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90 के दौर में ही स्‍पेस साइंस में छा सकता था भारत, पर राह में अमेरिका बन गया रोड़ा 

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नई दिल्ली: भारत तीन दशक पहले ही अंतरिक्ष में बादशाहत कायम करने वाला था। यह और बात है कि तब उसकी राह में अमेरिका रोड़ा बन गया था। न सिर्फ अमेरिका ने खुद भारत की मदद नहीं की। अलबत्‍ता, रूस के भी हाथ बांध दिए थे। यह 90 का दौर था। तब भारत और अमेरिका के रिश्‍ते आज जैसे नहीं थे। फिर कई सालों की मशक्‍कत के बाद भारत ने वह टेक्‍नोलॉजी खुद बना ली जिसने अंतरिक्ष में जाने के उसके रास्‍ते खोल दिए। आज जब इसरो ने चंद्रयान-3 को अपने बाहुबली एलवीएम3-एम4 रॉकेट से लॉन्‍च किया तो वह जख्‍म भी ताजा हो गया। ऐसे मिशन के लिए बेहद शक्तिशाली रॉकेट की जरूरत होती है। इन रॉकेटों में क्रायोजेनिक इंजन का इस्‍तेमाल होता है। इस तरह का इंजन उस दौर में अमेरिका, रूस, जापान और फ्रांस ने बना लिया था। रूस को छोड़ भारत को इन सभी देशों ने टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर करने से मना कर दिया था।

भारत 90 के दौर में अपने स्‍पेस प्रोग्राम को विस्‍तार देने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहा था। उस दौर में भारत ने अमेरिका, रूस, जापान और फ्रांस से क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी की मांग की थी। इन देशों ने क्रायोजेनिक टेक्‍नोलॉजी बना ली थी। हालांकि, रूस को छोड़कर किसी भी देश ने यह टेक्नोलॉजी भारत को देने से इनकार कर दिया था।

रूस मदद करना चाहता था, अमेर‍िका ने डाला अड़ंगा
रूस से भारत को यह टेक्‍नोलॉजी मिलने की उम्‍मीद बढ़ गई थी। फिर अमेरिका ने अंतरराष्‍ट्रीय कानूनों की पट्टी पढ़ाकर रूस को भी टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर करने से रोक लिया। इसके लिए अमेरिका ने इंटरनेशनल मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) के उल्लंघन का हवाला दिया था। भारत की महत्‍वाकांक्षाओं को लेकर अमेरिका को खटका बैठ गया था। ऐसे में वह यहीं नहीं रुका। उसने इसरो और सोवियत संघ (रूस) के लॉन्च सर्विस प्रोवाइडर ग्लैवकोमॉस पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

अमेरिका की रोक के बावजूद भारत ने ग्लैवकोमॉस से ऐसे सात इंजन खरीद लिए। इनका इस्तेमाल शुरुआती जीएसएलवी रॉकेट लॉन्च करने के लिए हुआ। यह और बात थी कि इसरो चाहता था कि वह देश में ही अपना क्रायोजेनिक इंजन बनाए। इसरो के वैज्ञानिक इसे मुमकिन बनाने के लिए जी-जान से लग गए। आखिरकार उन्‍हें सफलता मिल ही गई। क्रायोजेनिक इंजन से लैस एलवीएम3 रॉकेट से 22 जुलाई 2019 को इसरो ने मिशन चंद्रयान-2 को लॉन्‍च किया।

इसरो ने बना ल‍िया था पीएसएलवी रॉकेट
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी के पास वैसे पीएसएलवी रॉकेट था। यह सिर्फ 1.7 टन के वजन को लोअर अर्थ ऑर्बिट में 600 किमी की दूरी तक ले सकता था। जियो ट्रांसफर ऑर्बिट में यह कम वजन के साथ जा सकता था। ऐसे में इसरो करीब तीन दशक तक क्रायोजेनिक इंजन बनाने के प्रयास में जुटा रहा। भारत ने पीएसएलवी रॉकेट के जरिये ही साल 2008 में चंद्रयान-1 और 2014 में मार्स ऑर्बिटर मिशन को अंजाम दिया था। हालांकि, इनका वजन डेढ़ टन से कम था।

क्रायोजेनिक इंजन में ज्यादा थ्रस्ट हासिल होता है। इसमें लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सि‍जन की जरूरत होती है। हाइड्रोजन को शून्‍य के नीचे 253 डिग्री सेल्सियस तापमान और ऑक्सीजन को -187 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखना पड़ता है। यह तापमान रॉकेट में रखना काफी मुश्किल होता है। इससे दूसरी चीजों पर असर पड़ता है। हालांकि, यह भी सच है कि इस तरह के इंजन के बगैर 3-4 टन वजनी पेलोड को जियो ऑर्बिट में 36,000 किमी की दूरी पर नहीं भेजा सकता था। अगर भारत को उसी समय क्रायोजेनिक इंजन की टेक्‍नोलॉजी मिल जाती तो वह 90 के दौर में ही स्‍पेस साइंस में छा सकता था।

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