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पिछले 14 वर्षों में रिठाला की कबाड़ी बस्ती के लोग तीन बार अपने आशियाने उजड़ते देख चुके हैं

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जब सरकार, पुलिस-प्रशासन और उनकी भलाई के नाम पर बने एनजीओ उनको प्रताड़ित और शोषण करने में लगे हैं तो आवश्यकता है कि नागरिक समाज आगे आये। हाशिये पर जी रहे इन लोगों को पुलिस-प्रशासन, स्थानीय दबंगों, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट कंपनियों और एनजीओ के शोषण से मुक्ति दिलानी होगी। यही वे लोग हैं जिनकी मेहनत से हमारे घर, मुहल्ले और बाज़ार साफ रहते हैं।

सुनील कुमार

दिल्ली की बहुसंख्यक मेहनतकश जनता झुग्गी-झोपड़ियों और कच्ची कॉलोनियों में रहती है। इन्हीं बस्तियों में वे लोग रहते हैं जो शहरों का निर्माण करते हैं, शहर को चलाते हैं और सफाई का काम करते हैं। ऐसी ही एक बस्ती है रिठाला की कबाड़ी (बंगाली) बस्ती। यह बस्ती तीन तरफ से ऊँची चारदीवारियों से घिरी हुई है। बस्ती के एक ओर बहुमंजिला अपार्टमेंट हैं और दूसरी ओर रिठाला गांव है।

यह बस्ती प्लास्टिक शीट, बांस और बल्लियों से बनी है। तीस साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यहां आज तक कोई बुनियादी सुविधा नहीं है; न शौचालय, न पीने का पानी। ज़रा-सी बारिश में यहां इतना कीचड़ हो जाता है कि बाहरी व्यक्ति का चलना मुश्किल हो जाता है। बस्ती के भीतर जाने के लिए केवल एक मुख्य रास्ता है, और इसी रास्ते पर 7 नवम्बर 2025 की रात करीब 10:30 बजे आग लगी।

इस आग में लोगों की वर्षों की मेहनत से जोड़ी गई पाई-पाई की जमा पूंजी और सामान जलकर राख हो गया। यह पहली बार नहीं है जब इस बस्ती में आग लगी हो। इससे पहले भी यहाँ 5 अप्रैल 2011 और 4–5 दिसम्बर 2016 को आग लग चुकी है।

यानी पिछले 14 वर्षों में इस बस्ती के लोग तीन बार अपने आशियाने उजड़ते देख चुके हैं। इस बार आग बस्ती के निकासी मार्ग पर लगी थी, इसलिए लोग पीछे की दीवार फाँदकर या तोड़कर किसी तरह बाहर निकल पाए। इस आग में जान और माल दोनों का नुकसान हुआ है।

यह बस्ती सरकारी ज़मीन पर बसी है, लेकिन 2016 तक रिठाला गांव के लोग इनसे किराया वसूलते थे। यही कारण था कि 2011 में जब झुग्गी जली थी, तो गांव वालों ने मीडिया को रिपोर्टिंग नहीं करने दी। इसलिए 2011 में किसी को मुआवज़ा नहीं मिला। 2016 में जब दोबारा आग लगी, तब प्रति झुग्गी 25,000 रू. का मुआवज़ा मिला, और उसके बाद बस्ती वालों ने गांव को किराया देना बंद कर दिया।

यहाँ रहने वाले लोग पश्चिम बंगाल के बीरभूम, मुर्शिदाबाद, बर्धमान और मालदा जिलों से आए हैं। करीब 95 प्रतिशत परिवार घरों से, सड़कों और कूड़ाघरों से कूड़ा उठाकर दिल्ली को स्वच्छ रखने का काम करते हैं। इस स्वच्छता के लिए उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता। वे कूड़े से प्लास्टिक की बोतलें, शीशे, कागज, गत्ता, लोहा आदि छांटकर बेचते हैं और उसी से अपनी जीविका चलाते हैं।

ये लोग घरों से कूड़ा उठाकर उसे अपनी झुग्गियों में लाते हैं, छँटाई करते हैं और फिर हफ्ते-दो हफ्ते में बेच देते हैं। अनुमानतः यह बस्ती हर महीने 300 टन से अधिक कूड़ा इकट्ठा करती है। बस्ती की महिलाएं दूसरे घरों में सफाई का काम करती हैं। इस तरह सरकार को प्रति माह लगभग 6–7 लाख रुपये की अप्रत्यक्ष बचत होती है।

शिलदुल शेख बताते हैं, “यह बस्ती पहले ऐसी नहीं थी। यहां गड्ढा था, पानी भर जाता था और जंगल फैला हुआ था। हम लोग शौच के लिए जंगल में जाते थे। धीरे-धीरे लोगों ने अपने घरों में मलबा भर-भरकर ज़मीन ऊंची की। जब जंगल काटकर इमारतें बन गईं, तब हमने घरों के पास गड्ढा खोदकर टॉयलेट बनाया और पानी के लिए नल लगाए। तब जाकर रहना संभव हुआ।”

अशिलदुल शेख, जिनका जन्म इसी झुग्गी में हुआ और जिनकी उम्र अब 29 वर्ष है, रोहिणी सेक्टर-4 (वार्ड नं. 44) से कूड़ा उठाने का काम करते हैं, जबकि उनके पिता रिक्शा चलाते हैं। वे भी वही कहानी दोहराते हैं कि बस्ती ने धीरे-धीरे अपने दम पर रहन-सहन का ढांचा बनाया।

मृतक मुन्ना की एक बेटी है। उनकी पत्नी और बेटी गांव में रहती हैं। मुन्ना पीतमपुरा से कूड़ा उठाने का काम करते थे और परिवार के लिए रोज़ी जुटाते थे। घायल राजेश सफदरजंग अस्पताल में ज़िंदगी की लड़ाई हार गए और 11 नवम्बर की सुबह 5 बजे उनकी मृत्यु हो गई। उनके दो बच्चे (15 और 14 वर्ष के) हैं जिनकी परवरिश वे अकेले कर रहे थे।

जफर, उम्र 32 वर्ष, मुर्शिदाबाद जिले के निवासी हैं। उनका सारा सामान जल गया। उनकी एक बकरी मर गई और दूसरी लापता है। वे कहते हैं, “इस आग ने हमें चार-पाँच साल पीछे धकेल दिया है।” जफर शकूरपुर एल-ब्लॉक में कूड़ा मशीन पर सफाई का काम करते हैं जहाँ उन्हें ₹5,000 मिलते हैं। वहीं से वे कूड़ा चुनकर लाते हैं। उनकी तीनों संतानें दिल्ली नगर निगम स्कूल में पढ़ती हैं, और उनकी पत्नी घर पर कूड़ा छाँटती हैं।

शहज़ाद शेख, बीरभूम जिले के निवासी हैं और पीतमपुरा में मशीन से कूड़ा उठाने का काम सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक करते हैं। उनका सारा सामान और कूड़ा उठाने की गाड़ी जल चुकी है, बच्चों की कापी किताबें और स्कूल ड्रेस जल चुके हैं।

रामजन के चार बच्चे हैं जो दिल्ली नगर निगम स्कूल में पढ़ते हैं पांचवीं, चौथी और तीसरी कक्षा में। उनके सभी किताबें और स्कूल ड्रेस जल गए हैं। वे बताते हैं कि सरकार की तरफ़ से अब तक कोई मदद नहीं मिली है। खाना एनजीओ या बाहर से आने वाले लोग दे रहे हैं। सरकार ने अस्थायी तौर पर सड़क किनारे रहने की व्यवस्था की है, पर कोई वहाँ नहीं जा रहा। सभी खुले में रह रहे हैं।

नजूल, उम्र 30 वर्ष, रोहिणी सेक्टर-8 में कूड़ा मशीन पर काम करते हैं। वे बताते हैं कि पहले उन्हें ₹5,000 मिलते थे, लेकिन पिछले छह महीनों से उन्हें यह पैसा भी नहीं दिया जा रहा है।

राना, वीरभूम जिले के रहने वाले हैं और दसवीं तक पढ़े हैं। वे तीन साल से अपने पिता के साथ इस बस्ती में रह रहे हैं। उनके पिता मोरशलीम खान (45 वर्ष) बस्ती में किराने की दुकान चलाते थे, जो पूरी तरह जल चुकी है। राना बताते हैं कि एक आदमी कम से कम 400 किलो रोज कूड़ा उठता है जिसमें से कुछ छांट कर घर लाते हैं। इस आग में ई-रिक्शा और रेहड़ी मिलाकर करीब 70–80 गाड़ियाँ, 7–8 दोपहिया वाहन, और एक माल ढुलाई वाली “चैम्पियन” गाड़ी जल गई।

इस बस्ती वालों से करीब सरकार को 7-8 लाख रू. की बचत होती है और दिल्ली की हजरों टन कूड़े की सफाई इन्हीं के हाथों से होती है।

इससे पहले शाहबाद-दौलतपुर में 19 झुग्गियाँ जलकर खाक हो गई थीं। वहां भी लोगों से इस क्षेत्र का दबंग 50 रू. प्रति गज के हिसाब से किराया वसूलता था। ये सभी लोग बंगाल के रहने वाले थे और कूड़ा उठाने का काम करते थे। इस तरह की घटनाएँ शाहबाद में लगातार होती रही हैं।

तीन माह पहले यही पास में 25 झुग्गियां जल कर खाक हो गई और उनको वहां से विस्थापित हो कर जाना पड़ा। आग लगने के बाद लोगों को उस जगह से हटा दिया जाता है, लोगों का कहना है की  अब राणा ने यह भी कह दिया है कि अब यहाँ कोई नहीं रहेगा। सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली।

कूड़ा उठाने वाले लोग चौतरफा मार झेलते हैं। दिल्ली में अधिकांश कूड़ा उठाने या बीनने वाले बंगाल और असम के मुस्लिम हैं। इन्हें अक्सर “बांग्लादेशी” कहकर पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। जहाँ भी ये रहते हैं, वहाँ के स्थानीय दबंग किराया वसूलते हैं।

घरों से जो कूड़ा उठाते हैं, उसका भी उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता। उनसे कहा जाता है कि कूड़ा उठाओ, छाँटो, और जो बिके वही तुम्हारी मजदूरी है।

प्राइवेट कंपनियों के आने के बाद इनसे मुफ्त में काम कराया जाने लगा है। जहाँ पहले खाता होता था, वहाँ अब मशीनें लगा दी गई हैं, और इन्हें वहीं फ्री में काम करना पड़ता है। कई बार कंपनी के सुपरवाइज़र और मैनेजर इनसे मासिक उगाही करते हैं। इनकी “भलाई” के नाम पर बनी कई एनजीओ भी इनके शोषण में शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार प्राइवेट कंपनियों को मजदूर उपलब्ध कराने का काम एनजीओ के जिम्मे है। लेकिन ये एनजीओ कंपनियों के मैनेजरों से मिलीभगत कर मजदूरों का वेतन हड़प लेती हैं और उनकी मजदूरी में बंदरबांट करती हैं।

यह कूड़ा अपने घरों में लाकर छाँटा जाता है, जिससे पूरी बस्ती कचरे के ढेर पर टिकी रहती है। यही कारण है कि जब आग लगती है, तो वह बहुत तेजी से फैलती है और पूरी बस्ती को चपेट में ले लेती है जिससे जान-माल दोनों का भारी नुकसान होता है।

जब सरकार, पुलिस-प्रशासन और उनकी भलाई के नाम पर बने एनजीओ उनको प्रताड़ित और शोषण करने में लगे हैं तो आवश्यकता है कि नागरिक समाज आगे आये। हाशिये पर जी रहे इन लोगों को पुलिस-प्रशासन, स्थानीय दबंगों, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट कंपनियों और एनजीओ के शोषण से मुक्ति दिलानी होगी। यही वे लोग हैं जिनकी मेहनत से हमारे घर, मुहल्ले और बाज़ार साफ रहते हैं।

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