दुष्यंत कुमार की कुछ गजलें इतनी कर्णप्रिय और क्रांतिकारी हैं कि अक्सर इन गजलों को इस देश में और सभी जगहों यथा सभाओं में, बैठकों में, स्कूलों में, कॉलेजों में, यूनियनों में, विधान सभा के पटल पर, संसद के पटल पर, आंदोलनों में ऐसी सभी जगहों पर अक्सर सार्वजनिक मंचों पर सर्वाधिक गाई जातीं हैं,कोई भी क्रांतिकारी प्रोग्राम शुरू होता है तो उसका आगाज भी इन्हीं ग़ज़लों से होता है और यहीं पर गजल सम्राट दुष्यंत कुमार, कबीर ,तुलसी, मीर और गालिब की पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। उनके अभिनंदन में, उन्हीं की ये सबसे मशहूर गजलें प्रस्तुत हैं,जो वर्तमान दौर की राजनैतिक अव्यवस्था के समय के लिए बिल्कुल समीचीन, समयोचित्त व न्यायोचित्त हैं
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यह सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ
होगा,
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।
यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है।
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों
इस दीए में तेल की भीगी हुई बाती तो है।
कैसी मशालें लेकर चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वह भी सलामत नहीं रही।
हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
रो रो के बात कहने की आदत नहीं रही।
गजब है सच को सच कहते नहीं वो
कुरानो उपनिषद खोले हुए हैं।
मजारों से दुआएं मांगते हो
अकीदे किस तरह पोले हुए हैं।
जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं है आदमी, हम झुंझुने हैं।
रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो।
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।
आप दीवार गिराने के लिए आए थे
आप दीवार उठाने लगे यह तो हद है।
मस्लहत आमेज होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।
मुझ में रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं
हर गजल अब सल्तनत के एक बयान है।
मेरी जुबान से निकली तो सिर्फ नज्म हुई
तुम्हारे हाथ में आई तो एक मशाल हुई।
फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है।
होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए
इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिए।
गूंगे निकल पड़े हैं जुबां की तलाश में
सरकार के खिलाफ यह साजिश तो देखिए।
रौनके जन्नत जरा भी मुझको रास आई नहीं
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है यह सूरत बदलनी चाहिए।
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी
शर्त मगर थी कि बुनियाद दिल्ली चाहिए।
हर गली हर गांव से हर सड़क हर शहर से
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
मेरे सीने में ना सही तेरे सीने में ही सही
हो कहीं भी मगर आग जलनी चाहिए।
साभार- जनकवि और सीनियर ऐडवोकेट,मेरठ कोर्ट,मेरठ, संपर्क- 98371 51641
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण

