन के बाद अब दो सदस्य जब भाजपा सरकार से होंगे तो प्रतिरोध प्रतिपक्ष नेता करें भी तो दो की बात बहुमत से मानी ही जानी है। इसलिए इस पद पर सरकार की पसंद का चुनाव आयोग बनेगा जो निष्पक्ष कतई हो ही नहीं सकता है।एक स्वतंत्र इकाई को सरकार का गुलाम बना दिया गया।तिस पर चुनाव आयुक्त को गरुर ये कि सर्वोच्च न्यायालय उसके अधिकार क्षेत्र में दखल दे रहा है।

यह बात तब सामने आई जब सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर पर लगाई एक याचिका पर अपने निर्णय में कहा कि एसआईआर प्रक्रिया होनी चाहिए। लेकिन जब चुनाव नजदीक हों तो यह जल्दबाजी में सही ढंग से क्रियान्वित नहीं हो सकती। इसलिए फिलहाल मतदान में आधार कार्ड को शामिल कर चुनाव कराएं जाएं।इस आदेश से बिहार में मतदाता प्रसन्न हैं पर खिन्न है चुनाव आयोग या यूं कहें भारत सरकार। क्योंकि इस एसआईआर प्रक्रिया में जो जल्दबाजी में तैयार हुई है लाखों मतदाता शामिल नहीं थे।कहा जाता है कि उनमें से बहुसंख्यक भाजपा विरोधी हैं और विशेष वर्ग से आते हैं।इस सरकार के खेल बिगाड़ने से ही चापलूस संघ के रंग में रंगा चुनाव आयोग परेशान है और सर्वोच्च अदालत को अधिकार क्षेत्र में दख़ल बता रहा है।

चुनाव आयोग और सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय संविधान में प्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करता है। हालांकि सरकार ने उसको आयोग से हटा दिया है किंतु वह न्याय के हित में सरकार और चुनाव आयोग को संवैधानिक अधिकार के हनन का दोषी करार कर सकता है।

आज जिस तरह संविधान से इतर हटकर काम हो रहे हैं उस पर सीजेआई ने नेपाल जैसे हालात को ध्यान में रखकर साफ कहा है कि यदि यही चलता रहा तो देश को नेपाल जैसे हालात से बचाना मुश्किल होता। सीजेआई की इस टिप्पणी के बाद भी यदि सरकार और आयोग देश को गर्त में डालने प्रतिबद्ध है तो आगे जनता बेकाबू होकर स्वयं:फैसला ले तो आश्चर्यजनक नहीं होगा।अभी भी वक्त है संविधान के तहत् वह निष्पक्ष काम को सरकार तरजीह दे।भारत शांति प्रिय देश है।उसे आग में झौंकने से बचाए।

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