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ठहरे हुए टापुओं के शहर में 

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         प्रखर अरोड़ा 

आपके इसी शहर में ठहरे हुए कई टापू हैं। यहाँ ज़िंदगी की पटरी से उतर कर लोग अपने शरीर के भीतर गोते लगा रहे हैं। ये सुई चुभा रहे होते हैं और एक तरफ से पानी, एक तरफ़ से रक्त की नली शरीर से बाहर दौड़ रही होती है। गलियारे से गुज़रते हुए नज़र उनसे मिल जाती है जो दरवाज़े से किसी को निहार रहे होते हैं। खोज रहे होते हैं कि कोई नज़र उनसे टकरा जाए। 

    मैं उधर से गुजरता हूँ. एक जाना-पहचाना चेहरा उनसे टकराता है। कहाँ देखा है, वही तो नहीं लेकिन यहाँ कहां। लाल और नीली पाइप से बंधे हाथ किसी तरह उठते हैं और अभिवादन करते हैं। मैं भी मुस्कुरा देता हूँ। 

   जी मैं हूँ। आप ठीक हैं? उनकी आँखें चमक जाती हैं। दरवाज़े पर कंधा टिकाकर बातें करने लग जाता हूँ। हाँ, ये तो एकदम वही हैं। 

    जी। वही हूँ मै. मैं उनसे सहमति व्यक्त करता हूँ.

आप ठीक तो हैं, यहां कौन है? मैं उन्हें वहां पाकर जानना चाहता हूँ.

   नहीं पहले आप बताइये कि आप ठीक हैं? 

   गहरे तकलीफ़ में आदमी अपनी पीड़ा छुपा लेता है। मुस्कुरा देता है। 

     मैं बात बदलता रहता हूँ जैसे नर्स सलाइन वॉटर की बोतल बदलती है और चुपके से चुभा कर दवा दे जाती है। आप कहाँ से आए हैं? हार्ट, किडनी, पाँव की बात करने लग जाता हूँ। 

      कोई आकर सेल्फी खिंचा लेता है लेकिन आते-जाते उन सभी से एक रिश्ता सा महसूस होता है जो अपने-अपने बिस्तर पर लेटे बाहर की तरफ़ देख रहे होते हैं और मैं दिख जाता हूँ। 

लोग अपार धीरज और प्रार्थना की विनम्रता से भरे नज़र आते हैं। सबकी आवाज़ थमी-थमी सी लगती है। लिफ्ट में कोई नीचे देख रहा होता है, कोई ऊपर। कोई किसी को नहीं देख रहा होता है। आंखें खुली रहती है लेकिन कोई कहीं नहीं देख रहा होता है। एक रिपोर्ट। दूसरी रिपोर्ट। बीच में सूप।

     किसी कमरे से टीवी की आवाज़ और अचानक से हो जाती शाम। एकदम से सन्नाटा बर्फीली हवा की तरह पसर जाता है। एक आदमी के चलने की आवाज़ ही सौ आदमियों के चलने की आवाज़ में बदल जाती है। उसी के आने और जाने में सबका आना जाना हो जाता है। 

     किसी कमरे पुनः से टीवी की आवाज़ आने लगती है। दो बिस्तरों वाले कमरे में दूर से एक महिला से नज़र मिलती है। सारी उम्मीदों को हार कर किसी शून्य में ताकती हुईं। 

    टीवी और यू ट्यूब ने सबसे रिश्ता बना दिया है। मैं उन्हें हमेशा पर्दे से निकल कर आता दिखाई देता हूँ। उनकी निगाहें ऐसे देखती हैं जैसे अभी-अभी तो देखकर उठे हैं और मेरी उन्हें पहली बार देख रही होती हैं। दशकों की जान-पहचान से भरी आंखों से पहली बार मुलाकात का सामना होता है। 

    मेरा नमस्कार पहुंचता है और उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। किसी संत महात्मा दूत की तरह एक आवाज़ निकल आती है। सब ठीक हो जाएगा। 

    उनकी आस बंध जाती है। बाद में सोचता हूँ। तुम हो कौन? तुम क्या जानते हो कल क्या होगा, अभी क्या होगा? कौन सी बीमारी और क्या होगा? तब तक दूसरे बिस्तर पर पड़े मरीज़ उठ खड़े होते हैं। 

    कैसे हैं?

 जी मैं ठीक हूँ।

 मैंने जिस टापू की बात की दरअसल वह एक अस्पताल है। 

लोग बेमकसद खड़े हैं। अचानक उनके पास इंतज़ार करने का बहुत सारा वक्त निकल आया है। जो आ रहा है वो यही एक दूसरे से कह रहा है, कोई जल्दी नहीं है। मैं हूँ।

      इस तरह की बातचीत को सुनता हुआ मैं लोगों को बदल रहा हूँ या लोग मुझे बदल रहे हैं। हर समय एक नए लोग से मिलना, बहुत थका देता है। कई बार जवाब नहीं दे पाता तो कई बार इतनी बातचीत हो जाती है कि जैसे किसी ने नमक की तरह उठाकर पानी में डाल दिया हो। मैं घुलता जाता हूँ। 

     काउंटर पर चाय बनाने वाली वो महिला बता रही है। कितना कुछ बता चुकी है। घऱ लौटते वक्त यही सोचता रहा, उसकी इतनी बात क्यों सुनी। घर पहुंच कर लगा कि दरअसल मैं ख़ुद को सुन रहा था। ख़ुद से कुछ कह रहा था। हमारा शरीर हमें भीतर से दिखाई नहीं देता। हम जिस शरीर को जीवन भर सजाते हैं वह शरीर हर बिस्तर पर बेहोश पड़ा हुआ है। 

    ऐसा लग रहा है कि शरीर नहीं है एक सड़क है। जिस पर बहुत सारे बिजली के खंभे गड़े हैं। जिनसे होकर बहुत सी तारें गुज़र रही हैं। डॉक्टर एक अच्छे बिजली मिस्त्री की तरह बल्ब बदल रहा है, कहीं बल्ब के तार बदल रहा है। वह भी काफी थक गया है।

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