आरती शर्मा
दृश्य अब धुँधले पड़ने लग गये थे
और पुरानी सारी यादें ज़हन में
उमड़ने-घुमड़ने लगी थीं।
मौत दरवाज़े से अंदर आ चुकी थी
और कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठी
इन्तज़ार कर रही थी
पूरी दयानतदारी के साथ अपना फर्ज़ निभाते हुए
कि मैं अपनी आख़िरी कविता की
आख़िरी लाइनों तक पहुँच जाऊँ तो चलूँ।
तमाम पर्यावरणीय संकट से बेपरवाह
खिड़की के बाहर बसंतमालती के फूलों के गुच्छे
हिल रहे थे
और कुछ चिड़ियों के साथ किसी मसले पर
एक गिलहरी की नोकझोंक जारी थी।
और तभी वह आया,
वह दुर्दांत दार्शनिक और राजनीतिक चिन्तक
जिसे बरसों से दुनिया बदलने का नहीं,
बल्कि मेरे निराश हो जाने का इन्तज़ार था,
जिसने ताज़िन्दगी इस बात को नहीं माना कि
मामूली लोग कभी एकजुट होकर उठ खड़े होंगे
और अगर ऐसा हो भी जाये तो
कभी कोई ग़ैरमामूली
या समझदारी भरा काम वे कर सकेंगे
मसलन फ़ासिज़्म को मिट्टी में मिला सकेंगे
या कोई इंक़लाब ला सकेंगे।
बात सही थी कि मेरी ज़िन्दगी की शाम
आ चुकी थी
और चीज़ें अभी बदली नहीं थीं,
बल्कि इसके आसार भी अभी नज़र नहीं आ रहे थे
लेकिन मेरी उम्मीदों का बायस इंक़लाब का
कोई टाइम टेबल नहीं था।
सच है कि हालात बद से बदतर होते चले गये थे
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी अब ज़्यादा से ज़्यादा
उभरता जा रहा था कि चीज़ों को बदलने की
लोगों ने कोशिशें तेज़ कर दी थीं
और वे बीते हुए दिनों के तज़ुर्बात और बदलाव के
तरीक़ों व रास्ते के बारे में ज़्यादा वैज्ञानिक ढंग से
सोचने लगे थे
और यह एकदम लगने लगा था कि यह सब कुछ
ज़्यादा दिनों तक ऐसे ही नहीं चलने वाला।
और बात यह भी थी हम ताउम्र चीज़ों को बदलने की
जो भी कोशिशें करते रहे उनमें अब लगे हुए लोग
तादाद और समझ — दोनों मामलों में
हमारे समय से बहुत आगे थे।
इसलिए पहले से कहीं बहुत गहरी उम्मीद
और यक़ीन के साथ मैं इस ज़िन्दगी को
अलविदा कह रही थी
अपनी आख़िरी कविता के बारे में सोचते हुए।
मेरी बातचीत हुई उस दुर्दांत दार्शनिक और राजनीतिक चिन्तक से
और फिर वह गहरी मायूसी भरी ख़ामोशी में डूब गया।
हम दोनों की बातें सुनी कोने की कुर्सी पर बैठी मौत ने
और फिर उसने मुझसे कहा,”तुम्हारे लिए तो
मैं कल या परसों या उसके भी
अगले दिन आ जाऊँगी,
तुम इत्मीनान से अपनी कविता पूरी करो।
अभी मैं इस शख़्स को लेकर जा रही हूँ
जिसकी दिलचस्पी ज़िन्दगी से ज़्यादा मौत में
और बदलाव से ज़्यादा ठहराव में है।
ज़ाहिर है कि मेरा भी वक़्त
इसके साथ बढ़िया कटेगा।”

