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उदारीकरण के कारण श्रीलंका के नक्शेकदम पर बढ़ता भारत

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सुब्रतो चटर्जी

प्रधानमंत्री मोदी के उच्चस्तरीय बैठक में इस बात पर चिंता जताई गई है कि भारत में भी श्रीलंका जैसी स्थिति आ सकती है. इसे रोकने के लिए यह सुझाव दिया गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों को लोकलुभावन योजनाओं पर विराम लगा देना चाहिए. इस सुझाव के आलोक में कुछ सवाल मन में हैं, जिनका निराकरण ज़रूरी है.

पहला सवाल है कि ये लोकलुभावन योजनाएं क्या-क्या हैं और उन पर कितना खर्च होता है ? उदाहरण के तौर पर –

क्रोनी पूंजीवादी व्यवस्था की कमीनोलोजी को समझने के लिए इतना जानना काफ़ी है. अब इस समस्या के दूसरे पक्ष पर आते हैं. सवाल ये है कि किन परिस्थितियों में यह स्थिति बनी कि देश के 80 करोड़ लोग सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भिखारी बन गए कि वे आज मोदी झोला पर निर्भर हो गए !

इसका कारण नोटबंदी में छुपा है. मोदी के दृष्टिकोण से नोटबंदी इस मायने में सफल रही कि सारा पैसा भाजपा के पास आ गया और विपक्षी दलों के सामने दिवालिया होने की स्थिति आ गई. भाजपा इस पैसे का इस्तेमाल चुनाव जीतने और विधायक ख़रीदने में खर्च करती रही. रही सही कसर इलेक्टोरल बॉंड और प्रधानमंत्री केयर फंड ने पूरी कर दी.

देश की अर्थव्यवस्था के मद्देनज़र नोटबंदी ने MSME और असंगठित क्षेत्र को पूरी तरह से तबाह कर दिया. एक झटके में देश की 25% जनता ग़रीबी रेखा के नीचे चली गई. लॉकडाउन कोढ़ में खाज साबित हुआ. ताली थाली के ज़रिए किये गये गधगणना की अपार सफलता से प्रफुल्लित हो कर भारत के सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री ने चार घंटे की नोटिस पर भारत बंद का आह्वान किया. ऐसा करते हुए वे भारत के प्रधानमंत्री कम और कोई विपक्ष के नेता ज्यादा दिख रहे थे. लॉकडाउन ने फिर से क़रीब 20% जनता को ग़रीबी रेखा के नीचे धकेल दिया.

इन दो सालों के दरम्यान औद्योगिक उत्पादन नकारात्मक रहा और उपभोग न्यूनतम रहा. प्रति इकाई बिक्री कम होने से हुए नुक़सान की भरपाई करने के लिए बाज़ार ने मूल्य वृद्धि का सहारा लिया. नतीजतन, जीएसटी कलेक्शन में तो वृद्धि हुई, लेकिन लोगों की क्रय शक्ति कम हुई और रुपये का भारी अवमूल्यन हुआ. सरकार ऋण पर निर्भर करने लगी और विदेशी क़र्ज़ बढ़ कर 142 लाख करोड़ रुपए हो गया.

श्रीलंका के कुल घरेलू उत्पाद का क़रीब 93% विदेशी क़र्ज़ है और भारत का 84%. If it is winter, can spring be far behind ! (अगर सर्दी है, तो क्या वसंत बहुत पीछे रह सकता है !) इसे उल्टा अर्थ में लें तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है.

आगे का सवाल और कठिन है. यूक्रेन रूस युद्ध के बाद दुनिया बहुत दिनों बाद फिर से दो ध्रुवों में बंट गई है. मैंने पहले भी लिखा था कि अब जो नई विश्व व्यवस्था उभर रही है, उसके एक तरफ़ रूस, चीन, भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम एशिया का एक बड़ा हिस्सा और कुछ अफ्रीकी देश होंगे. दूसरी तरफ़ अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिमी यूरोप (आधे मन से, क्योंकि वे अपनी उर्जा की ज़रूरतों के लिए रूस पर निर्भर हैं) और सऊदी अरब जैसे देश रहेंगे.

इस नये समीकरण में भारत के पास मौक़ा है कि वह अपने तेल और गैस के आयात का 80% तक रूस से किफ़ायती दरों पर करे और अपनी डूबती हुई अर्थव्यवस्था को सहारा दे. फिर सवाल यहां पर दो हैं –

हरामखोरी एक आदत बन जाती है और मोदी सरकार इस आदत में जी रही है. देश की चिंता करने वाली सरकार न नोटबंदी करती है और न तालाबंदी. सस्ते तेल पर टैक्स और सेस बढ़ा कर यह सरकार सिर्फ़ अपने मित्रों को बचाएगी, जनता को नहीं.

निजीकरण के पैरोकारों से एक सवाल

2014 से आज तक देश में कितने निजी उद्योग लगे ? महानगरों में कितने नये मॉल या शहर बने ? एक भी नहीं. व्यापारी भी जानते हैं कि कब और कहां पैसे लगाने चाहिए. इसलिए 2019 से कहता आ रहा हूं कि अपनी ग़लत आर्थिक नीतियों के कारण मोदी सरकार तीन सालों में फेल कर जाएगी. अगर अब भी लोगों को समझ नहीं आता है तो उनका इस डूबते हुए जहाज़ पर स्वागत है !

श्रीलंका की समूची कैबिनेट ने सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ इस्तीफ़ा दिया. हमारे यहां इवीएम और मुस्लिम घृणा से अमरत्व प्राप्त सांसद ऐसा नहीं करेंगे. श्रीलंका की जनता मूल्य वृद्धि और बेरोज़गारी के खिलाफ सड़कों पर उतर आई. भारत के स्वैच्छिक ग़ुलाम ऐसा कभी नहीं करेंगे. बस दो उदाहरण काफ़ी हैं ज़िंदा और मुर्दा क़ौम के फ़र्क़ को समझने के लिए, बाक़ी बुद्धिवादी बकवास करने के लिए कोई भी स्वतंत्र है !

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