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*भारत में न्याय, असहमति और ‘लोकतंत्र’ पर हमले को रोकना केवल कानून से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जागरूकता से संभव*

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“सनातन और संतों के काम में आने वाली सभी बाधाओं को स्वयंसेवक डंडा लेकर दूर करेंगे।”
                                                            – आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत (6 नवम्बर, 2024, चित्रकूट)

11 महीने बाद, 6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने वाले व्यक्ति ने कहा– “सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान।” सुप्रीम कोर्ट में हुआ यह जूता कांड उसी क्रम का विस्तार है, जो पिछले दशक में बुद्धिजीवियों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ लगातार देखा गया है। कभी यह हमला संस्थागत रूप में होता है, तो कभी संगठनों या स्वतंत्र व्यक्तियों के नाम पर।

सत्ता असहमति को अपराध बना रही है

रोहित वेमुला की आत्महत्या से लेकर नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी, गौरी लंकेश की हत्या तक, और भीमा-कोरेगांव के कार्यकर्ताओं की जेल तक – हर जगह सत्ता के आलोचकों को ‘देशद्रोही’ बताकर चुप कराने की साज़िश जारी रही है। न्यायिक हिरासत में फादर स्टेन स्वामी की मौत (जो वस्तुतः हत्या थी) इसी श्रृंखला का हिस्सा है। विश्वविद्यालयों में विचार, बहस और असहमति को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से जोड़कर प्रोफेसरों और छात्रों को निशाना बनाया जाता है। जब विचारक बोलते हैं, तो उन्हें ‘अर्बन नक्सल’, ‘देशद्रोही’ या ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का सदस्य कहा जाता है; और अब न्यायाधीशों को भी उसी श्रेणी में रखा जाने लगा है। यह सब उस  का हिस्सा है, जो ‘लोकतंत्र की आत्मा’ – यानी असहमति, बहस और आलोचना – को अपराध बनाना चाहती है।

27 जनवरी 2020 को दिल्ली में केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने नारा लगाया – “देश के गद्दारों को गोली मारो।” इसके कुछ ही सप्ताह बाद, 23 फरवरी 2020 को दिल्ली में दंगे भड़के, जिनमें 53 लोग मारे गए, 400 से अधिक घायल हुए और सैकड़ों घर-दुकानें जला दी गईं। उसी समय से दिल्ली के मुस्लिम युवाओं को जेल में रखा गया और आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला। यही हाल भीमा-कोरेगांव के कार्यकर्ताओं, आदिवासी इलाकों, जम्मू-कश्मीर-लद्दाख और उत्तर-पूर्व के नागरिकों के साथ भी देखने को मिला।

लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता, वह नागरिक चेतना से जीवित रहता है। भारत में न्यायपालिका हमेशा अंतिम उम्मीद का प्रतीक रही है। लेकिन जब न्यायाधीश, पुलिस और प्रशासन संवैधानिक मूल्यों को एक विचारधारा के हवाले कर देते हैं, तब संस्थाएँ बेमानी हो जाती हैं। भारत की न्याय व्यवस्था, जो पहले ही आम लोगों के लिए जटिल और महंगी थी, अब उन लोगों के लिए और कठिन हो गई है जो सरकार की विचारधारा से असहमत हैं। भाजपा के सत्तासीन होने के बाद यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हुई। बहुमत के नशे में चूर होकर सत्ता ने न्यायपालिका पर दबाव बढ़ाया, और न्याय के लिए काम करने वाले ईमानदार व्यक्तियों को डराने-धमकाने का क्रम शुरू कर दिया।

कानून मंत्री किरण रिजिजू ने कहा था कि “न्यायपालिका जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की जगह नहीं ले सकती।” इसी स्वर में रविशंकर प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णयों को “जनादेश के खिलाफ” बताया। 17 अप्रैल 2025 को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा के प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए कहा – “अनुच्छेद 142 अब लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ एक ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ बन गया है, जिसे न्यायपालिका 24×7 इस्तेमाल कर सकती है।”

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने तो यहाँ तक कहा कि “भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना इस देश में हो रहे सभी गृहयुद्धों के लिए जिम्मेदार हैं।” यह केवल एक व्यक्ति की टिप्पणी नहीं, बल्कि उस वैचारिक मानसिकता का उद्घाटन है जो न्यायपालिका की स्वायत्तता को संदेह के घेरे में लाना चाहती है। यह बयान संविधान के उस संतुलन पर सीधा हमला है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के नैतिक ढांचे को अलग-अलग और स्वतंत्र बनाए रखता है।

कभी वामपंथी आलोचक कहा करते थे कि ये तीनों स्तंभ पूंजीवादी राज्य-सत्ता के सेवक हैं, लेकिन आज भाजपा के मंत्री और सांसद स्वयं न्यायपालिका को खुलेआम निशाना बना रहे हैं। वे यह साबित करने की कोशिश में हैं कि सबसे बड़ी संस्था संसद है, और सभी को उसी के अधीन रहना चाहिए।

जब संसद के सदस्य खुलेआम कहते हैं कि न्यायपालिका “गृहयुद्ध” पैदा कर रही है, तो यह जनता के भीतर न्याय के प्रति नफरत और हिंसा को वैधता प्रदान करता है। ऐसे बयान केवल असहमति नहीं हैं, बल्कि जनता के विश्वास को अदालतों से हटाने की सुनियोजित कोशिश हैं, ताकि न्याय की आवाज़ कमजोर पड़े और सरकार के हर कदम को ‘राष्ट्रहित’ की संज्ञा देकर वैध ठहराया जा सके। निशिकांत दुबे की टिप्पणी इसी वैचारिक युद्ध की अगली कड़ी है, जहाँ न्यायालय को ‘गृहयुद्धों का कारण’ बताकर जनता के सामने उसे दुश्मन के रूप में पेश किया जा रहा है। इससे सत्ता और केंद्रीकृत होती है और फासीवादी कदमों को आगे बढ़ाने में कोई बाधा नहीं रहती।

लिंचिंग, सामाजिक हिंसा और वैचारिक उन्माद

आज जब कोई न्यायाधीश सत्ता के मनमाने निर्णयों पर सवाल उठाता है, तो उसे “विकास-विरोधी”, “भारत-विरोधी” या “अराजक” कहा जाता है। न्यायपालिका संस्था के रूप में असफल रही है। वह आम जनता को न्याय नहीं दे पाई और आरएसएस की विषैली विचारधारा को रोकने में भी विफल रही है।

यह वैचारिक हमले अब केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने जनता की चेतना को हिंसक बनाना शुरू कर दिया है। नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के एक महीने बाद ही पुणे में आईटी प्रोफेशनल मोहसिन शेख की हत्या हुई। हिंदू राष्ट्र सेना के सदस्यों ने संदेश फैलाया – “पहला विकेट गिरा।” इसके बाद देशभर में लिंचिंग की घटनाएँ तेज़ी से बढ़ीं। रामगढ़ लिंचिंग केस में आठ दोषियों को केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने माला पहनाकर सम्मानित किया। अलवर में पहलू खान की लिंचिंग के बाद साध्वी कमल दीदी ने आरोपी से मुलाकात कर उसे “आज के समय का भगत सिंह और आजाद” बताया और कहा – “पूरा भारत तेरे साथ है और हम अपने देश में ऐसे काम नहीं करेंगे तो कहाँ कारेगे?”

8 सितंबर 2015 को गोमांस की अफवाह फैलाकर अखलाक को घर से घसीटकर मार डाला गया। जब साहित्यकारों ने विरोध में अपने पुरस्कार लौटाए, तब भाजपा ने उन्हें “पुरस्कार वापसी गैंग” कहकर उपहास उड़ाया। कठुआ में आठ वर्षीय बच्ची के साथ मंदिर में बलात्कार और हत्या के बाद भी अपराधियों को बचाने के लिए ‘तिरंगा यात्रा’ निकाली गई। राजस्थान के राजसमंद जिले में मजदूर मोहम्मद अफराजुल की हत्या कर शंभूलाल रेगर ने उसका वीडियो वायरल किया। इसे लव जिहाद बताकर हत्यारे के समर्थन में जुलूस निकाला गया और 2.75 लाख रुपये इकट्ठा किए गए।

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री ने मॉब लिंचिंग पर कहना – “त्रिपुरा में आनंद की एक लहर चली हुई है। आप भी इस लहर का आनंद लीजिए। यह जनता की सरकार है, और जनता खुद एक्शन ले रही है।” यह दिखाता है कि सार्वजनिक आक्रोश अब व्यक्तिगत स्तर से उठकर संस्थागत रूप ले चुका है। मुसलमानों से शुरू हुआ यह वैचारिक उन्माद अब दलितों, आदिवासियों, स्वतंत्र विचारकों और प्रगतिशील संगठनों तक पहुँच गया है। सत्ता, संसद और मीडिया – तीनों जब एक ही विचारधारा के नियंत्रण में हों, तो स्वतंत्र संस्थाएँ निशाने पर आती हैं। निष्पक्ष रहने वाले न्यायाधीश अब राजनीतिक हमलों और वैचारिक हिंसा के नए निशाने बन चुके हैं। इसकी झलक उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी दिखी, जब एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को ‘नक्सल समर्थक’ बताकर ‘देशद्रोही’ साबित करने की कोशिश की गई।

मोहन भागवत या निशिकांत दुबे जैसे लोगों का जहरीला विचार, ‘पागल’ व्यक्ति के हाथ में पत्थर, चाकू या गोली बनकर निकलता है। सत्ता का यह नया रूप ‘वैचारिक एकरूपता’ पर आधारित है – जिसे न स्वतंत्र मीडिया चाहिए, न स्वतंत्र न्यायपालिका, न स्वतंत्र विचारक। उसे चाहिए केवल ‘एक आवाज़’, जो सत्ता के हर निर्णय को जयघोष की तरह दोहराए। इसी भारत का आज आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर जश्न मनाया जा रहा है।

भारत आज उस चौराहे पर खड़ा है, जहाँ न्याय, विचार और असहमति – तीनों पर संगठित हमले हो रहे हैं। अदालतों के न्यायाधीशों पर हमले, बुद्धिजीवियों को धमकियाँ, गालियाँ और फर्जी मुकदमे – ये सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं, बल्कि एक ही वैचारिक युद्ध की विभिन्न परतें हैं। यह केवल कानून या न्याय की नहीं, बल्कि समाज की आत्मा की लड़ाई है। जब कोई समाज असहमति को देशद्रोह समझने लगे, तो लोकतंत्र सिर्फ संविधान में बचता है, जनता के दिलों में नहीं। इसे रोकना केवल कानून से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जागरूकता से संभव है। 

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