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यूक्रेन मे फंसे भारतीय छात्र और दलाल मीडिया

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*अजय असुर

इस दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है पलायन, कोई अपने मन से, खुशी से पलायन नहीं करता, जब वह मजबूर हो जाता है तभी अपना देश-प्रदेश-जिला, गाँव-घर-परिवार, नात-बात-रिश्तेदार छोड़कर जाता है। यदि रोजगार उसके नजदीक शहर-प्रदेश या देश में मिल जाता तो क्यूँ अपना गाँव, प्रदेश छोड़कर दूसरे राज्य में जाता है या देश में रोजगार होता तो क्यूँ अपना घर-बार, देश छोड़कर दूसरे देश में रोजगार करने जाता? कोई अपना घर-बार देश यूं ही नहीं छोड़कर जाता है। 
अब बात करते हैं वर्तमान में फंसे यूक्रेन में छात्रों की जो वंहा पर बंकरों में हैं। किसी के पास खाने का सामान है तो किसी का खत्म हो रहा है। बहुत से छात्र भूमिगत मेट्रो स्टेशन में पनाह लिए हुए हैं। कई छात्र 30-35 किलोमीटर पैदल चलकर नजदीकी दूसरे देश की सीमा तक पहुँच गये हैं और कई लाखों रुपये खर्च कर यूक्रेन से सटे दूसरे देश की सीमा तक पहुँच गये हैं और एक विडियो में तो दावा किया गया है कि यूक्रेन की पुलिस भारतीय छात्रों को गिरा गिराकर डंडे, लात, घूंसे से मार रही है…. भारतीय छात्रों के दल ने तिरंगे के साथ रोमानिया में जाकर पनाह लेने की कोशिश की, पनाह तो दूर बल्कि छात्रों की बर्बर पिटाई हुई और छात्राओं की आंखों में मिर्च पाउडर स्प्रे किया गया, एक छात्रा का पैर तोड़ दिया गया…. 
तो क्या उन छात्रों की गलती है कि वे समय से पहले टिकट कटा कर वापस नहीं आए। जो लोग सोशल मीडिया पर इन भारतीय छात्रों को कोस रहे हैं कि इतना पैसा लगाकर विदेश गए तो टिकट क्यों नहीं ख़रीद सकें। यह बहुत ही बेहूदी और वाहियात बात है। निश्चित ही छात्र वापसी का टिकट खरीदना चाहते थे, मगर टिकट उनके जेब से कंही ज्यादा की कीमत का हो गया था क्योंकि इन निजी एयरलाइंस कम्पनियों को आपदा को अवसर में तब्दील जो करना था। 
भारत में पर्याप्त मेडिकल कॉलेज और मेडिकल एजुकेशन होता तो ये छात्र भारत से भारी तादात में बच्चे यूक्रेन, चीन, जार्जिया, क्यूबा आदि देशों में जाते मेडिकल स्टडीज के लिए…. भारत में गिनती के एम बी बी एस की सरकारी सीट है, और जो प्राईवेट सीट है लाखों से लेकर करोड़ तक। तो मजबूर हो जाते हैं अपना देश छोड़ जंहां भारत कंहीं सस्ते में शिक्षा दे रहा शिक्षा लेने के लिए। कोई अमीर घराने का नहीं जाता है ऐसे गरीब देश में पढ़ने। यूक्रेन एक छोटा और गरीब देश है। ये सभी छात्र एक ग़रीब देश में पढ़ने गए हैं। अमीर घरों के नहीं हैं। इनके लिए डेढ़ लाख का टिकट कटाना आसान नहीं था। युद्ध होने की आशंका को देखते हुए इन विमानों ने छात्रों की बेबसी का अंदाज़ा लगा लिया और भारत आने का टिकट सवा लाख से लेकर एक लाख नब्बे हज़ार तक कर दिया। एक छात्रा करीब डेढ़ लाख का टिकट कटा कर आई है। एक छात्र के पिता ने बताया कि उनका बेटा अगस्त 2021 में यूक्रेन गया तब 38,000 का टिकट था क्योंकि यूक्रेन के लिए भारत की कोई उड़ान सेवा नहीं थी। कुछ विमान दुबई होकर जा रहे थे तो कुछ दोहा होकर। वहां से वापसी का भी यही हिसाब किताब था। जब सोशल मीडिया पर इस आपदा में अवसर पर सरकार की आलोचना होने लगी तब कंही जाकर सरकार के हस्तक्षेप के बाद 55-60 हजार का टिकट किया इन निजी एयरलांइस कम्पनियों ने, पर तब तक देर हो चुकी थी वंहा युद्ध छिड़ गया और इमरजेंसी लागू हो गयी।
अमेरिका जिसे दलाल चैनलों पर दिन रात दुनिया का सुपर-पावर और उसके राष्ट्रपति जो बाईडेन को हीरो बताया जाता है, उसकी साम्राज्यवाद विस्तार की नीति का नतीजा हम सब देख रहे हैं।  दलाल मीडिया इस पर चर्चा क्यूँ नहीं करती कि चीन, क्यूबा जैसी सस्ती सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था भारत में क्यों नहीं है जो सभी छात्रों को यहीं सस्ती और गुणवत्ता पूर्ण सामान शिक्षा आसानी से सुलभ हो सके? भारत में  शिक्षा इतनी महंगी क्यों है जिसे सिर्फ अमीर ही ले सके और गरीब के लिए सिर्फ सपना और मध्यम वर्ग दूसरे देश में जाने को मजबूर होकर सस्ती शिक्षा हासिल करते हैं। इस पर बहुत लोग सवाल उठाते हैं कि भारत में संभव नहीं क्योंकि यंहा आबादी बहुत ज्यादा है, इतना पैसा कंहा से आयेगा? तो साथियों जब चुनाव के दौरान सरकार खैरात बांटती है वो कंहा से और कैसे आता है? चुनाव के दौरान सरकार बन जाने पर बहुत सारी चीजें मुफ्त में देने का वादा करती है वो कंहा से और कैसे आयेगा उस पर कोई सवाल नहीं और जाकर उसी लालच में वोट दे आते हैं…. विश्व की सबसे बड़ी आबादी चीन जब वो अपने समस्त नागरिकों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा आसानी से दे सकती है तो फिर भारत क्यूँ नहीं….. इस पर चर्चा करने के बजाये हिंदु-मुसलमान, गाय-गंगा-गोबर….. और अभी पुतिन विरोधी नेताओं की चतुराई का और अमेरिकी साम्राज्यवाद के नक्शे कदम पर भारत के सुपर पावर बनने का सपना आज भी ठेलते रहते हैं। खाने को नहीं दाने अम्मा चली भुनाने……
*अजय असुर**राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा* 

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