रुचिर गर्ग
रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की सालाना रिपोर्ट भारत के कॉर्पोरेट मीडिया और एक पार्टी तथा उसकी विचारधारा के लिए खुशखबरी लेकर आई है।
खुशखबरी यह है कि अब हम प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में दुनिया के 180 देशों में 161 वें स्थान पर आ गए हैं।
पिछले बरस हम 150 वें स्थान पर थे।
प्रेस का गला घोंटने में हम अब तालिबानी अफगानिस्तान से आगे हैं ..बहुत आगे ,क्योंकि वो अभी 152 वें स्थान पर ही है!
11 अंकों की रिकॉर्ड गिरावट के साथ हमने दुनिया को बता दिया है कि हम अब अपने तालिबान गढ़ने में सक्षम हैं,गढ़ ही रहे हैं।
इस रिपोर्ट के आने के साथ कॉर्पोरेट पूंजी वाले ताकतवर भारतीय मीडिया के समाचार कक्षों में हर्ष की लहर दौड़ पड़ी होगी, क्योंकि यह उनकी दूरगामी जरूरतों के अनुकूल जो है।
और वे हर्षित क्यों न हों ?
पिछले एक वर्ष उन्होंने बड़ी मेहनत जो की!
इस मेहनत में उनके साथ कदमताल कर रही थी इस देश की फेक न्यूज़ इंडस्ट्री!
वही फेक न्यूज़ इंडस्ट्री जिसे 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले से बड़े जतन से सींचा गया,पाला पोसा गया।आज वो इतनी महाकाय हो गई है कि हमारे संविधान, हमारे लोकतंत्र,हमारी संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धताएं सब को लीलने की ताकत रखती है क्योंकि इस फेक न्यूज़ इंडस्ट्री की ताकत इस देश पर राज कर रही एक पार्टी और उसकी विचारधारा है।
क्योंकि इस फेक न्यूज़ इंडस्ट्री में जो कालाधन लगता है वो विदेश से लौटा नहीं है बल्कि हमारे अपने देश में 2014 के बाद पैदा हुआ है या वो पुराना कालाधन जो नोट बंदी जैसे फ्लॉप तमाशे के बावजूद कभी सामने आया ही नहीं।
आप इंतज़ार करते रहिए विदेश से काला धन आने का और आपके खातों में पंद्रह पंद्रह लाख रुपये जमा होने का !
वो रकम अब आपके लोकतंत्र को कुचलने में लग रही है।आइये सब मिल कर तालियां बजाएं!
रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है कि मौजूदा डिजिटल दुनिया में फेक न्यूज प्रेस की स्वतंत्रता के लिए बड़ी चुनौती है।
फेक न्यूज के खतरों को आज भारत में हम हर रोज देख रहे हैं।
यह रिपोर्ट अपने आप में आंख खोलने वाली है लेकिन हमारी आंखें तो उस न्यूजरूम में गिरवी रखी हैं जिसे गिने चुने मीडिया हाउस चला रहे हैं।
इनकी खबरों में इस रिपोर्ट का ठोस विश्लेषण नहीं मिलेगा।
यह भी जानने को शायद ना मिले की यह रिपोर्ट, जिसे अब विदेशी साजिश करार दिया ही जाने वाला है,प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटने के लिए सीधे–सीधे 2014 के बाद से देश की सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा करती है।
रिपोर्ट इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि भारत में मोदी जी के करीबी कुछ इक्का दुक्का उद्योग घरानों द्वारा किए गए मीडिया अधिग्रहण से देश की बहुलतावादी संस्कृति खतरे में है।
वो बहुलतावादी संस्कृति जो आजादी के बाद से हमारी पहचान थी।
विभाजन के बाद जब पाकिस्तान का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ था तब उस भयानक सांप्रदायिक माहौल में भी गांधी,नेहरू,अंबेडकर,पटेल जैसे नेतृत्व का यह हौसला और दूरदृष्टि थी कि वे एक धर्मनिरपेक्ष हिंदुस्तान के निर्माण पथ पर आगे बढ़े।
इस हिंदुस्तान का एक बहुलतावादी चेहरा था जिसे दुनिया ने सराहा था।
अब उसी पर हमला है।
रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की यह रिपोर्ट यह भी कहती है कि हिंदुस्तान के बड़े हिस्से में पत्रकारिता के ऊंचे पदों पर केवल उच्च जाति के हिंदू ही पदस्थ हैं।रिपोर्ट मानती है कि इस देश में मीडिया कंटेंट में इस तबके का दुराग्रह झलकता है।
इसे भी स्वतंत्र पत्रकारिता में बाधक तत्व माना गया है।
यह अनायास नहीं है कि इस रिपोर्ट के पांच मानक, जिनमें राजनीतिक,आर्थिक,कानूनी,सामाजिक और सुरक्षा शामिल हैं , सभी में पिछले वर्ष के मुकाबले हम बेहिसाब लुढ़के हैं।
इसमें ही तो मेहनत की गई है।
पूरी रिपोर्ट तो आप इंटरनेट पर पढ़ सकते हैं लेकिन इस गिरावट के खतरों को समझना जरूरी है।
इस बात को समझना जरूरी है कि क्यों प्रेस की स्वतंत्रता का हनन कर हमें एक आधुनिक समाज से बर्बर समाज बनाया जा रहा है
इस बात को समझना जरूरी है कि स्वतंत्र प्रेस की हमारी अपनी स्वतंत्रता में कितनी अहम भूमिका है और प्रेस स्वतंत्रता होगा तो एक विवेकशील नागरिक ,विवेकशील समाज के निर्माण की प्रक्रिया में उसकी हिस्सेदारी होगी।
इस बात को समझना जरूरी है कि किसी सभ्य समाज के लिए स्वतंत्र प्रेस का होना कितना जरूरी है!
समझना जरूरी है कि क्यों चंद उद्योगपति और एक पार्टी के चंद ताकतवर नेता इस साजिश में शामिल हैं कि हिंदुस्तान में प्रेस की आजादी का गला घोंटा जाए ?
यह इस देश की सामूहिक चेतना पर हमला है।
इस हमले के लिए पूंजी,सांप्रदायिकता,नफरत,झूठ,फेक न्यूज,मीडिया अधिग्रहण और मीडिया नियंत्रण जैसे औजारों का उपयोग किया जा रहा है।
इसके लिए तमाम संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को भी कुचला जा रहा है।
इस प्रोजेक्ट को नाम दिया गया है हिंदुत्व !
हिंदू और हिंदुत्व को अलग अलग रखिए।
अगर हमें अपने लोकतंत्र को ,अपने संविधान को,अपने धर्मनिरपेक्ष ताने–बाने को,अपनी संवैधानिक संस्थाओं को और अपनी खुद की स्वतंत्रता को महफूज रखना है और एक सभ्य समाज का नागरिक बने रहना है तो हमें भी इस देश में प्रेस की आजादी के लिए आवाज उठानी होगी।
गुलाम प्रेस और गुलाम पत्रकारिता की शिनाख्त करनी होगी,इसे खारिज करना होगा।
एक जवाबदेह नागरिक के रूप में हमें सबसे पहले तो अफवाह बाजी और फेक न्यूज को पहचानना होगा।
प्रेस की स्वतंत्रता दुनिया के सामने किसी देश का चेहरा होती है।
हमें अपने चेहरे को सुंदर और मूल्यों से दमकता हुआ रखना होगा नहीं तो अबकी गुलामी बिना चेहरों के और बड़ी भयानक होगी।
अभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खतरे भी हमारे मीडिया को और अंततः हमारे समाज को झेलने हैं । यह शुरू हो चुका है। रिपोर्ट इसकी भी चर्चा करती है।
एक बात और रह ही गई थी…
जिस पाकिस्तान की बर्बादी के हम हर रोज गीत गाते हैं वो प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में हमसे बहुत आगे 150 वें स्थान पर है।

