Site icon अग्नि आलोक

प्रेस की आजादी के मामले में भारत का 150वें स्थान पर पहुंच जाना एक बड़ी उपलब्धि…!

Share

डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया

प्रेस की आजादी

प्रेस की आजादी के मामले में भारत का 150वें स्थान पर पहुंच जाना एक बड़ी उपलब्धि हैं। में इस बात पर गर्व है कि अभी भी दुनिया के कुछ देश हैं जो हमसे और पीछे हैं। वैसे यदि प्रेस आजाद नहीं है तो इसमें सरकार की क्या गलती है? प्रेस को अपनी आजादी पर अपना अख्तियार रखना चाहिए। आप स्वयं यदि सरकार की गोदी में बैठ जाना चाहते हैं तो बताइए भला इसमें मोदी जी की क्या गलती है। आपने जब पूछा कि आप आम चूस कर या काट कर खाना पसन्द करते हैं तो उन्होंने बता दिया कि उन्हें चूसना पसन्द है। ‘चूसना’ और ‘सूचना’ में एक षब्द का ही हेर-फेर है। आपको सूचना पसन्द हैं तो मुझे चूसना पसन्द है। इसमें गलत क्या है? भारत में प्रेस आजाद है। आप टीवी पर उछल सकते हों, कूद सकते हो, भौंक सकते हो, तलवे चाट सकते हो, मन की बात जो रेडियो से सुन जाती है, आप टीवी पर भी चला सकते हो। प्रेस की आजादी की इससे बड़ी गवाही क्या होगी? धर्म के नाम पर संसद चला सकते है और उसमें धर्म संसद में संविधान की धज्जियां उड़ा सकते है। उसके प्रदर्शन पर जितनी बार चाहंे-धर्म संसद बुलाकर एक समुदाय विशेष के खिलाफ हिंसा का वातावरण बना सकते है। भारत में प्रेम आजाद है। भारत में पत्रकार गुलाम हैं। आजाद प्रेस में काम करने वाला गुलाम पत्रकार लोकतंत्र का पहरुआ है। डेनमार्क हो या कोई और देश-प्रेस कांफ्रेंस से भागने वालों का डंका बजाना भारतवंशियों के लिए राष्ट्रधर्म है। 

हार्दिक पलट गए…

जिन हार्दिक पटेल से भाजपा की गुजरात सरकार चौंक जाती थी उनका पलट जाना सत्तरारूढ़ दल के लिए बड़ी राहत की बात होगी। 21 वर्ष के हार्दिक पटेल का आदर्श 28 का होते-होते व्यावहारिक यथार्थवाद में बदल गया तो आष्चर्य कैसा? कितने ही लोग कांग्रेस छोड़कर भाजपा की वाषिंग मषीन से पाक-साफ हो चुके हैं। सुना है हार्दिक पटेल के विरूद्ध भी सारे मुकदमे वापस हो गए हैं। कांग्रेस को बधाई दी जानी चाहिए कि अपने नेताओं के सुरक्षित जीवन यापन के लिए उसने सारी स्वतंत्रता दे रखी है। आश्चर्य तो यह है कि चिदम्बरम अभी तक कांग्रेस में कैसे है? चिन्तन शिविर के बाद कांग्रेस के अमृत मंथन में उसे सशक्त करने का कौन सा च्यवनप्राश निकला यह तो पता नहीं पर पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे हैं कि उदयपुर में बिताए तीन दिन से किसे फायदा हुआ? हार्दिक का पलट जाना भी इसी उहापोह का नतीजा है। स्थानीय क्षत्रपों की राजनीति का नामा जोड़ा राष्ट्रीय नेताओं की राजनीति से नहीं मिल पाना एक बेमेल रिश्तेदारी को जन्म देता है जो ज्यादा समय चल नहीं पाती। हार्दिक और जिग्नेश की जोड़ी हीरा-मोती की जोड़ी साबित हो सकती थी कांग्रेस के लिए। मगर मांझी जब खुद की नाव डुबोए तो उसे कौन बचाए?

पेट्रोल की धार, चुनाव की मार

भारत में सारे चुनाव वार्षिक कर दिए जाने चाहिए। हर महीने कम से कम दो राज्यों की विधानसभा के चुनाव होने चाहिए जिससे एक वित्तमंत्री एक ही बजट पेष कर सके और लोग ‘‘पचास साल तक राज करेंगे’’ के झांसे में न आएं। पेट्रोल पर दस रूपया कम करके भाजपा की केन्द्र सरकार जनता के जेब में लगाई सेंध की आंशिक भरपाई कर उनके वोटों में सेंध लगाने की योजना लेकर आई है। नड्डा से लेकर अमित शाह तक और मोदी से लेकर मोहन भागवत तक सभी सिर्फ चुनाव जीतने का सपना देखते है और उसी का सतूना बांधते हैं। 

देष में क्या हो रहा है, अर्थव्यवस्था पटरी से क्यों उत्तर रही है, पढ़े-लिखे लोग, पत्रकार अध्यापक और सामाजिक कार्यकर्ता क्यों जेलों में ठसे जा रहे हैं, नलों में पानी क्यों नहीं आ रहा है, हर मस्जिद के नीचे मंदिर के अवषेष क्यों ढंूढे जा रहे हैं, मस्जिदों के बाहर हनुमान चालीसा पढ़कर क्यों साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा है, इसका पता लगाने का काम कौन करेगा यह अभी पता नहीं है।

Exit mobile version