प्रियंक द्विवेदी
17वीं सदी में इंग्लैंड में सरकार और वहां के साम्राज्य के खिलाफ आवाजें उठने लगीं। जब वहां महसूस हुआ कि इससे उनकी परेशानी बढ़ सकती है, तो वो अपनी सत्ता बचाने के लिए लेकर आए सिडिशन कानून या देशद्रोह।यही कानून 1870 में अंग्रेजों के जरिए भारत आया। 1860 में जब देश में इंडियन पीनल कोड यानी IPC लागू हुआ, तब उसमें सिडिशन कानून का नामोनिशान तक नहीं था। लेकिन 1870 में IPC में संशोधन किया गया और धारा-124A जोड़ी गई। 124A वही धारा है, जो देशद्रोह करने पर लगाई जाती है। अंग्रेजों की खिलाफत करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों पर देशद्रोह की धारा लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। ये धारा महात्मा गांधी से लेकर भगत सिंह तक पर लगी थी।
हैरानी की बात ये है कि जिस इंग्लैंड से हमारे संविधान में देशद्रोह का कानून जोड़ा गया था, वहां इस कानून को 2009 में ही खत्म कर दिया गया है। लेकिन भारत में आज भी ये कानून लागू है। देशद्रोह के इस कानून की चर्चा इसलिए क्योंकि किसान आंदोलन के दौरान सरकार ने कई एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया है और उन पर 124A लगाया गया है। ग्रेटा थनबर्ग ने ट्विटर पर जो टूलकिट शेयर की थी, उस मामले में दिल्ली पुलिस ने बेंगलुरु की एक्टिविस्ट 21 साल की दिशा रवि के खिलाफ देशद्रोह की धारा लगाई है।
124A के इस्तेमाल पर सवाल भी उठते रहे हैं
IPC में धारा-124A में देशद्रोह की परिभाषा दी गई है। इसके मुताबिक, अगर कोई भी व्यक्ति सरकार के खिलाफ कुछ लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी बातों का समर्थन भी करता है, तो उसे उम्रकैद या तीन साल की सजा हो सकती है।जब-जब सरकार के खिलाफ कुछ भी बोला या लिखा जाता है या प्रदर्शन किया जाता है, तो उस पर सरकारी गाज गिरती है। तब-तब ये कानून चर्चा में आ जाता है, जैसा इस बार हो रहा है। इस कानून के इस्तेमाल पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।
गिरफ्तारियां तो होती हैं, लेकिन दोष साबित नहीं होते
केंद्र सरकार की एक एजेंसी है नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB। ये एजेंसी 2014 से 124A के तहत गिरफ्तार हुए लोगों का डेटा रख रही है। सबसे ताजा आंकड़े 2019 तक के हैं। NCRB के मुताबिक, 2014 से 2019 तक 124A के तहत 559 लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन इनमें से सिर्फ 10 लोगों को ही दोषी ठहराया गया।
गिरफ्तारी ज्यादा, दोषी कम; इसके दो कारण
1. सबूत जुटा पाना बहुत मुश्किल होता है
स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उज्ज्वल निकम कहते हैं कि देशद्रोह के मामलों में दोष साबित करने के लिए सबूत होना चाहिए। आम तौर पर ऐसे मामलों में पुलिस और अन्य एजेंसियों के पास डायरेक्ट एविडेंस की कमी होती है। ऐसा नहीं है कि डायरेक्ट एविडेंस ही सबकुछ है। पर साबित तो हो कि साजिश रची गई है। फिर ज्यादातर मामलों में साजिश विदेशी धरती पर रची जाती है, जिससे सबूत जुटाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
2. सरकार जल्दबाजी में देशद्रोह की धारा लगा देती है
मानवाधिकार पर काम करने वाली संस्था पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के सीनियर वकील संजय पारिख बताते हैं कि देशद्रोह के मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि जब तक किसी बात से या कमेंट से कानून व्यवस्था नहीं बिगड़ती है, तो उसे देशद्रोह नहीं माना जा सकता। पर सरकारें इसे नजरअंदाज कर इस धारा का गलत इस्तेमाल करती हैं।वो बताते हैं कि हमारे देश में TADA और POTA जैसे कानून थे, इनका कन्विक्शन रेट बहुत कम था। बाद में इन कानूनों को निरस्त कर दिया गया। अब UAPA भी लाया गया है, इसका कन्विक्शन रेट भी बहुत कम है। कुल मिलाकर सरकार अपनी कमियां छिपाने के लिए लोगों पर देशद्रोह की धारा जल्दबाजी में लगा देती है, लेकिन बाद में इसे साबित नहीं कर पाती।
124A के सबसे ज्यादा मामले भाजपा शासित राज्यों में
ज्यादा पुराने आंकड़ों पर नहीं जाएं और NCRB के सिर्फ 2019 के आंकड़े ही देखें तो पता चलता है कि 124A के तहत सबसे ज्यादा मामले उन राज्यों में दर्ज होते हैं, जहां भाजपा या उसके सहयोगियों की सरकार है।2019 में 124A के तहत 96 मामले दर्ज किए गए थे। इनमें से 68 यानी 73% मामले उन 5 राज्यों में दर्ज किए गए थे, जो भाजपा शासित है। सबसे ज्यादा 22 मामले कर्नाटक में दर्ज हुए थे, जहां भाजपा की सरकार है। उत्तर प्रदेश में 10 मामले दर्ज किए गए थे।

