अग्नि आलोक

प्रसंगवश : सम्राट अशोक, अस्मिता और सियासत

Share

पुष्पा गुप्ता

किसी को शुब्हा नहीं होना चाहिए कि राजनीति में जातीय अस्मिता को लेकर कैसे सक्रिय हुआ जाता है और परसेप्शन खड़ा किया जाता इसमें भाजपा की मास्टरी है. इसका एक नमूना कल पटना में दिखा जब भाजपा ने यहां बड़े धूम-धाम से सम्राट अशोक की जयंती मनायी. इस धूम-धाम में पूरे बिहार से भाजपा कार्यकर्ता पहुंचे थे. दिलचस्प है कि मंच से बड़े बेतकल्लुफ तरीके से कहा गया कि लव और कुश के वंशज हमारे साथ खड़े हैं.
जयंती अशोक की थी और याद लव और कुश के वंशज कुर्मी और कुशवाहा जातियों को किया जा रहा था. मतलब इतिहास के इस महान नायक को सिर्फ इसलिए याद किया जा रहा था कि बिहार की दो जातियों की अस्मिता इससे जुड़ी है.
हालांकि इसमें कुछ नया नहीं है. भारत के इतिहास में सबसे सफल शासकों में से एक सम्राज अशोक को जातीय खांचे में फिट करने का चलन बिहार में कुछ वर्षों से जारी है. खास कर जदयू और उसके कुर्मी और कुशवाहा नेता अशोक की जंयती मनाते हैं और उनको लेकर काफी उग्र रहते हैं. मगर इस बार जिस तरह भाजपा ने इस कोशिश में जदयू और राज्य के दूसरे दलों को मात दे दी यह अपने आप में दिलचस्प राजनीतिक चातुर्य का उदाहरण है.
खास तौर पर यह देखते हुए कि महज तीन महीने पहले यही भाजपा अशोक के मसले पर राज्य में डिफेंसिव मोड में थी.

साहित्य अकादमी प्राप्त साहित्यकार दया प्रकाश सिंहा ने एक इंटरव्यू में अशोक की तुलना औरंगजेब से कर दी थी और इस तुलना पर बिहार में बड़ा राजनीतिक संग्राम मच गया था. राज्य में जदयू के दो बड़े नेता ललन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि इनसे साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस लिया जाना चाहिए. तब दया प्रकाश सिंहा की पहचान भाजपा से जुड़े साहित्यकार के तौर पर थी. इसलिए बिहार भाजपा भी डिफेंसिव मोड में थी.
फिर सुशील कुमार मोदी और सम्राट चौधरी जैसे भाजपा नेताओं ने मोर्चा संभाला और उन्होंने भी निंदा की. फिर मामला किसी तरह ठंडा हुआ. तब लगा था कि शायद जदयू सम्राट अशोक को लेकर राजनीतिक रूप से सक्रिय होगी और बिहार में इसका परसेप्शन तैयार कर इस मुद्दे को अपने पक्ष मं भुनायेगी. मगर फिर जदयू ढीली हो गयी. जबकि भाजपा के दिमाग में यह बात रह गयी कि अशोक की अस्मिता को उभार को राज्य में कुर्मी और कुशवाहा जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद किया जा सकता है.
सम्राट चौधरी खास तौर पर सक्रिय हुए और जो जयंती समारोह मनाया गया इसमें उनकी बड़ी भूमिका रही.
मगर इस मसले में सबसे दिलचस्प है भाजपा और संघ की अपनी विचारधारा. वैचारिक रूप से संघ सम्राट अशोक को मित्र नहीं शत्रु के तौर पर देखता है. वह मानता है कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को बढ़ावा देकर ऐतिहासिक रूप से सनातन धर्म को कमजोर किया.
संघ मौर्य वंश का अंत करने वाले मेरे हमनाम पुष्यमित्र शुंग को सनातन का उद्धारकर्ता मानता है. संघ की वैचारिकता यह भी कहती है कि अशोक ने अहिंसा को बढ़ावा देकर भारत के युवाओं को पंगु बना दिया था, इसलिए मौर्य वंश का अंत जरूरी था. यह काम पुष्यमित्र शुंग ने किया.
सभा में बड़े भाजपा नेताओं ने सम्राट अशोक के खाते में अश्वमेध यज्ञ का क्रेडिट भी डाल दिया औऱ कहा कि उनकी तरह ही नरेंद्र मोदी अश्वमेध यज्ञ में जुटे हैं.

जबकि अश्वमेध यज्ञ का क्रेडिट पुष्यमित्र शुंग के खाते में है, यह सब जानते हैं. इसी वजह से राष्ट्रीय स्तर पर संघ के जुड़े लोग अशोक की आलोचना करते हैं. मगर बिहार में राजनीतिक वजहों से भाजपा और संघ ने जिस तरह अपना स्टैंड बदला है, वह जिस चतुराई से वह अशोक के पक्ष में शिफ्ट हुई है, वह एक दिलचस्प राजनीतिक परिघटना है.
हालांकि सम्राट अशोक एक ऐसे शासक रहे हैं, जिन्हें सिर्फ उनके दिग्विजय की वजह से याद नहीं किया जा सकता है. दुनिया भर में उनकी राजनीतिक पहचान उनके धम्म विजय की वजह से है. अशोक ने कलिंग विजय के बाद तय किया कि वह अब हिंसा और हथियारों के दम पर अपने साम्राज्य का विस्तार नहीं करेंगे.
वह दुनिया भर के लोगों के दिलों को जीतने के लिए धम्म का सहारा लेंगे. धम्म यानी बौद्ध धर्म. वह धर्म जो सत्य, अहिंसा और प्रेम को जीने की राह बताता है.

अशोक भवतः दुनिया का पहला शासक था जिसने धर्म प्रचार के लिए मिशनरियों को अलग-अलग मुक्लों में भेजा. उसके जमाने में संभवतः उसी की पहल पर बौद्ध धर्म की तृतीय संगिती बैठी थी.
उसके बाद एशिया के अलग-अलग मुल्कों में प्रचारक बौद्ध धर्म का प्रचार करने भेजे गये. इस धम्म प्रचार में उसकी इतनी आस्था थी कि उसने अपने बेटे महिंद और बेटी संघमित्रा को भी इस काम के लिए श्रीलंका भेज दिया. फिर दोनों तमाम उम्र वहीं रह गये.
यह वह जमाना था जब न यातायात के सुगम रास्ते थे, न तकनीक थी. पाल वाली नौकाओं पर सवार होकर ये धम्म प्रचार अनिश्चित और खतरों भरी यात्राओं पर निकलते थे. अशोक का विश्वविजय यही था कि आज एशिया के ज्यादातर मुल्कों में भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म का प्रभाव दिखता है. वह विजय 22 सौ साल भी अक्षुण्ण है.
मगर क्या भाजपा के नेता अहिंसा और प्रेम की इस ताकत का महत्व समझते हैं? क्या उनमें इतनी समझदारी है कि अशोक के रास्ते पर चल सकें? शायद नहीं. उनका मकसद बहुत छोटा है.
बिहार की दो जातियों को अपने पक्ष में करना. वे एक छोटे से मकसद के लिए दुनिया के सबसे महान शासक की अस्मिता का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह बहुत छुद्र बात है.
मगर क्या करेंगे राजनीति है. और इस राजनीति में तो उसने बिहार की दूसरी पार्टियों को मात दे ही दिया है.
{चेतना विकास मिशन)

Exit mobile version