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अपने आप में बड़ा अनूठा मुल्क़ है भारत

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~डॉ. सलमान अरशद 

भारतीय सियासत में शूद्रों की सियासी बेदारी इस मुल्क़ के लिए मुफ़ीद है। हलांकि अब तक शूद्रों (दलित एवम पिछड़ा) ने जो भी आन्दोलन किये वक़्त के साथ उन्हें दलक जातियाँ निगल गईं। तमाम मज़हबी नफरत वाले आन्दोलन जो बज़ाहिर मुस्लिम विरोधी नज़र आते हैं, सभी शूद्र विरोधी होते हैं। पिछले कुछ सालों में मुसलमानों पर हमले ज़रूर हुए लेकिन खामोशी से शूद्रों के पर ज़्यादा कतरे गए, संविधान से मिले हक़ उनसे छीने गए और इसमें अदलिया भी शूद्रों के मुख़ालिफ़ ही रही। 
भारत दरअसल, अपने आप में बड़ा अनूठा मुल्क़ है। एक तरफ सियासत सेठों के साथ मिलकर जनता को चूस लेने पे आमादा है तो दूसरी तरफ मुल्क़ की बहुसंख्यक आबादी जिसे शूद्र कहा गया, उसे बुनियादी इंसानी हुक़ूक़ भी देने को तैयार नहीं है। 


करीब करीब सभी बड़ी सियासी जमातों के बड़े ओहदेदार दलक जातियों से हैं। मुझे तो सबसे ज़्यादा हैरानी वामपंथी संगठनों को लेकर होती है, जिनके सभी ओहदेदार दलक जाति के होते हैं। कई बार मैं उन्हें इस पर टोकता हूँ, ज़वाब में वो शूद्र जातियों की पढ़ाई लिखाई का मुद्दा उठाते हैं। 
यहाँ आप इन पर हंस सकते हैं। स्कूल कॉलेज की डिग्रियों की औक़ात सबको पता है। कोई इन्सान वामपंथी सियासत को अमूमन चुनता ही इसलिए है कि उसकी आँखों में एक समतामूलक समाज की तश्वीर होती है। ये तश्वीर उसे अनुभव, अध्ययन और राजनीतिक प्रक्षिक्षण से हासिल होती है। ऐसे में जो सियासत मेहनकश जातीय पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों को मेहनतकशों की रहनुमाई के लायक़ न बना पाए, उसे क्या कहिएगा ! एक वाक्य में कहूँ तो “कॉमरेड आप बेईमान हैं”। 
इस मुल्क़ में अस्मिता या पहचान को तोड़कर सियासत करने का माहौल नहीं बन पाया है। आप अम्बेडकर की मुख़ालफ़त करके कम से कम दलित वर्ग के शूद्रों को अपने साथ नहीं ला पाएंगे। इसके विपरीत अगर अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं को रोज़ की चर्चा का विषय बना दिया जाए तो उन्हें फासिस्टों का टूल बनने से रोका जा सकता है। 
इसी तरह मुसलमानों के साथ इस्लाम के प्रगतिशील पहलू को लेकर बात की जा सकती है। लेकिन हम देखते हैं कि अपवाद रूप में कहीं कोई ऐसा कर रहा हो भले, बड़े सियासी प्रोग्राम का इन्हें अभी हिस्सा नहीं बनाया गया है। 
उत्तर भारत में शूद्र (दलित एवम पिछड़ा) वर्ग में बढ़ती राजनीतिक चेतना भविष्य के लिए सुखद है। हलांकि ब्राह्मणवाद में आकंठ डूबी ये जातियाँ बहुत जल्दी कुछ कमाल कर देंगी, इसकी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए, लेकिन सत्ता में भागीदारी का सवाल सिर्फ भागीदारी तक महदूद रहेगा, कम से कम मैं ऐसा नहीं सोचता। 
“जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी” ये नारा बार बार लगाया गया और बार बार दबाया गया, लेकिन इसके असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आज उत्तर प्रदेश में अगर कांग्रेस 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दे रही है तो कहीं न कहीं वो महिलाओं की लंबे समय से हो रही मांग का ही परिणाम है। 
आज़ाद भारत में ये सवाल बार बार उठता है कि दलक वर्ग की ब्राह्मण जाति अपनी जनसंख्या से कई गुना ज़्यादा लाभ के लगभग हर क्षेत्र में हिस्सेदार है, कैसे ? 
शूद्र वर्ग की सियासी बेदारी इस सवाल को और तीखा करेगी। यहाँ ये सवाल ज़रूर उठेगा कि जातीय अस्मिता की बुनियाद पर होने वाली सियासत क्या मुल्क़ का नुकसान नहीं करेगी ! 
इसका जवाब ये है कि भारत की सियासत अब तक जातीय बुनियादों पर ही हो रही है। कम से कम पिछली दो सदी की सियासत शूद्र वर्ग द्वारा अधिकार मांगने और दलक जातीय समूह द्वारा अधिकार छीनने के ही इर्द गिर्द हो रही है। 
मुसलमान तो सियासी तड़का भर है। हथियार उद्योग के लिए आतंकवाद का शिगूफ़ा ज़रूरी था, शूद्र विरोधी सियासत को भी ये सूट करता था तो इस प्रोजेक्ट को हाथ में लिया गया, वरना देश की असली सियासत तो शूद्र विरोधी सियासत ही है। 
शूद्र, यानि कि पिछड़ा और दलित जिस तरह और जिनके साथ खड़े हो रहे हैं, वहाँ इनके सियासी मुस्तक़बिल को लेकर बहुत उम्मीद नहीं जताई जा सकती, लेकिन इनकी राजनीतिक जागरूकता ज़रूर मुल्क़ की फ़िज़ा बदल देगी। 
वामपंथी सियासी समूहों के लिए आज की परिस्थितियाँ बहुत साज़गार हैं बशर्ते वो दलित अस्मिता को चोट पहुचाये बिना अपनी सियासत लेकर इस व्यापक जन समुदाय के साथ जुड़ने की कोशिश करें, यही काम मुसलमानों के साथ भी करना होगा। 
संसदीय रास्ते से फासिस्ट सियासत जिस उरूज़ तक जा सकती थी, जा चुकी है। अब उसके पास दो ही विकल्प है, या तो पीछे हटे या खुली तानाशाही को अपनाए। बस उसके लिए एकमात्र खुश होने की स्थिति यही है कि फिलहाल उसे चुनौती देने वाला कोई संगठन नहीं है। लेकिन ये खुशी बहुत देर तक बरक़रार रहेगी ये भी नहीं कहा जा सकता। आर्थिक हालात लगातार लोगों की ज़िन्दगी मुश्किल बना रहे हैं और देश भर में असंतोष की लहर है। कल ये लहरें मिलकर सैलाब नहीं बनेगी, कौन कह सकता है !

~डॉ. सलमान अरशद 

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