अग्नि आलोक

*भाषा के नाम पर बँटता भारत: पहले धर्म, फिर जाति, अब भाषा?*

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-हर्ष आनंद 

भारत, वह देश जिसकी रगों में अनेक भाषाएँ बहती हैं, आज एक अजीब संकट से गुजर रहा है। हम भाषा को संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान की दीवार बना बैठे हैं। हाल ही में महाराष्ट्र में हुई घटनाओं ने इस चिंता को और गहरा कर दिया  जहाँ सिर्फ़ इसलिए एक व्यक्ति पर हमला हुआ क्योंकि वह मराठी नहीं बोल सका। सवाल उठता है क्या हमारी बहुभाषी परंपरा आज सच में ख़तरे में है?

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कहा कि राज्य में मराठी बोलने की अपेक्षा तो ठीक है, पर हिंसा किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। लेकिन क्या सिर्फ़ बयान देकर हम इस समस्या का हल निकाल सकते हैं? भायंदर (ठाणे) में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं ने एक फ़ूड स्टॉल मालिक पर हमला कर दिया, क्योंकि वह मराठी नहीं बोल पाया। यह पहली बार नहीं हुआ भाषा को हथियार बनाकर सबसे ज़्यादा हमला हमेशा गरीब और कमज़ोर लोगों पर ही होता है।

दुख की बात यह है कि यही महाराष्ट्र, जिसने देश के हर कोने के लोगों को अपनाया और आगे बढ़ाया, अब संकीर्ण राजनीति के जाल में उलझता जा रहा है। मुंबई को मायानगरी बनाने में उत्तर भारतीयों, गुजराती, मारवाड़ी, दक्षिण भारतीय, कोंकणी और मराठी समाज सभी का बराबर का योगदान रहा है। शेयर बाज़ार से लेकर बॉलीवुड तक, हर जगह इस गंगा जमुनी संस्कृति की झलक मिलती है। यही विविधता मुंबई की असली ताकत है पर आज उसी पर चोट की जा रही है।

और यह आग सिर्फ़ महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है। तमिलनाडु में हिंदी के विरोध के स्वर समय-समय पर उठते हैं, तो उत्तर प्रदेश में हाल ही में एक मराठी बोलने वाले सेल्समैन पर भोजपुरी बोलने का दबाव बनाया गया। सोचिए, जो व्यक्ति अपने घर-परिवार से दूर रोज़गार की तलाश में निकला, वह सिर्फ़ अपनी मातृभाषा बोलने पर अपमानित होता है। क्या यही है हमारा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’?

इतिहास की तरफ़ देखें तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठी को मज़बूती से आगे बढ़ाया, लेकिन कभी अन्य भाषाओं का अपमान नहीं किया। महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी भाषा को जोड़ने का ज़रिया माना, तोड़ने का नहीं। भारत की आत्मा इसकी भाषाई विविधता में बसती है असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कश्मीरी, कन्नड़, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू ये सिर्फ़ शब्द नहीं, हमारी संस्कृति के फूल हैं, जो मिलकर भारत को इंद्रधनुषी बनाते हैं।

विडंबना देखिए जब किसान आत्महत्या कर रहे हैं (सिर्फ़ महाराष्ट्र में ही इस साल 776 किसान अपनी जान दे चुके हैं), जब हज़ारों गाँवों में आज भी स्कूल नहीं हैं, तब नेता भाषा पर राजनीति कर रहे हैं। जनता की असली समस्याओं से ध्यान हटाकर हमें आपस में बाँटा जा रहा है।

भारत के करीब 6.5 लाख गाँवों में हर सातवें गाँव में आज भी स्कूल नहीं है। महाराष्ट्र के 8,123 गाँवों में से 1,650 में प्राथमिक और 6,563 में उच्च प्राथमिक स्कूल तक नहीं हैं। वर्ष 2018 की रिपोर्ट बताती है कि केवल 47% गाँवों में प्राथमिक, 21% में माध्यमिक और सिर्फ़ 6.57% में सीनियर सेकेंडरी स्कूल उपलब्ध हैं। इसके बावजूद नेता भाषा के नाम पर लोगों को बाँटने में लगे हैं।

सोचिए पहले हम धर्म के नाम पर लड़े, फिर जाति के नाम पर और अब भाषा के नाम पर? क्या यह वही भारत है, जिसका सपना हमारे पूर्वजों ने देखा था?

भारत का संविधान 22 भाषाओं को मान्यता देता है। भाषा किसी एक व्यक्ति, एक दल या एक राज्य की जागीर नहीं है। यह तो वह नदी है, जो दिलों में बहती है और लोगों को जोड़ती है। ज़रूरत है कि हम भाषा की दीवारें गिराएँ, न कि उसे हथियार बनाएँ। सवाल हमारे सामने है: क्या हम भाषा को पहचान की बंद कोठरी बनाएँगे या संवाद का पुल? क्या हम हर भाषा को उसके सौंदर्य और योगदान के लिए सम्मान देंगे या फिर हर राज्य को ऐसा गढ़ बना देंगे, जहाँ बाहरी के लिए कोई जगह न हो?

भारत की असली ताकत इसकी एकरूपता में नहीं, उसकी बहुरूपता में है। भाषा भावना है, हथियार नहीं।

(लेखक छात्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)

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