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दम तोड़ता भारत का तंबुओं में चलने वाला सिनेमा

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महाराष्ट्र का कोई गांव हो, या आसाम के चाय बाग़ान, किसी ज़माने में सैंकड़ों लोग जमाकर होकर एक तंबू में बैठकर सिनेमा देखा करते थे, जो एक गांव से दूसरे गांव घूमता था. लेकिन अब यह आनंद केबल टीवी और डीवीडी ने चुरा लिया है.

इस तरह के ‘तंबू सिनेमा’ की परंपरा धीरे धीरे ख़त्म हो रही है. दस साल पहले सिर्फ़ महाराष्ट्र में ही इस तरह गांव गांव जाने वाले सिनेमाओं की संख्या दो हज़ार थी, जो अब घटकर सिर्फ़ 40 रह गई है. भारत में बंजारा सिनेमा की परंपरा 60 साल से भी ज़्यादा पुरानी है और उस समय गांवों में फ़िल्म देखने का केवल यही एक तरीक़ा था लेकिन अब घर घर केबल टीवी और डीवीडी आ जाने से यह व्यवसाय ख़त्म हो रहा है. महाराष्ट्र में इस बंजारा सिनेमा के संगठन प्रमुख अजय सरपोत्दार बताते हैं, “यह ख़त्म होता जा रहा व्यवसाय है. अगर इन्हें बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया तो यह जल्द ही इतिहास बन जाएगा.”

तस्वीर: dpa

नया प्रोजेक्ट

तंबू सिनेमा को इससे पहले कि पूरी तरह भुला दिए जाए, फ़ोटोग्राफ़र अमित मधेसिया और शोधकर्ता शर्ले अब्राहम ने इससे जुड़े दस्तावेज़ जमा करने शुरू कर दिए हैं. वे डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं. उन्हें इस काम में भारतीय कला प्रतिष्ठान की तरफ़ से आर्थिक मदद दी जा रही है. कोई पौराणिक फ़िल्म देखने वाले ग्रामीण दर्शकों के बारे में अब्राहम बताते हैं, “जब वे पर्दे पर भगवान को देखते हैं तो वे एकदम ठिठक जाते हैं या फिर सिनेमा के पर्दे पर फूल और सिक्के चढ़ाना शुरू कर देते हैं. या फिर यह सोचते हुए प्रोजेक्टर बीम की तरफ़ कमर कर बैठ जाते हैं कि वहां से भगवान प्रकट होंगे.”

अब्राहम सिनेमा की इन अनोखी विधा पर काम करने के लिए यूरोप से आए हैं. यूरोप और एशिया के दूसरे हिस्सों से आए लोगों के लिए इस तरह स्क्रीन पर फूल और सिक्के फ़ेंकने का दृश्य निश्चित ही आश्चर्यचकित कर देने वाला है. वे शायद अनजान हैं कि दूरदर्शन पर अस्सी के दशक में रामायण सीरियल के दौरान भी कई लोग अगरबत्ती जलाकर सीरियल देखने बैठते थे. गांवों में ही नहीं, छोटे शहरों में भी.

भारतीय सरकार के कला प्रतिष्ठान के तहत इस तम्बू सिनेमा के लिए प्रोजेक्ट शुरू किया गया है जिसके तहत यूरोप और एशिया से लोग आ कर इस ट्रेवल सिनेमा की इस परंपरा को समझने की कोशिश कर रहे हैं. भारत में बंजारा फ़िल्में बहुत सस्ती होती हैं और ख़ासकर उन लोगों के लिए जो दिन में ही एक या दो डॉलर कमाते हैं. वे महंगे सिनेमाघरों की टिकटें नहीं ख़रीद सकते, तो इन लोगों के लिए दो पेड़ों के बीच बांधी गई स्क्रीन पर चलने वाला यह सिनेमा सस्ता होता था. अकसर इस सिनेमा की टिकट दस बारह रुपये की होती है.

बैलगाड़ी से ट्रक में

जहां पहले बैलगाड़ी पर सिनेमा आता था, अब आसाम में ट्रकों में आता है और वह प्रजोक्टर के साथ. पश्चिम बंगाल और आसाम में कई चाय बाग़ान मैनेजमेंट इसके ख़र्च को उठाते हैं. ऐसा मज़दूर कल्याण कोष के तहत किया जाता है. फिर भी इनकी संख्या कम हो रही है. आसाम के जोरहट में कल्पना टूरिंग टॉकीज़ के प्रबंधक प्रमोद जैन कहते हैं कि चार साल पहले वह एक महीने में अलग अलग चाय बाग़ानों में सत्तर अस्सी शो करते थे, लेकिन अब हर महीने 18 से 20 फ़िल्में ही दिखाते हैं. जैन इसका कारण केबल टीवी, डीवीडी और विडियो किराए पर देने वाली दुकानों की संख्या में हुए वृद्धि को बताते हैं.

बचाएं नहीं सीखें

जो संगठन इस ट्रेवल सिनेमा से जुड़े हुए हैं, वह कोशिश कर रहे हैं कि सरकार इसे सब्सिडी दे, कुछ नए अनुंबध बनाए ताकि यह परंपरा ख़त्म न हो जाए. लेकिन भारतीय कला प्रतिष्ठान के निदेशक अनमोल वेल्लानी इसे बचाने की बात नहीं करते. वह कहते हैं “हमें इसे पहचानना चाहिए, समझना चाहिए, इससे सीखना चाहिए लेकिन इसे बचाने को मैं इतना महत्व नहीं देता क्योंकि आख़िरकार आप क्या बचा रहे हैं. यह व्यवसाय था जिसके लिए उस तरह की आर्थिक व्यवस्था थी, वहीं से इसका ख़ास फ़्लेवर, ख़ास ज़ायका आया है. एक बार जब वह पुरानी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था ख़त्म हो गई तो यह भी ख़त्म होगा.”

नब्बे के दशक तक हमारे फैजाबाद शहर में और नहीं तो कम से कम पांच सिनेमा हॉल हुआ करते थे। मिलिट्री वाला ओपन एयर सिनेमा जोड़ दें तो छह। गांव की ओर चलें तो लगभग हर बड़े बाजार में एक वीडियो सिनेमा हॉल भी हुआ करता था, जो आमतौर पर बड़े-बड़े तंबुओं में चलता। बीकापुर शहर से लगभग पचीस-तीस किलोमीटर दूर एक ऐसा ही बाजार है। यहां मैंने संजय दत्त और माधुरी दीक्षित की खलनायक सहित अन्य कई फिल्में देखी थीं। यह वीडियो हॉल मुंबई वाले उन वीडियो पार्लरों से एकदम अलग था, जिनमें बस एक कलर टीवी और VCR ही होता। बीकापुर वीडियो हॉल वालों ने उस वक्त जाने कैसे VCR में एक छोटा प्रॉजेक्टर कनेक्ट कर दिया था। इससे ठीक-ठाक बड़े पर्दे पर फिल्म देखने को मिल जाती थी।

बीकापुर वाला वीडियो हॉल तो तंबू में चलता था, मगर उस वक्त लोगों में सिनेमा के क्रेज को देखते हुए सरकार ने गंवई इलाकों में कई सिनेमा हॉल भी बनवाए थे। पिछले हफ्ते फटॉग्रफी के मेरे गुरु प्रभात सर का सामना ऐसे ही एक सिनेमा हॉल से हुआ, जो बरेली के सीबी गंज में सन 1984 में बना था। पहली फिल्म लगी थी मनोज कुमार और बबीता की ‘पहचान।’ इसकी वीडियोग्रफी करते हुए अंदर पहुंचे तो तकरीबन आधा दर्जन गाय-भैंसें चर रही थीं। बैठने की रो में एक लाइन से गांव वालों ने उपले पाथ रखे थे। फैमिली क्लास में भी दो भैंस बंधी थीं। छत उड़ चुकी थी, जिसे थामने के लिए बना लोहे का खांचा जंग खाते हुए अभी टिका हुआ था। उधड़ चुकी दो खिड़कियों के ऊपर टिकट वितरण कक्ष लिखा था। आसपास पूछा तो उसमें पहचान, मांग भरो सजना, आज की आवाज सहित कई फिल्में देखने वाले प्रेम बाबू मिल गए। बताया कि इसमें 36 गांवों के लोग सिनेमा देखने आते थे। बेल्जियम के बायरो साहब ने इसे सरकार से 99 साल की लीज पर लिया था। कोई कांड हुआ, अचानक यह बंद हो गया। क्या कांड हुआ, यह प्रेम सिंह को नहीं पता।

प्रभात सर ने थोड़ी और पूछताछ करके यहां प्रॉजेक्टर चलाने वाले महेंद्र पाल को तलाश लिया। कांड का तो खैर उन्हें भी नहीं पता, मगर उनकी पेंशन इमैनुएल बायरो पर अभी बाकी है। बताने लगे कि बेल्जियम तो अमेरिका से भी आगे पड़ता है! लेबर कोर्ट में चार लोगों ने केस डाला था, दो खत्म हो गए, दो जिंदा हैं। बोले, 1995 के पहले तक तो यहां जो भीड़ लगती थी कि क्या बताएं। लोग सुबह से ही आ जाते थे। महेंद्र पाल ने गोरखपुर के मुन्ना ऑपरेटर से प्रॉजेक्टर चलाना सीखा था। मगर 1995 के बाद तकनीक ने सब बदल दिया। CD-DVD ने सब सत्यानाश कर दिया। नए तरह के प्रॉजेक्टर आ गए। रील वाले प्रॉजेक्टर को चलाने में दर्जन भर लोग लगते थे, अब तो बस दो लोग मिलकर चला लेते हैं। रही सही कसर स्मार्टफोनों ने निकाल दी। मगर यहां का प्रॉजेक्टर कहां गया? महेंद्र पाल ने कहा कि वह तो बायरो साहब लेकर भाग गए! वैसे प्रॉजेक्टर और सिनेमाहाल तो बीकापुर वाला भी नहीं बचा। कोई बायरो तो नहीं, मगर वक्त जरूर उसे लेकर भागा है।

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