यहां सड़कें श्मशान की राख से पटी हैं। जिधर नजर जा रही, कोई चेहरे पर राख मल रहा है, तो कोई चिता भस्म से नहाया हुआ है। कोई इंसानी खोपड़ियों की माला गले में पहने, मुंह में जिंदा सांप दबाए नृत्य कर रहा, तो कोई जानवरों की खाल पहनकर डमरू बजा रहा। एक तरफ चिताएं जल रही हैं, दूसरी तरफ लोग उसकी राख से होली खेल रहे हैं। यानी खुशी और गम साथ-साथ।

आम इंसान जो चिता की राख से दूर भागता है, आज वो इसे प्रसाद मानकर एक चुटकी राख के लिए घंटों इंतजार कर रहा है। भीड़ इतनी कि पैर रखने तक की भी जगह नहीं।
ये नजारा है बनारस की मसान होली का। मान्यता ये कि चिता की राख से होली खेलने पर भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। आज पंथ सीरीज में बात इसी मसान होली की…
काशी में होली से 4-5 दिन पहले ही मसान होली की शुरुआत हो जाती है। इसके लिए न सिर्फ देशभर से बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी भी यहां मसान होली खेलने आते हैं। यही वजह है काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास एक भी होटल या गेस्ट हाउस खाली नहीं है।
रास्ते में जगह-जगह अघोरी बाबा करतब दिखा रहे हैं। कोई हाथ में नाग लेकर घूम रहा है, तो कोई आग से खेल रहा। चिता की भस्म हवा में इस तरह घुली है कि दूर-दूर तक मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा।
हरिश्चंद्र घाट पर दिन-रात शव जलते रहते हैं। यहां के मुख्य आयोजक पवन कुमार चौधरी हैं। वे डोमराजा कालूराम के वंशज हैं। मसान होली को लेकर पवन चौधरी एक पौराणिक कथा सुनाते हैं।
‘राजा हरिश्चंद्र हमारे बाबा कालू राम डोम के हाथों इसी जगह पर बिके थे। उनकी पत्नी भी कालू राम डोम के यहां काम करने लगी थीं। जब राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी तारा से अपने बेटे के अंतिम संस्कार के लिए भी कर चुकाने को कहा, तो तारा ने अपनी साड़ी फाड़कर कर चुकाया।
उस दिन एकादशी थी। राजा की इस सत्यवादिता को देखकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और कहने लगे कि राजा तुम अपनी तपस्या में सफल हुए। तुम अमर रहोगे और यह दुनिया तुम्हें सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से जानेगी।
भगवान विष्णु के पादुका निशान आज भी हरिश्चंद्र घाट पर हैं। इसी स्थान से चिता भस्म होली की शुरुआत की जाती है।’
लोग ढोल-नगाड़े के साथ चिता की राख से होली खेल रहे हैं। उनके बीच से ही अंतिम संस्कार के लिए शव को ले जाया जा रहा है।
मणिकर्णिका घाट के डोम लोकेश चौधरी बताते हैं, ‘रंगभरी एकादशी के दिन शिव जी, माता पार्वती का गौना कराकर लाए थे। इसके बाद उन्होंने काशी में अपने गणों के साथ रंग-गुलाल की होली खेली, लेकिन वे श्मशान में बसने वाले भूत, प्रेत, पिशाच, किन्नर जीव जंतु आदि के साथ होली नहीं खेल पाए थे।
इसलिए रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद महादेव ने श्मशान में बसने वाले भूत-पिशाचों के साथ होली खेली थी। तभी से यहां मसान होली खेली जाती है।’
हरिश्चंद्र घाट पर शिव जी का एक मंदिर है। इसे मसान मंदिर कहा जाता है। यहां सुबह से ही उत्सव का माहौल है। शिवलिंग पर दूध, दही, शहद, फल, फूल, माला, धतूरा,गांजा, भस्म चढ़ाई जा रही है। पांच पुजारी रुद्राभिषेक करा रहे हैं। इसके बाद बाबा को धोती और मुकुट पहनाया जाता है। साल में एक ही दिन बाबा मसान मुकुट पहनते हैं।
इसके लिए एक रथ सजाया गया है। उस पर एक लड़के को शिव और एक लड़की को पार्वती बनाकर बिठाया जाता है। फिर चीता के सामने उनकी पूजा की जा जाती है। इसके बाद झांकी निकलती है।
झांकी में कीड़े-मकौड़े, सांप-बिच्छू लिए औघड़ों को देखते ही बनता है। इसमें महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। सिर पर मुकुट, हाथ में त्रिशूल, कटार, मुंह पर काला रंग और लाल रंग की बाहर लटकती जीभ। मानो साक्षात काली यहां उतर आई हैं।डीजे पर भक्ति गाने बज रहे हैं। ‘होली खेले मसाने में…काशी में खेले, घाट में खेले, खेले औघड़ मसाने में…।’
कुछ इस तरह निकलती है शिव की बारात।
ये झांकी यहां से करीब 700 मीटर दूर अघोराचार्य कीनाराम के आश्रम जाती है। फिर आश्रम से बाबा भोलेनाथ की बारात निकलती है। बारात में भीड़ ऐसी कि तिल रखने की भी जगह नहीं है। अघोरी और तांत्रिक तो इसमें शामिल है ही, आम लोग भी इसमें शामिल होने के लिए लालायित हैं।
आज रंगभरी एकादशी है। हजारों लोग अघोरियों को देखने आए हैं। कोई बोल रहा है कि ऐसे-ऐसे बाबा साल में एक बार ही दिखाई देते हैं। इसलिए इनका दर्शन करना सौभाग्य की बात है। मीडिया और यूट्यूबर्स का भी यहां हुजूम उमड़ा है। हर कोई ऐसे अद्भुत दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करना चाहता है।
दोपहर बाद करीब 2 बजे झांकी अघोरपीठ आश्रम पहुंचती है। इसके बाद सभी अघोरी बाबा और डोम राजा उसी जगह पहुंचते हैं, जहां भगवान विष्णु राजा हरिश्चंद्र के सामने प्रकट हुए थे। यहां एक मंच बना हुआ है। सभी मंच पर पहुंचते हैं।
इसके बाद शिवलिंग पर चढ़ाई गई चिता की भस्म मंगाई जाती है। अघोरी बाबा एक दूसरे पर चिताओं की राख उडेलने लगते हैं। इसके बाद बाकी लोग भी एक-दूसरे पर भस्म लगाने लगते हैं।
पवन कुमार चौधरी बताते हैं, अघोराचार्य कीनाराम, कालू राम डोम के शिष्य थे। उन्होंने इसी हरिश्चंद्र घाट पर शिव की साधना की थी और सिद्धी हासिल की थी। इसी वजह से शिव-पार्वती की पालकी यहां लाई जाती है। यहां अघोरपीठ की स्थापना की गई है। अघोरपंथ के लोग कीनाराम को शिव के रूप में भी पूजते हैं।
हर दिन अघोरपीठ से एक व्यक्ति हरिश्चंद्र घाट आता है और चिता की सुलगती लकड़ी कंधे पर रखकर अघोरपीठ ले जाता है। इन्हीं चिताओं की लड़कियों पर आश्रम में प्रसाद और लंगर बनता है। दूर दूर से लोग यहां अपनी अलग अलग समस्याओं के निवारण के लिए आते हैं। हजारों साल से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है।
होली, दिवाली और रंगभरी एकादशी को ही बाहर खुले में निकलते हैं अघोरी
पवन कहते हैं कि काशी में अघोरी गोपनीय तरीके से रहते हैं। वे साधना के लिए कब श्मशान आते हैं और कब चले जाते हैं, कोई नहीं जानता। वे होली, दिवाली की रात और रंगभरी एकादशी को खुले तौर पर आते हैं।
इन तीन दिनों में यहां वो सब देखने को मिलता है, जिसे कमजोर दिल वाले आम इंसान नहीं देख सकते। जैसे कोई अघोरी गुड़िया में सूई घोंप रहा होता है, कोई मुर्गे का सिर काटकर उसके खून से साधना करता है, तो कई मछली जला रहा होता है। जैसा संकल्प, वैसी साधना।’अघोरियों को किसी भी चीज से न भय होता है न तनिक भी घृणा होती है।
अघोराचार्य बाबा कीनाराम अघोर शोध एवं सेवा संस्थान चंदौली के मंत्री बाबा सूर्यनाथ सिंह कहते हैं, ‘अघोर का मतलब है जो घोर नहीं हो। यानी जो कठिन नहीं हो। यह एक मार्ग है, जिस पर अघोरी चलते हैं। इन्हें किसी भी चीज से तनिक भी घृणा नहीं होती है।
जैसे गंगा जिंदा-मुर्दा और पूरी गंदगी को अपने अंदर समाहित कर लेती है, फिर भी पवित्र बनी रहती है। उसी तरह अघोरी भी अपने अंदर सारी गंदगियों को समाहित करके पवित्र बना रहता है।
अघोर को तंत्र से कोई मतलब नहीं है। उसकी साधना पांच प्रकार की क्रियाओं पर होती हैं- मांस, मछली, मदिरा, मुद्रा और मैथुन। इसे पंचमकार कहते हैं। इसी तरह से मांस में पांच प्रकार के महामांस होते हैं, जिसमें इंसान का मांस भी शामिल है। हालांकि सभी अघोरी इंसान का मांस नहीं खाते।
अघोर मार्ग पर चलने वाले गृहस्थ हो सकते हैं, लेकिन अघोर साधक अविवाहित होते हैं। अघोरी बनने के लिए एक गुरु चुनना होता है। उससे दीक्षा लेने के बाद व्यक्ति अघोरी बन जाता है।’
आज भोलेनाथ की नगरी काशी में चिता की राख से आसमान पट गया है।
1. इंसान का मांस और मल तक खा जाते हैं अघोरी:श्मशान में बैठकर नरमुंड में भोजन, कई तो मुर्गे के खून से करते हैं साधना
रात 9 बजे का वक्त। जगह बनारस का हरिश्चंद्र घाट। चारों तरफ सुलगती चिताएं। आग की लपटें और उठते धुएं से जलती आंखें। कोई चिता के पास नरमुंड लिए जाप कर रहा, तो कोई जलती चिता से राख उठाकर मालिश, तो कोई मुर्गे का सिर काटकर उसके खून से साधना कर रहा है। कई ऐसे भी हैं, जो इंसानी खोपड़ी में खा-पी भी रहे हैं। इन्हें देखकर मन में सिहरन होने लगती है।
ये अघोरी हैं। यानी जिनके लिए कोई भी चीज अपवित्र नहीं। ये इंसान का कच्चा मांस तक खा जाते हैं। कई तो मल-मूत्र का भोग करते हैं। पंथ सीरीज में आज कहानी इन्हीं अघोरियों की…
हरिश्चंद्र घाट पर 24 घंटे चिताएं जलती रहती हैं। रात 9 बजे के बाद यहां अघोरी जुटने लगते हैं।
रविवार का दिन। बाबा मशाननाथ मंदिर में पूजा की तैयारियां हो रही हैं। आज महाकाल के औघड़ रूप की पूजा है। महाकाल को दही से नहलाया गया है। उन पर चिता की भस्म से त्रिमुंड और ओम बनाया जा रहा है। फल, मिठाई, पान और गांजे का भोग लगाया जा रहा है। कई भक्त अपनी जेब से शराब निकालकर महाकाल पर चढ़ा रहे हैं।
यहां बाबा कालू डोम परिवार के पवन चौधरी पूजा करते हैं। वही कालू डोम, जिनके यहां राजा हरिश्चंद्र ने खुद को बेच दिया था। वंशजों का दावा है कि उनके बाबा डोम भी थे और औघड़ भी। यह मंदिर अघोरियों की साधना का गढ़ है। बाबा कालू और बाबा कीनाराम ने यहां सिद्धि प्राप्त की थी। बाबा कीनाराम अघोरियों के पूर्वज हैं। जिनके नाम से बनारस में अघोर पीठ भी है।
पवन कहते हैं, ‘अघोरी और डोम का जन्म-जन्मांतर का नाता है। किसी अघोरी को तब तक सिद्धि प्राप्त नहीं होती, जब तक डोम का बच्चा उसे बांस से पांच बार मारता नहीं। डोम ही अघोर साधक को श्मशान में जरूरी चीजें उपलब्ध करवाता है।’
डोम ही हैं, जिन्हें अघोरी साधकों के तमाम ठिकानों की जानकारी होती है। एक डोम के जरिए ही अघोरी से मेरी मुलाकात हुई।
उन्होंने हमें हरिश्चंद्र घाट पर बने एक होटल में बुलाया। 40 साल के धनंजय रमेश पटकी मुंबई के रहने वाले हैं और पांच साल से अघोरी हैं। 27 हजार रुपए गुरुदक्षिणा देकर अघोरी बने थे। फिलहाल सात हजार रुपए महीने किराए का कमरा लेकर होटल में रहते हैं।
कमरे में सामान बिखरा पड़ा है, रोशनी काफी कम है। टेबल पर एक दो खोपड़ी रखी है- एक इंसान की और दूसरी बंदर की। उसके सामने बैठे ये बाबा अपनी साधना में लीन हैं। मेरे पहुंचने पर ध्यान तोड़ते हैं और बातचीत शुरू होती है।
मैंने पूछा- अघोर साधना में इंसानी खोपड़ी का क्या महत्व है?
बाबा कहते हैं- इंसानी खोपड़ी सत्य का प्रतीक है। साधक का काम खोपड़ी में जो भी शक्ति है, उसे जगाना है। ये मेरी सिद्ध की हुई खोपड़ी है। इसके जरिए मैं कोई भी काम कर सकता हूं। मेरे सामने निगेटिव शक्तियां आकर खड़ी हो जाती हैं।
ये शक्तियां अकाल मृत्यु या एक्सीडेंट में मरे किसी इंसान की आत्मा होती हैं। जिसे मुक्ति नहीं मिलती है, उसी को हम खोपड़ी के जरिए साधते हैं। इस शक्ति को हम मदिरा और मांस का सेवन भी करवाते हैं।’
तस्वीर में दिख रही बड़ी खोपड़ी इंसान की है। छोटी खोपड़ी बंदर की है। साइज और वजन के अलावा ऊपर से देखने में दोनों में कोई खास फर्क नहीं दिखता है।
मैं भी उस खोपड़ी को हाथ में लेकर देखना चाहती थी, लेकिन बाबा ने मना कर दिया। कहने लगे कि तुम बंदर की खोपड़ी हाथ में ले सकती हो। इसके बाद उन्होंने मुझे बंदर की खोपड़ी दे दी। इसका भी आकार इंसानी खोपड़ी की तरह ही है, लेकिन साइज और वजन कम। आमतौर पर लोग खोपड़ी देखकर डर जाते हैं, लेकिन मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ा।
मैंने बाबा से कहा कि खोपड़ी से कुछ क्रिया करके दिखाइए। इस पर वे कहने लगे कि सच्चा अघोरी किसी के सामने खोपड़ी से क्रिया नहीं करता।
ये क्रियाएं रात में ही होती हैं। रात में 11 बजे से 2.30 बजे के बीच या फिर सुबह तीन बजे से सूर्योदय तक। कई अघोरी तो पूरी रात साधना करते हैं। उसमें मांस, मछली और मदिरा का प्रयोग करते हैं। इस दौरान हमारे शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं होता है।
इसी श्मशान में पंचदशी जूना अखाड़े के नागा साधु रामचंद्र गिरी कई सालों से तप कर रहे हैं। इनके पास अघोरियों का आना-जाना लगा रहता है।
वे बताते हैं- असली अघोरी मदिरा पीकर इंसान का मांस भी खा जाता है। उसके लिए मांस खाना भी एक साधना है, जिससे भगवान नहीं बल्कि शैतान प्रकट होता है। अघोरी अगर ऐसा नहीं करेगा, तो उसे सिद्धि प्राप्त नहीं होगी। कई अघोरी तो मल-मूत्र तक खा-पी जाते हैं। श्मशान में रहने की वजह से अघोरियों के बहुत सारे चेले-चपाटे बन जाते हैं, जो उन्हें इंसान का मांस भी पहुंचा देते हैं।
अघोरियों का दावा- इंसानी खोपड़ी उनके इशारे पर घूमने लगती है
सूर्यनाथ सिंह बताते हैं- अघोरी खोपड़ी को धनंजय कहते हैं। मस्तिष्क, बुद्धि, विवेक की संरचना इसी खोपड़ी से होती है। इसमें पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तरह की एनर्जी होती है। इसके खप्पर को औघड़ अपनाता है।’
अघोरियों का कहना है कि वे बहाए गए शवों की खोपड़ी लेते हैं, लेकिन डोम भी अघोरियों को खोपड़ी उपलब्ध कराते हैं। शव को जलाते वक्त कपाल क्रिया होती है, जिसमें खोपड़ी फूटती है। खोपड़ी के फूटते वक्त जोर से आवाज आती है। अगर वह नहीं फूटती है, तो डोम बांस के डंडे से पांच बार मारता है और उसे तोड़ देता है।
ये बाबा कालू डोम परिवार के पवन चौधरी हैं, खुद को अघोरी भी मानते हैं। वे कहते हैं कि डोम का बच्चा जब तक साधक को पांच बार नहीं मारे, उसे सिद्धि नहीं मिलती।
आमतौर पर मृतक के रिश्तेदार-परिजन किसी भी लाश के जलते वक्त खोपड़ी के जलने का इंतजार करते हैं, लेकिन यहां भी मिलीभगत रहती है। कई शव ऐसे भी जलाए जाते हैं, ताकि उसकी खोपड़ी नहीं जले।
काशी के श्मशानों में अघोरियों से बातचीत करने बाद एक चीज तो साफ पता चलती है कि अघोरी की सारी दुनिया खोपड़ी में ही होती है। कई अघोरियों का दावा है कि इंसान की खोपड़ी उनके इशारे पर घूमने भी लगती है।
मांस, मछली, मदिरा, मुद्रा और मैथुन से साधना करते हैं अघोरी
अघोराचार्य बाबा कीनाराम अघोर शोध एवं सेवा संस्थान चंदौली के मंत्री बाबा सूर्यनाथ सिंह कहते हैं- अघोर का मतलब है जो घोर नहीं हो। यानी जो कठिन नहीं हो। यह एक मार्ग है, जिस पर अघोरी चलते हैं। इन्हें किसी भी चीज से तनिक भी घृणा नहीं होती है।
जैसे गंगा जिंदा-मुर्दा और पूरी गंदगी को अपने अंदर समाहित कर लेती है, फिर भी पवित्र बनी रहती है। उसी तरह अघोरी भी अपने अंदर सारी गंदगियों को समाहित करके पवित्र बना रहता है।
सूर्यनाथ सिंह कहते हैं- अघोर को तंत्र से कोई मतलब नहीं है। उसकी साधना पांच प्रकार की क्रियाओं पर होती हैं- मांस, मछली, मदिरा, मुद्रा और मैथुन। इसे पंचमकार कहते हैं। इसी तरह से मांस में पांच प्रकार के महामांस होते हैं, जिसमें इंसान का मांस भी शामिल है। सभी अघोरी इंसान का मांस नहीं खाते।
अघोरी कोई भी बन सकता है। अघोर मार्ग पर चलने वाले गृहस्थ हो सकते हैं, लेकिन अघोर साधक अविवाहित होते हैं। अघोरी बनने के लिए एक गुरु चुनना होता है। उससे दीक्षा लेने के बाद व्यक्ति अघोरी बन जाता है।’
बनारस के श्मशान घाटों पर इस अंदाज में आपको कई अघोरी मिल जाएंगे। सोर्स- गूगल
इस पंथ में मुख्य रूप से दो धाराएं हैं- शैव परंपरा और मातृ तांत्रिक परंपरा। शैव परंपरा में अघोरी शिव के औघड़ रूप की साधना करते हैं। माना जाता है कि आम इंसान को किसी भी शिव मंदिर की पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। उसे सिर्फ एक अघोरी ही कर सकता है।
जबकि मातृ तांत्रिक परंपरा के साधक कमाख्या देवी, तारापीठ और कालीपीठ जैसे शक्ति पीठों पर साधना करते हैं।
अघोर तामसिक और सात्विक, दोनों तरह की पूजा करते हैं। तामसिक पूजा में मांस, मदिरा और मछली का प्रयोग होता है। सात्विक में फल, इलाचयी, लौंग, जायफल, फूल जैसी चीजों का प्रयोग होता है।
अघोरियों का कहना है कि वे अपनी शक्तियों से लोगों का कष्ट दूर करते हैं।
होली, दिवाली और रंगभरी एकादशी को ही बाहर खुले में निकलते हैं अघोरी
पवन कहते हैं कि काशी में अघोरी गोपनीय तरीके से रहते हैं। वे साधना के लिए कब श्मशान आते हैं और कब चले जाते हैं, कोई नहीं जानता। वे होली, दिवाली की रात और रंगभरी एकादशी को खुले में आते हैं।
इन तीन रातों में यहां वो सब देखने को मिलता है, जिसे कमजोर दिल वाले आम इंसान नहीं देख सकते। मसलन कोई अघोरी गुड़िया में सूई घोप रहा होता है, कोई मुर्गे का सिर काटकर उसके खून से साधना करता है, तो कई मछली जला रहा होता है। जैसा संकल्प, वैसी साधना।
अघोरियों की इस साल की होली का वीडियो देखिए…
अघोरियों को औघड़, अवूधत, कापालिक, सांकल्य, विदेह परमहंस, औलिया और मलंग भी कहते हैं। 16वीं सदी में अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी महाराज और 20वीं सदी अघोरेश्वर राम जी ने आम जनता के बीच इसका प्रचार-प्रसार किया। अघोरी नवग्रह शांति साधना से लेकर आत्मरक्षा, देह रक्षा, धनप्राप्ति, शादी, पुत्र प्राप्ति, आपत्ति निवारण, रोग निवारण, मारण, वशीकरण समेत कई कामों को पूरा करने का दावा करते हैं। यह काम करने के लिए वे अपने गुरु से मंत्र लेते हैं।
2. रात 12:30 बजे होती है निहंगों की सुबह:सुबह बकरे का प्रसाद बंटता है, घोड़ा इनके लिए भाई जान है और गधा थानेदार
निहंग एक तरह से सिख धर्म की रक्षा के लिए बनी फौज है। तकरीबन 400 साल पहले सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने इसकी नींव रखी थी। ये आज भी फौज की तरह छावनी बनाकर रहते हैं और रेजिमेंटों में बंटे होते हैं। इनकी सबसे बड़ी रेजिमेंट है शिरोमणि अकाली बुड्ढा दल। इसका प्रमुख जत्थेदार होता है।
बाबा बलबीर सिंह इसके 14वें जत्थेदार हैं। वे कहते हैं- निहंग यानी संस्कृत में निडर और शुद्ध। फारसी में इसका मतलब है मगरमच्छ और तलवार। ये एक ऐसा पंथ है जिनकी बाणी यानी बोली और बाणा यानी पहनावा बाकी सिखों से अलग है। इनका खाना और नहाना भी अलग है। इनका कोई ठिकाना नहीं।
यह लगातार चलते रहते हैं। जिस वजह से इन्हें चक्रवर्ती भी कहा जाता है। यह गुरु की ‘लाडली फौज’ है। दुनिया में इस पंथ के दस लाख से ज्यादा सिख हैं, जिनमें हर जाति के लोग हैं। देशभर में इनकी 700 से ज्यादा छावनियां हैं। निहंग अपने ठिकानों को छावनी कहते हैं। वहीं उनका गुरुद्वारा भी होता है।
रात 12:30 बजे होती है निहंगों की सुबह
जब हम और आप सो रहे होते हैं, उस वक्त आधी रात को निहंगों की सुबह होती है। अरदास करने के बाद वे अपने रोज के काम में जुट जाते हैं।
रात 12:30 बजे। अचानक गुरुद्वारे में नगाड़ा बजता है। वजह पूछने पर पता चलता है निहंगों की सुबह हो गई है। उन्हें जगाने के लिए नगाड़ा बजा है। जागने के बाद निहंग अपने नित्य क्रिया कर्म में जुट जाते हैं। वे हमेशा दातुन करते हैं, कभी टूथपेस्ट इस्तेमाल नहीं करते। बाल धोने के लिए शैंपू की जगह रीठे का इस्तेमाल करते हैं।
ये रीठे लोहे की कड़ाही में उबाले जाते हैं। अगर किसी वजह से रीठे ठीक से नहीं उबल पाए, तो इसकी जगह वे दही से बाल धोते हैं। मालिश के लिए देसी घी या सरसों के तेल का इस्तेमाल करते हैं।
कुछ देर बाद फिर से नगाड़ा बजता है। सभी निहंग दरबार साहिब में हाजिर हो जाते हैं। जहां गुरुबाणी का पाठ होता है। कीर्तन, कथा, अरदास करते हुए सुबह के दस बज जाते हैं। उसके बाद सभी निहंग नाश्ता करते हैं।
लोहे के बर्तन में ही खाना खाते हैं निहंग
बाबा हरजीत सिंह निहंगों के ‘तरना दल’ के जत्थेदार हैं। वे कहते हैं, ’नाश्ते के बाद निहंग फौजियों की तरह अपने-अपने काम में जुट जाते हैं। कोई घोड़े की देखभाल करता है, कोई हाथी संभालता है, तो किसी की ड्यूटी लंगर में होती है। लंगर यानी सामूहिक रसोई। लोहे की बड़ी कड़ाही में ही इनका खाना पकता है और लोहे के बर्तन में ही ये प्रसाद छकते हैं। सिखों में प्रसाद ग्रहण करने और सामूहिक रसोई में मिलकर खाना खाने को प्रसाद छकना कहा जाता है।
निहंग लोहे को पवित्र मानते हैं। इसलिए वे खाना पकाने के साथ ही भोजन भी लोहे के बर्तन में ही करते हैं।
दोपहर के बाद शस्त्र-विद्या और घुड़सवारी का अभ्यास शुरू होता है। नए निहंगों और छोटे बच्चों को ट्रेनिंग दी जाती है। शाम को फिर से दीवान सजता है। कथा-कीर्तन और गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ होता है। इसके बाद प्रसाद में सभी को दातुन दी जाती है। फिर रात में लंगर के लिए नगाड़ा बजता है। चूंकि निहंग एक स्थान पर नहीं ठहरते हैं, लिहाजा अगले दिन के सफर की घोषणा भी नगाड़े बजाकर की जाती है।
इन छोटे-छोटे बच्चों का उत्साह देखिए। ये बच्चे भी निहंग फौज की ट्रेनिंग के लिए रेलवे ग्राउंड पहुंचे हैं।
इसके बाद मेरी मुलाकात जत्थेदार बाबा चरणदास से हुई। वे कहते हैं- हफ्ते में दो से तीन दिन के बाद बकरा काटा जाता है। ये बकरे ऐसे श्रद्धालु चढ़ाते हैं, जिनकी मन्नतें पूरी हुई होती हैं।
बकरा काटने से पहले भी एक अरदास होती है, जिसमें ये प्रार्थना की जाती है कि हम बकरे की मुक्ति दे रहे हैं ताकि उसे अगला जन्म मानव के रूप में मिले। बकरा एक झटके में काटा जाता है। फिर उसे लोहे के बर्तन में पकाया जाता है और सभी को परोसा जाता है। इसे महाप्रसाद कहा जाता है।
किसी गवर्नमेंट की तरह इनकी सत्ता होती है, सबके काम बंटे होते हैं
निहंग फौज का सबसे बड़ा रेजिमेंट है शिरोमणि अकाली बुड्ढा दल। इसके प्रमुख को जत्थेदार कहा जाता है। इस दल के अलावा अलग-अलग नामों से कई छोटे-बड़े दल काम करते हैं। अभी देशभर में तकरीबन 14 प्रमुख दल हैं। ये सभी शिरोमणि अकाली बुड्ढा दल के अंडर ही काम करते हैं।
बाबा बलबीर सिंह अभी शिरोमणि अकाली बुड्ढा दल के प्रमुख हैं। वे कहते हैं कि जत्थेदार का दर्जा किसी सरकार के प्रधानमंत्री जैसा होता है। हर विभाग के लिए किसी न किसी की जिम्मेदारी तय होती है। जैसे किसी सरकार में अलग-अलग विभागों के मंत्री होते हैं।
निहंगों की देशभर में 700 से ज्यादा छावनियां हैं। इनमें ज्यादातर छावनियां पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में हैं।
निहंगों के खर्च और बजट का बड़ा हिस्सा गुरुद्वारों में चढ़ावे से आता है। बाबा हरजीत सिंह कहते हैं कि बड़े गुरुद्वारे से महीने में 10 लाख रुपए तक चढ़ावा मिल जाता है, जबकि छोटे गुरुद्वार से कुछेक हजार रुपए मिलते हैं। इसके अलावा निहंगों की जमीनें और अलग-अलग जगहों पर दुकानें हैं। उनसे भी अच्छी-खासी रकम कलेक्ट हो जाती है।
सिर्फ सावन महीने में ही तोड़ते हैं भांग की पत्तियां, सालभर उसे ही पीते हैं
निहंग सिख भांग को शहीदी देग बोलते हैं। केवल सावन महीने में ही भांग की पत्तियां तोड़ी जाती हैं और फिर इन्हें सुखाकर रख दिया जाता है। भांग के इन पत्तों में काली मिर्च, बादाम और मेवे डालकर शरबत की तरह एक पेय बनाया जाता है। सुबह चार बजे और शाम के वक्त चार बजे निहंग इसे पीते हैं। पीने से पहले अरदास भी जरूर करना होता है।
ट्रेन में मुफ्त यात्रा करते हैं निहंग
निहंग देशभर में मुफ्त में कहीं भी ट्रेन से सफर कर सकते हैं। 1952 में जत्थेदार महेंद्र सिंह ननकाना, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले। पंडित नेहरू ने उनसे कहा कि निहंगों ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई है। आप बताओ कि हम इनके लिए क्या कर सकते हैं।
बाबा महेंद्र सिंह ने कहा कि निहंग गरीब हैं, इनके पास जमीन-जायदाद नहीं है, इन्हें अपने गुरुओं के यहां आने-जाने का किराया माफ कर दीजिए। इसके बाद से निहंगों का किराया माफ हो गया।
ब्राह्मण को पीपल और बकरी को आकाशपरी कहते हैं निहंग
निहंग नीले रंग का चोगा पहनते हैं। उनके हाथों में लोहे के कड़े और कमर से तलवार बंधी होती है। सिर के ऊपर वे बड़ी और ऊंची पगड़ी बांधते हैं। जो इनकी पहचान होती है।
निहंगों की अपनी खास बोली होती है। इसके पीछे एक दिलचस्प किस्सा है। दरअसल गुरु गोबिंद सिंह की फौज मुगलों पर आक्रमण के लिए योजना बनाती थी, लेकिन कहीं न कहीं से योजना लीक हो जाती थी। इस वजह से उनकी फौज हार जाती। इसका तोड़ निकालने के लिए निहंग सिखों ने अपनी नई वोकैबलरी तैयार की। इनमें करीब 600 से ज्यादा शब्द हैं। आज भी निहंग सिख उसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
मसलन निहंग पीपल को ब्राह्मण, मारपीट को सेवा करना, जनेऊ को जूंआ की पींघ, इंजन को तेजा सिंह, एक को सवा लाख, विकलांग को सुचाला सिंह, एक आंख वाले को सुजाखा, लोहे को सर्वलोह, रुपए को छिल्लड़, पगड़ी को दस्तार, चीख को अंगीठा, बस को नकवड्डी, मोटरसाइकिल को फटफट, नल को दसनंबरिया, बकरी को आकाशपरी।
मरने को असवारा करना, रजाई को अफलातून, किक्कर को गुलाब, साग को सब्जपला, झाड़ू को सुंदरी, लिंग को हन्ना, हाथी को कट्टा, मुर्गे को काजी, लंगोट को खिसकू, चिलम को खोती, राख को खंड, गूंगे-बहरे को गुप्ता, जंग को घल्लूघारा, सूई को चलाकण, जहाज को गड्डा, जहाज चढ़ने को अमृतपान करके सजना, मुसलमान को तुरक, दिन को प्रकाश सिंह, रात को अंजनी।
प्रसाद को गफा, दाल को भाजा, नमक को सरवरस, चीनी को चुप, गुड़ को सिरजुड़, मिर्च को लड़ाकी, कड़छी को दयालकौर, बैंगन को बटेरा, आलू को अंडे, मछली को जलतोरी, चना को बादाम, दूध को समुद्र, दही को जक्का, घी को पंजवा, करेले को तीतर, चाकू को कोतवाल, बेर को खजूर, मलाई को गूदड़, शराब को गंगाजल, आटे को चूना, नमक को चौथा, तेल को छेंवा, हलवे के प्रसाद को पंचामृत कहते हैं।
इनकी भाषा की एक बानगी और देखिए….
आप कहेंगे- लड़का पगड़ी बांध रहा है। निहंग कहेंगे- भुचंगी दस्तार सजा रहा है। आम आदमी बोलेगा औरत रोटी पका रही है, निहंग कहेंगे बीबी प्रसादे सजा रही है, आम आदमी कहेगा हलवाई हलवा बना रहा है, तो निहंग कहेंगे कि भाई देग सजा रहा है।
घड़दानी भगवान शिव की नगरी काशी में परंपराएं भी अनोखी और रोचक हैं। एक ओर पूरा देश होली की तैयारियों में जुटा है तो दूसरी ओर भूत भावन भगवान शिव की नगरी काशी में चिता भस्म की होली से रंगपर्व की आस्था गुलजार है।
वैसे तो महाशिवरात्रि पर काशी में बाबा विश्वनाथ के विवाह के बाद से ही होली की परंपरा का विधान है। लेकिन, बाबा का गौना रंगभरी एकादशी के दिन होने के बाद बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों को होली के हुड़दंग की अनुमति देते हैं तो काशी पूरी तरह होलियाने मूड में आ जाती है।
होली के हुड़दंग की अनुमति मिलते ही भूतभावन भगवान शिव के गण भूत प्रेत पिशाच भी महाश्मशान की चिता संग चिता भस्म की होली खेलते नजर आते हैं। छायाकार भैरव जायसवाल के कैमरे की नजर से देखिए काशी के श्मशान घाट पर चिता भस्म की अनोखी होली-
भोले नाथ का गौना रंगभरी एकादशी के दिन होने के साथ ही भूतभावन शिव के गण होली के मूड में आ जाते हैं।
बाबा से होली खेलने की अनुमति लेने के बाद मशाननाथ के साथ भक्त चिता की भस्म संग होली खेलते हैं।
एक ओर धधकती चिताएं तो दूसरी ओर होली का उल्लास, यही औघड़दानी भगवान शिव की काशी है।
भोले नाथ का गौना रंगभरी एकादशी के दिन होने के साथ गण होली के मूड में चिताओं के बीच आ जाते हैं।
रंगभरी एकादशी के दिन से ही काशी में भक्तों के बीच शिव का गण बनकर होली खेलने की परंपरा रही है।
भोले नाथ का गौना होने के साथ काशी होली के मूड में पूरी तरह आ जाती है।
भगवान शिव के स्वरूप मशान नाथ के प्रतीक श्मशान घाट पर चिताओं की भस्म से होली शुरू हो जाती है।
श्मशान घाट पर मान्यता है कि काशी में स्वयं भगवान शिव अपने भक्तों को तारक मंत्र देते हैं।
भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए चिता भस्म की धूनी रमाने वाले भस्म की होली खेलते हैं।
भगवान शिव के गणों का रूप धरकर आस्थावान श्मशान घाट पर चिताओं के बीच राग विराग का संदेश देते हैं।
औघड़दानी भगवान शिव की नगरी काशी इसी के साथ ही होली के रंगों में भी डूब जाती है और अबीर गुलाल के साथ ही रंगों का खुमार आस्था की डोर पर सवार होकर रंगोत्सव को पर्व का आकार देते हैं।