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शराब बंदी के नाम पर नौटंकी:क्या 17 शहरों में अब नहीं मिलेगी शराब ?

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हरनाम सिंह

 #   पवित्रता एक

 अमूर्त अवधारणा है। अमूमन पवित्रता को नैतिक, धार्मिक मूल्यों से जोड़ा जाता है। क्या पवित्र है क्या अपवित्र यह व्यक्ति के सोच और विश्वास पर निर्भर करता है। अमूमन पवित्रता पर कोई विवाद होना ही नहीं चाहिए। लेकिन जब इस शब्द का उपयोग राजनीति द्वारा किया जाता है तो मंशा पर सवाल उठाना लाजिम है। मुख्यमंत्री ने कुछ शहरों को पवित्र घोषित कर वहां एक  अप्रैल से शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। सरकार ने प्रदेश के 17 शहरों की पवित्रता को शराब के मापदंड से तोला है। सरकार ने प्रदेश के शेष नगरों कस्बों, गांवों को क्यों अपवित्र ही रहने दिया है ? यह भी बताना चाहिए। प्रदेश में शायद ही कोई मानव बस्ती होगी  जहां धर्म स्थल न हों,और उन धार्मिक संरचनाओं को क्षेत्रवासी पवित्र और चमत्कारी न मानते हों। फिर केवल 17 शहरों पर ही यह कृपा क्यों की गई है ? जबकि यहां के निवासियों ने सरकार से ऐसी कोई मांग भी नहीं की थी। नहीं आंदोलन किया था।

 #राजस्व का नुकसान ?

              सरकार के अनुसार 17 शहरों में शराब बंदी से उसे450 करोड़ रुपए की हानि उठानी पड़ेगी। वर्तमान में प्रदेश में 3600 शराब की दुकाने हैं। इनसे सरकार को हर साल 15 हजार 200 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। सरकार ने विधानसभा में बताया था कि कोविड महामारी के बावजूद पिछले 10 वर्षों में शराब की बिक्री और राजस्व में वृद्धि हुई है। वर्ष 2010- 11 में सरकार को शराब से 3604 करोड़ रुपए मिले थे, जो 2021- 22 में बढ़कर 10.419 करोड़ रुपए हो गए। ऐसे में मात्र 17 शहरों की 47 दुकाने बंद होने से 450 करोड़ रुपए का नुकसान तो मामूली ही है।

                हकीकत तो यह है कि सरकार को लगभग ना के बराबर राजस्व की हानि होगी। इसे इस तरह समझा जा सकता है।

 #निकटवर्ती क्षेत्रों से खरीद सकेंगे शराब

प्रदेश में शराब की 47 दुकाने बंद होगी। जबकि इन शहरों के चारों ओर बसे नगरों, कस्बों, गांवों में शराब बिकती रहेगी। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रतिबंध के बावजूद कोई भी नागरिक प्रतिबंधित क्षेत्र में बाहर से लाकर शराब पी सकता है, अपने पास रख सकता है। अगर यही नीति है तो शराब बंदी को एक सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के प्रयास के अलावा और क्या समझा जाएगा।

 #पवित्रता का ढोंग

            पवित्रता के नाम पर सरकारें   जनता को बरगलाती है पहले भी सरकार ने उज्जैन सहित कई प्रचीन शहरों को  को पवित्र नगर घोषित किया था। उस घोषणा से यहां के नगर वासियों के जनजीवन में कोई अंतर आया ? क्या इन शहरों की गली मोहल्लों में से गंदगी पूरी तरह दूर हो गई ? नागरिकों के व्यवहार में सद्भावना, भाईचारे, धार्मिक- नैतिक मूल्यों का विस्तार हुआ ? इन नगरों में अपराध कम हो गए ? टैक्स चोरी, मिलावट खोरी बंद हो गई ? अगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है तो इस सरकारी पवित्रता के क्या मायने हैं ?

#शराब और मांसाहार निशाने पर

 जब कभी धार्मिक पवित्रता की बात होती है तो सरकार के निशाने पर शराब और मांसाहार ही होता है अन्य सामाजिक, राजनीतिक, आचरण  संबंधित बुराइयां नहीं।  वर्तमान मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही अंडा, चिकन आदि की दुकानों के खिलाफ कार्यवाही की थी। बावजूद इसके ना तो मांसाहार घटा नहीं कभी शराब की बिक्री प्रभावित हुई। सरकारी आंकड़े ही प्रमाणित करते हैं कि इनका उपभोग दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। प्रचार पाने के लिए सरकार नित नए शोशे छोड़ती है, ताकि जनता का ध्यान जीवन को प्रभावित करने वाले मूल मुद्दों से हटाया जा सके।

             एक तरफ शराब बिक्री से राजस्वृद्धि के उपाय किए जाते हैं दूसरी ओर सरकार द्वारा मद्य निषेध सप्ताह भी मनाया जाता है। एक तरफ सरकार बकरा- बकरी पालन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन के लिए  ग्रामीणों को प्रोत्साहित करती है, अनुदान देती है। दूसरी और मांसाहार को बुराई के रूप में प्रचारित किया जाता है। पवित्रता के नाम पर यह पाखंड ही तो है।

 #शराब की दुकान जल्द बंद हो

 शराब का नकारात्मक प्रभाव होता है यह हकीकत है। इसी कारण सभी धर्मों में इसके सेवन पर निषेध लगाया गया है। इसके बुरे प्रभाव से बचने के उपाय होना चाहिए। प्रतिबंध समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं है। एक सेवा निवृत पुलिस अधिकारी के अपने  अनुभव के अनुसार सांय 7 अथवा रात्रि 8  बजे तक शराब की दुकाने बंद होने से अपराधों, घरेलू हिंसा, दुर्घटनाओं और सड़कों पर होने वाले लड़ाई झगड़ों में कमी आ सकती है।

#विशेषाधिकार प्राप्त है दुकाने

          शराब की दुकानों पर गुमास्ता कानून लागू नहीं होता। इन्हें वाणिज्यिक प्रतिष्ठान की श्रेणी में रखा गया है, जिसके कारण शराब की दुकानें साप्ताहिक अवकाश से मुक्त है। इन्हें साल में केवल चंद दिन स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, शहीद दिवस, होली, दिवाली, चुनाव के दिन ही बंद रखा जाता है।

             शासकीय नियमों के अनुसार धार्मिक स्थलों शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों,घनी आबादी क्षेत्र के 100 मीटर के दायरे में शराब की दुकान नहीं खोली जा सकती है। शराब बंदी के समर्थक अपने आस- पास निगाह डाल कर देख लें कि क्या सरकार अपने ही द्वारा बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन करवा रही है ?अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो फिर शराब को लेकर यह पाखंड क्यों फैलाया जा रहा है ?

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