Site icon अग्नि आलोक

*जी -20 में अफ्रीका : अपना अपाहिजनेस भी त्यागे भारत*.

Share

        ~ पुष्पा गुप्ता 

आखिर अफ्रीका की याद इतने दिनों बाद क्यों आई? चलो अब अफ्रीका को स्थान मिला लेकिन क्या इतना ही काफी है? अफ्रीका में भारत, ‘चीन ने मुक़ाबले’ कितना पीछे रहा है, इस बारे में अपने देश में चर्चा नहीं होती है. केवल डंका पीटने से नहीं होगा. इथियोपिया का मामला दुर्भाग्यपूर्ण है.  वहां के बाज़ार को भारत ने चीन के हाथों खोया है.

      अफ्रीका में चीन की बढ़ती आर्थिक दिलचस्पी और संसाधनों के दोहन ने जी-20 को आकर्षित किया है। 2017 में जर्मनी के हैम्बर्ग में आहूत जी-20 सम्मेलन में अफ्रीका में निवेश और वहां पर उद्योग को विकसित करने पर सहमति बनी थी। इस लक्ष्य को पटरी पर उतारने में छह साल लग गये।

      55 सदस्यीय अफ्रीकन यूनियन अब जी-20 का हिस्सा है। इसका मतलब यह नहीं लगा देना चाहिए अफ्रीका पर हमने फतह कर लिया। बस भारत को इतना श्रेय लेना बनता है कि उसकी अघ्यक्षता में अफ्रीक़न यूनियन को सदस्यता ग्रहण करने का अवसर मिला।

अब कहानी दावेदारी की शुरू हो गई है कि किसके कहने पर अफ्रीकी संघ जी-20 का सदस्य बना। जो बाइडेन चुप हैं। मगर, चीन और रूस दावा ठोक रहे हैं कि उनके कहने पर यह फलीभूत हुआ।

      ” जी-20 शेरपा” के हवाले से रुसी मीडिया खम ठोक रहा है कि उनका मुल्क इस मांग को उठाने वाले शुरुआती देशों में शामिल रहा है। जी-20 में किन मुल्कों-संगठनों को शामिल करना है, उसमें शेरपा ट्रैक की बड़ी भूमिका है। 

      जी-20 दो ट्रैक में विभाजित है। फाइनांस ट्रैक और शेरपा ट्रैक। शेरपा ट्रैक का नेतृत्व शासन प्रमुखों के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। यह कृषि, भ्रष्टाचार विरोधी, जलवायु, डिजिटल अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार, ऊर्जा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, पर्यटन, व्यापार और निवेश जैसे सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित है। फाइनांस ट्रैक का नेतृत्व वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंक गवर्नर करते हैं, जो राजकोषीय और मौद्रिक नीतियांे के निस्बतन है।

     फाइनांस ट्रैक से संबंधित कार्य समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था, अधोसंरचना, वित्तीय विनियमन, वित्तीय ढांचा, अंतरराष्ट्रीय कराधान पर कंेद्रीत रहते हैं। 

चीन इस समय अफ्रीक़ा का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। चीन-अफ्रीक़ा व्यापार प्रति वर्ष 200 बिलियन से ऊपर है। 10,000 से अधिक चीनी कंपनियाँ वर्तमान में पूरे अफ्रीक़ी महाद्वीप में काम कर रही हैं। भारत में अनेक विशेषज्ञ नियमित रूप से इस बात पर विशेष जोर देते रहे हैं कि भारत को अफ्रीका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाकर अफ्रीकी महाद्वीप पर चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करना चाहिए।

      कई अन्य विशेषज्ञों ने चीन के पास ढेर सारा पैसा होने और अधोसंरचना के लिए आसानी से ऋण सुलभ कराने के मामले में चीन को भारत द्वारा टक्कर न दे पाने पर चिंता व्यक्त की है। 

       भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सितंबर 2022 में बताया था कि 31 मार्च, 2021 को समाप्त वित्तीय वर्ष में भारतीय-अफ्रीकी व्यापार 89.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष से लगभग 60 प्रतिशत अधिक है। यह आंकड़ा चीन के आधा भी पार नहीं कर पाया है।

 अफसोस की बात यह है कि चीन-अफ्रीका संबंधों को लेकर भारत के रणनीतिकार देर से जगे। चीन अफ्रीका से तांबा और कच्चे तेल का दोहन दबाकर करता रहा है। चीन ने संसाधन-समृद्ध देशों जैसे अंगोला और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य को प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बदले अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचागत ऋण’ दिए हैं।

     कई अफ्रीकी देशों में संसाधनों की भारी कमी है, बावज़ूद इसके चीन के साथ उनके आर्थिक संबंध काफी तेजी से सुदृढ़ हुए हैं। 

     पूर्वी अफ्रीका का कृषि आधारित देश इथियोपिया प्रमुख उदाहरण है। इथियोपिया से चीन को निर्यात किए जाने वाले मुख्य उत्पाद कॉफी (47.5 मिलियन), सूखे फलियाँ (39.6 मिलियन), और अन्य तैलीय बीज (26.5 मिलियन) थे।

पिछले 26 वर्षों के दौरान इथियोपिया से चीन को निर्यात 23.6 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ा है। चमड़ा भी इथियोपिया का प्रमुख आइटम है। इथियोपिया में हो रहे चीनी निवेश में निजी क्षेत्र का वर्चस्व है। इथियोपिया चीनी एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) का एक प्रमुख प्राप्तकर्ता देश रहा है।

      इससे अलग नाइजीरिया, अंगोला, सूडान और इक्वेटोरियल गिनी जैसे तेल उत्पादक  देशों को चीन से विपुल मात्रा में ऋण प्राप्त हुआ है। अंगोला, कांगो, सब सहारा, लोकतांत्रिक गणराज्य एवं इथियोपिया जैसे देशों से चीन को निर्यात में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई।

     भारत ने बहुत देर से समझा कि संयुक्त राष्ट्र में एक स्थायी सीट के लिए अफ्रीकी वोटों की आवश्यकता है। 

      अफ्रीक़ी बाज़ार में इंट्री के मामले में चीन, अमेरिका को 2004 से ही पछाड़ता रहा है। 2013 तक उप-सहारा अफ्रीका के कुल आयात में चीन का हिस्सा लगभग 14 फीसदी हो गया।

चीन अब सब-सहारा अफ्रीका के लिए विनिर्मित उत्पादों का सबसे बड़ा स्रोत है। अंगोला और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य जैसे देशों को चीनी निर्मित वस्तुओं के निर्यात में ग़ज़ब की वृद्धि दर्ज की गई थी।

      2009 में अंगोला केवल 2.9 प्रतिशत चीनी माल का आयात करता था, लेकिन 2013 तक आते-आते चीन पुर्तगाल को पीछे छोड़कर 38.9 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ अंगोला के लिए विनिर्मित वस्तुओं का सबसे बड़ा स्रोत बन गया। कांगो में कुछ ऐसा ही करिश्मा हुआ। 

इथियोपिया का मामला विशेष रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है. वर्ष 2000 में भारत 19.1 फीसदी हिस्सेदारी के साथ इथियोपिया को विनिर्मित वस्तुओं का सबसे बड़ा निर्यातक था, 2012 आते-आते इथियोपिया के कुल विनिर्मित आयात में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 31 प्रतिशत से भी अधिक हो गई। इधर भारत की हिस्सेदारी घटकर 14.9 फीसदी रह गई। 

      भारत मारीशस में अपने पांव जमने को लेकर प्रसन्न रहता है। अफ्रीका में भारतीय निवेश का अधिकांश हिस्सा मॉरीशस की ओर मुखातिब हो जाता है, जो एक ‘टैक्स हैवन’ या कर रियायतों की दृष्टि से स्वर्ग है, और जिसे दूसरे रूट से वापस भारत में ही ले आया जाता है। 2005 से भारत, मॉरीशस के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है।

      वित्त वर्ष 2022-2023 के दौरान वहां भारतीय निर्यात 462.69 मिलियन डॉलर था। इस अवधि में भारत-मारीशस के बीच कुल व्यापार 554.19 मिलियन डॉलर का था।

       आज की तारीख़ में चीनी कंपनियां अफ्रीका में बांधों, बंदरगाहों, सड़कों, रेलवे और पुलों सहित महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का भी निर्माण कर रही हैं। विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, 45 से भी अधिक अफ्रीकी देश बुनियादी ढांचा संबंधी वित्त सौदों को लेकर चीन से जुड़े हुए हैं।

 सब-सहारा अफ्रीका में अधोसंरचना के विकास में चीन का सबसे बड़ा योगदान है। यह स्पष्ट है कि भारत इस इलाक़े में वित्त के मामले में चीन को कड़ी टक्कर नहीं दे सकता। भारत को अपनी लाइन ऑफ क्रेडिट या ऋण-रेखा का बेहतर कार्यान्वयन भी सुनिश्चित करना चाहिए, जो अक्सर परियोजनाओं में देरी के कारण बुरी तरह प्रभावित हो जाती है।

       अफ्रीका के तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग अब ज़्यादा समझदार है। उसे मालूम है कि किसके पाले में रहने पर कितना फायदा है। हम केवल इस बात से कुछ दिन खुश रह सकते हैं कि पीएम मोदी के प्रयासों से अफ्रीका जी-20 में शामिल हो गया। मगर, यह सब अकेले का नहीं है। सहमति सभी सदस्य देशों के ‘शेरपा ट्रैक’ की हुई होगी, जिसमें शासन प्रमुख शामिल होते हैं। 

       सितंबर 2022 में 17 अफ्रीकी देशों के 40 से अधिक उच्च-स्तरीय अधिकारियों ने दिल्ली में आहूत एक निवेश बैठक में भाग लिया, जिसका उद्देश्य दोनों व्यापार भागीदारों के बीच वाणिज्यिक संबंधों को मजबूत करना था।

 भारत चीन के साथ बराबरी करने के लिए अफ्रीका के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। मगर सवाल है कि हम देर से क्यों जगे? जबकि भारतीय रणनीतिकारों को इसकी ख़बर थी कि चीन ने पिछले एक दशक में अफ्रीका में बाजारों और संसाधनों तक पहुंच के बदले में सड़कों, पुलों और बिजली प्रतिष्ठानों का निर्माण करते हुए अरबों डॉलर का निवेश किया है।

       सितंबर 2022 में नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय बैठक में भाग लेने वालों में बुर्किना फासो, कैमरून, एस्वातिनी, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान और जाम्बिया के मंत्री और अन्य अधिकारी शामिल थे। भारत-अफ्रीका के बीच विकास और व्यापार पर सबसे पहले सीआईआई-एक्ज़िम बैंक कॉन्क्लेव 2005 में शुरू किया गया था।

     अफ्रीकी देशों में भारत से निजी निवेश के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए भारत के विदेश मंत्रालय और वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के सहयोग से शुरू किया कार्यक्रम नौकरशाही में उलझकर रह गया था। जी-20 की दिल्ली बैठक के बाद चेतना यदि जगी है, तो अच्छी बात है। लेकिन इससे यह नहीं समझ लें कि अफ्रीका में चीन को परास्त कर लेंगे।

     इस वास्ते बड़ी संकल्प शक्ति चाहिए, और सबसे पहले नौकरशाही जैसी बाधा दौड़ को समाप्त करने की पहल करनी होगी!

Exit mobile version