| जूली सचदेवा \ _बौराये राष्ट्र और उफनाये राष्ट्रवादियों के लिंग प्रलाप का असल कारण है पोंगापंथीवाद। शिव वो है ही नहीं जो हिन्दू नाम की अपसंस्कृति समझती और बांचती है। आम मानस में शिव के जो रूप है वो दरअसल राजा रविवर्मा के पुराकथाओं के चित्रण के कारण पैदा हुए है।_ राजा रविवर्मा ने अपनी कल्पनाशक्ति से जो रूप निर्धारण किया अंधभक्ति और पोंगा पंडिताई ने उसे चरम उत्कर्ष दिया । बिना सरपैर वाले हिन्दूधर्म की अधिकांश मान्यताऐं कपोलकल्पित अंघविश्वासों और रूढियाके रथ पर सवार है। इन्हीं अंधविश्वासों और रूढियों के कारण समाज में तरह तरह की कुन्ठाऐं है। धर्म के नाम पर अपनी अपनी दुकान खोल कर बैठे बाबाओं फर्जी जगतगुरूओं के कारण सनातन संस्कृति विकृत हो कर जार जार हो चुकी है। _शिव सनातन संस्कृति के एैसे ज्योतिपुन्ज हैं जो दिगम्बर हैं उन्हें किसी वस्त्र या आवरण से ढका नहीं जा सकता वे नग्न हैं अर्थात सत्य हैं नग्नता से बड़ा सत्य कुछ भी नहीं।_ आप खुद ही कहते हैं ना कि अमुक को आज नंगा कर दिया मैने सीधी सी बात है आपने उसे कपड़े तो नहीं उतारे किन्तु किसी विषय पर आपने उसका सारा सच सामने ला दिया। सत्य को सामने लाने के लिये ही आपने नंगा कर दिया जैसा मुहावरा प्रयोग किया क्येंकि सच नंगा ही होता है। *दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।* *स्वानुभूत्येकमानाय नमरू शान्ताय तेजसे।।* अर्थात प्राच्यादिदिशाभिः, कालैः च यस्य मापनं नैव शक्यं विद्यते, माने वो दिशा और काल से अविछिन्न है उसका न कोई मान है ना ही कोई माप है ,दिशाओं और कालों से अपरिमित अनन्त तथा चैतन्यस्वरूप वाले, केवल व्यक्तिगत अनुभवों से जाने जा सकने वाले, शान्ति और ज्योति स्वरूप उस परब्रह्म को प्रणाम है। _इसी परब्रह्म को शिव कहते हैं वैदिक साहित्य में शिव का शाब्दिक अर्थ है शव अर्थात पार्थिव माने पूर्ण जो पूरा हो गया , इसी कारण मृत देह को पार्थिव कहते हैं।_ पूर्ण माने शून्य मतलब कुछ नहीं। शिव कुछ नहीं है और ये कुछ नहीं ही सबकुछ है। वो कैसे ? _इस कुछ नहीं अर्थात शून्य को विस्तृत रूप से समझाता है ईशोपनिषद् :_ *ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,* *पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।* इस श्लोक का शब्दार्थ है कि जीरो में जीरो जोडिये जीरो , जीरो में जीरो घटाइये जीरो , गुणा करिये या भाग आयेगा जीरो का जीरो ही। इसका भावार्थ है कि वह जो (परब्रह्म) दिखाई नहीं देता है, वह अनंत और पूर्ण है। क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। यह दृश्यमान जगत भी अनंत है। उस अनंत से विश्व बहिर्गत हुआ। यह अनंत विश्व उस अनंत से बहिर्गत होने पर भी अनंत ही रह गया। उपनिषदीय व्याख्याओं में इसी ज्योति पुन्ज और जीवात्मा के संयोग को लिंग कहा गया । लिंग का अर्थ है रूप, जिसे जीव देख सके और रूप बिना सृजन के संभव नहीं होता। शिवलिंग उसी सृजन का प्रतीक है। _सृजन सम्यक सृष्टि के परिचालन का मूल है ,लैंगिक रूप में जो शिव और शक्ति के मिलन को दर्शाते हैं।_ शून्य से जन्म लेकर वापस शून्य में समा जाने वाले इस सृजन को ही जीवन कहा गया है। जो वस्तुतः कुछ नहीं है। अर्थात शिव है। इसी लिये शिव को साहित्य में अनेकों नामों से टीकाकरों ने संबोधित किया है, इसीलिये शिव को दुर्धुर्ष कहा गया है , काल किसी से नहीं हारता जो हारेगा काल से हारेगा। शिव अनघ है वो ना पाप है ना पुण्य , शिव स्पन्दन रहित है माने स्थाणु है : स्थाणो गिरीशगिरिजेश महेशशंभोः।। _इसी लिये शिव ही परमेश्वर है। बाकी सब पुराणकाल से लेकर आशाराम और आरएसएस तक के धर्म के धंधेबाजों के बनाये प्रपंच हैं। जिनका काम मूर्खों को इकट्ठाकर उन्हें धूर्त बना कर उनके जरिये अपनी दुकान चलाना भर है।_ {चेतना विकास मिशन} |
