(दैनिक देशबन्धु का दृष्टिकोण)
~ सुधा सिंह
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बुधवार को प्रेस कांफ्रेंस कर केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि भारतीय मुद्रा पर धन की देवी माने जाने वाली लक्ष्मीजी और विघ्नों को दूर करने वाले भगवान गणेश की तस्वीरें छापी जाएं, ताकि भारत का हर परिवार अमीर बन सके। आईआईटी खड़गपुर से शिक्षा प्राप्त भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे, मैग्सेसे सम्मानधारक अरविंद केजरीवाल का ऐसा मानना है कि नोट पर अगर लक्ष्मी-गणेश की फोटो भी छपी हो तो इससे देश की अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी।
उन्होंने अपनी बात में वज़न डालने के लिए इंडोनेशिया का उदाहरण दिया, जो मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन उसकी मुद्रा पर गणेश जी की तस्वीर है। अरविंद केजरीवाल के प्रस्ताव को समर्थन देने के लिए उनकी पार्टी की विधायक आतिशी सिंह ने भी अपील की और इसे सीधे 130 करोड़ लोगों की भावना करार दे दिया। आम आदमी पार्टी के मुखिया और उनके इस प्रस्ताव के समर्थक विधायकों को यह ज़रूर बताना चाहिए कि आखिर देश के तमाम 130 करोड़ लोगों के मन की बात जानने के लिए उन्होंने कौन सी तकनीक अपनाई है।
क्या इसके लिए कोई आप ने कोई सर्वे किया, लोगों की रायशुमारी की, या फिर आम आदमी पार्टी अंतर्यामी पार्टी है। खैर पाठक यह भी जानते होंगे कि आतिशी सिंह भी उच्च शिक्षित हैं, उन्होंने ऑक्सफोर्ड से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की है और शिक्षा के क्षेत्र में वे काम कर चुकी हैं।
आम आदमी पार्टी जब रूप और आकार ले रही थी, तब राजनीति और व्यवस्था में बदलाव की नेक नीयत रखने वाले बहुत से लोगों ने इसके गठन में मदद की थी। ये सभी वैकल्पिक राजनीति को देश के भविष्य के लिए जरूरी मान रहे थे। इनमें से कई ऊंची तालीम हासिल किए हुए थे या फिर समाज में किसी ख़ास मुकाम पर पहुंचे हुए थे और जो साधारण तबके के लोग थे, उन्होंने अरविंद केजरीवाल का समर्थन इसी लिए किया कि जब इतने पढ़े-लिखे लोग एक नए नेता के साथ खड़े हैं, तो इसमें जरूर कोई ख़ास बात होगी।
हो सकता है अब तक देश में जो कमियां राजनीति और प्रशासन में महसूस की जा रही हैं, उनसे हटकर कोई बेहतर विकल्प ये नया नेता और उसकी पार्टी देंगे। कांग्रेस पर तो अन्ना आंदोलन ने भ्रष्टाचार का ठप्पा लगा ही दिया था और भाजपा की राजनीति राम मंदिर के इर्द-गिर्द घूमती थी। तो जिन लोगों को भ्रष्टाचार के साथ-साथ धर्म की राजनीति से भी तकलीफ़ थी, उन्होंने अरविंद केजरीवाल में उम्मीद की नयी किरण देखी।
कई नामी-गिरामी पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर उभारने के लिए जुट गए। लेकिन जल्द ही बहुत से लोगों का मोहभंग हो गया। या ये भी कह सकते हैं कि कुछ लोगों को आप और अरविंद केजरीवाल की राजनैतिक सच्चाई जल्द नजर आ गई और वो उससे अलग हो गए। लेकिन कई लोग अब भी वैकल्पिक राजनीति का भ्रम पाले बैठे हुए हैं। देखना होगा कि इन्हें असलियत कब तक नज़र आती है। या फिर सत्ता की ख़ातिर ये भी अपने चेहरों पर कोई और मुखौटा डाल लेते हैं।
वैसे अरविंद केजरीवाल ने राजनीति के अपने इरादों को पहले भी कई बार जाहिर किया है। इससे पता चलता है कि उनके बारे में जो धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील, परिवर्तनवादी नेता की धारणा बनी हुई है, वह असल में खोखली है। उनकी राजनीति संविधान से अधिक मनुवादी विचारों की हिमायती है।
इसलिए जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया, तो भाजपा के इस फ़ैसले का ‘आप’ ने स्वागत किया। उन्होंने कई बार खुद को कट्टर हिंदू के तौर पर पेश किया है, चाहे वह लॉकडाउन के वक्त गीता का पाठ हो या फिर टीवी पर हनुमान चालीसा सुनाना। श्री केजरीवाल भाजपा के हिंदुत्व को टक्कर देने के लिए दिल्ली में राम राज्य के मॉडल की बात करते हैं। उन्होंने दिल्ली के वरिष्ठ नागरिकों को चुनाव जीतने पर राम मंदिर की मुफ्त सैर का वादा किया था।
अभी गुजरात में भी बुर्जुगों के लिए अयोध्या यात्रा का उनका वादा है। पिछले साल दीपावली पर उनकी पूजा का प्रसारण टीवी पर हुआ था, जिसमें पंडाल राम मंदिर की तर्ज पर बना हुआ था। हिंदुत्व के अलावा भाजपा की राष्ट्रभक्ति के दांव को भी अरविंद केजरीवाल लपक चुके हैं। उन्होंने दिल्ली के स्कूलों में देशभक्ति की कक्षाएं शुरु करने की योजना बनाई है। इसके अलावा मेक इंडिया नंबर वन अभियान भी उन्होंने चलाया है।
ये सारे पैंतरे साबित करते हैं कि अरविंद केजरीवाल की और भाजपा की राजनीति में फर्क केवल तरीकों और तकनीकों का है, बाकी विचारधारा में कोई अंतर नहीं है। अब इसे भाजपा की बी टीम कहिए, अनुगामी कहिए या फिर उसकी प्रतिकृति, क्या फर्क पड़ता है। चिंतन इस बात पर होना चाहिए कि देश में धर्म को धुरी बनाकर राजनीति के जो नए खेल खेले जा रहे हैं, उनसे जनता किस तरह निपट सकती है।
लोकतंत्र में जनता के पास विकल्प हमेशा होने चाहिए, लेकिन ये विकल्प विचारधारा आधारित होने चाहिए और इस विचारधारा को खुलकर जनता के सामने रखा जाना चाहिए, तभी निष्पक्ष चयन संभव होगा। अगर विचारधारा अज्ञात हो और आवरणों में राजनीति की जाए, तो फिर यह जनता के साथ छल के सिवा कुछ नहीं है।
अरविंद केजरीवाल बेशक जितना चाहे पूजा-पाठ करें, लेकिन ये आस्था निजी दायरे तक ही सीमित रहनी चाहिए। उन्हें अपनी समृद्धि के लिए जितने टोटके आजमाने हों वे आजमा लें, लेकिन देश टोटकों से संपन्न नहीं बनता है, यह बात जनता को समझ लेना चाहिए। धर्म के नाम पर जनता को बरगलाने का ही नतीजा है कि आज देश के चंद लोग खरबपति बन कर बैठे हैं और बाकी जनता कमाई और बचत की उलझनों में ही लगी हुई है।
देवी-देवता की तस्वीरें लगाने से कोई संपन्न बन जाता तो दुनिया के तमाम देश ऐसा ही करने लगते और दुनिया के सबसे अमीर मंदिर में वर्ल्ड बैंक का दफ्तर खुल चुका होता।
बहरहाल, चुनाव के पहले हिंदुत्व का एक नया तीर अरविंद केजरीवाल ने चला दिया है।
इससे वोट का मकसद कितना सधेगा ये नतीजे बतलाएंगे, लेकिन फिलहाल एक अनर्थक बहस में देश को उलझाकर जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाकर श्री केजरीवाल ने भाजपा की मदद भी कर ही दी है।

