अग्नि आलोक

*आपातकाल की 50 वी वर्षगांठ :सत्ता सुख के लिए देश को कैद खाने में तब्दील कर दिया था इंदिरा गांधी ने*

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*रामबाबू अग्रवाल* 

इस 25 जून को आपातकाल लगाए जाने की 50 वीं वर्षगांठ है । 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार को बचाने के लिए पूरे देश को आपातकाल की काली छाया में जीने को मजबूर कर दिया था। एक तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के रायबरेली से विजयी होने को अवैध घोषित कर दिया था और उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी । दूसरी ओर जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार सहित पूरे देश में जन आंदोलन उफान पर था। इसलिए इमरजेंसी लागू कर तत्कालीन सरकार ने सत्तासुख के लिए पूरे देश को जेल खाने में तब्दील कर दिया था ।

जिनका जन्म 1977 के बाद हुआ है वे शायद आपातकाल की यात्राओं की कल्पना भी नहीं कर सकते ।आज देश के मौजूदा समाज में 1977 के बाद जन्मे लोगों का प्रभुत्व है. यह देश उनका है. उन्हें अपने देश के इतिहास और ख़ास कर उन दिनों लगाए गए आपातकाल के कारणों और उसके परिणामों से अवगत होने की ज़रूरत है.

आज की नौजवान पीढ़ी आजादी के माहौल में खुले रूपसे अपने विचार रखती है सरकार की आलोचना भी करती है लेकिन सोचिए अगर नौजवानों को फेसबुक की हर  पोस्ट पहले सरकार को भेजनी पड़े, सरकार जो चाहे वही फेसबुक पर दिखे, अगर ट्विटर व्हाट्सएप टीवी पर वही दिखे, अखबार में वही छपे जो सरकार चाहे, याने लिखने बोलने-सुनने की आजादी पर सेंसर लग जाए तो कल्पना कीजिए की कैसा लगेगा । आपातकाल में जिन लोगों ने भी यातनाएं सही है उन्होंने यही सब देखा है ।

 50 साल पहले जब इदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया था। उसके ऐसे ही किस्से सुनकर आज भी लोगों में सिहरन दौड़ जाती है । आपातकाल के इस भयानक दूर हो कांग्रेस भी अब भूल मानने लगी है। हालांकि जनतापार्टी की सरकार ने संविधान संशोधन करके आपातकाल लगाए जाने की सभी सभावना पर रोक लगा दी है ।

आपातकाल के उन दिनों में प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया ने भी देश के आम नागरिकों का साथ देने का ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया था. तब की तानाशाह सरकार के आगे उन्होंने भी घुटने टेक दिए थे.रामनाथ गोयनका का इंडियन एक्सप्रेस, द स्टेट्समैन और मेनस्ट्रीम जैसे कुछ ही मीडिया संस्थान तब अपवादों में से थे जिन्होंने सरकार की नीतियों का विरोध किया.  इमरजेंसी में मीडिया पर लगाए प्रतिबंध  को इस टिप्पणी  से समझा जा सकता है “मीडिया तो रेंगने लगी जबकि उन्हें केवल झुकने को कहा गया था.”

आपातकाल के उन दो वर्षों के दौरान देश की यह दुखद स्थिति थी. भारतीय संविधान और यहां के क़ानून में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट को ऐसे किसी भी संशोधन की जांच करने से रोक दिया गया था.

इसके परिणामस्वरूप, सरकार को भारत के पवित्र संविधान और यहां के लोगों की ज़िंदगी और उनकी स्वतंत्रता के साथ कुछ भी करने की आज़ादी मिल गई थी। जनता के मूल अधिकार छीन लिए गए, उनकी स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई, तानाशाही शासन के द्वारा अपने मनचाहे तरीके से संविधान को ग़लत ढंग से परिभाषित किया गया. और ये सब किया गया आपातकाल के नाम पर. 

आपातकाल से देश को मिले सबक से सीखने के लिए कई बातें हैं.एक आम आदमी केवल दो वक्त की रोटी कमाने के लिए ज़िंदा नहीं रहता. अपने मूल अधिकारों को छीने जाने पर वो विद्रोह भी कर बैठता है. और यही हुआ 1977 के चुनावों में जब देश की अशिक्षित, ग़रीब जनता ने आपातकाल लगाने वालों के ख़िलाफ़ भारी मतदान किया.

25 जून 1975 को देश में आपातकाल की ग़लत घोषणा को 21 मार्च 1977 को हटा लिया गया और जनता ने कुछ ही महीनों के बाद वोट देने की अपनी ताक़त से उन काले दिनों पर अपना फ़ैसला देकर मतदान के महत्व को स्पष्ट कर दिया.

वो 21 महीने आज़ाद भारत के वास्तव में काले दिन थे. वो नहीं भूले जा सकने वाले कड़वे अनुभव थे. उन काले दिनों को याद करके हमें निरंतर लोकतंत्र को ख़तरे में डालने वाले तथ्यों पर व्यापक विचार विमर्श करते रहना चाहिए. क्योंकि हमें जीने के लिए केवल रोटी की दरकार नहीं है. हमें जीने के और स्वतंत्रता के कुछ निश्चित अधिकार प्राप्त हैं. उनके बगैर जीवन निरर्थक है.

जेल में बिताए उन दिनों का मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव रहा. अनुभवी नेताओं और साथी कैदियों के साथ विचार विमर्श से मुझे लोगों की समस्याओं, राजनीति और देश के बारे में कई चीज़ें सीखने का अवसर मिला. इसमें सबसे ख़ास यह था कि इसने लोकतंत्र की रक्षा करने और बुनियादी स्वतंत्रता के लिए जनता के अधिकार के मेरे संकल्प को और मज़बूत बनाया.

1975 में जनता को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किए जाने का कोई औचित्य नहीं था. लेकिन बेबुनियाद आंतरिक अशांति को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बता कर आपातकाल लगा दिया गया. वास्तव में अशांति यह थी कि देश की जनता भ्रष्ट नेताओं से ऊब चुकी थी और पूरे देश में न्यू इंडिया के लिए लोग संगठित हो कर व्यवस्था में आमूल बदलाव के लिए अपनी ज़ोरदार आवाज़ उठाने लगे थे.

संयोगवश, उन्हीं दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री के चुनाव को अवैध घोषित करने का अपना ऐतिहासिक फ़ैसला दिया.आपातकाल के दौरान पूरा देश कारागार में परिवर्तित हो गया था. विपक्ष के सभी नेताओं को रात में ही जगा कर नज़दीकी जेल में ज़बरन उन्हें डाल दिया गया.

जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फ़र्नांडिस, चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, मधु दंडवते, रामकृष्ण हेगड़े, सिकंदर बख्त, एच. डी. देवेगौड़ा, अरुण जेटली, रवि शंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, राम विलास पासवान, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताते हुए जेल में डाल दिया गया.राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख बाला साहब देवरस समेत तीन लाख से अधिक लोगों को जेल में डाल दिया गया.

आपातकाल की घोषणा ने देश की लोकतांत्रिक संरचना को हिला कर रख दिया. लोकतांत्रिक व्यवस्था के कमज़ोर पक्षों पर व्यापक विचार विमर्श हुआ और देश ने दोबारा कभी भी इसे नहीं लगाए जाने का प्रण किया.यह प्रतिज्ञा तभी बनी रहेगी जब देश बार बार उस आपातकाल से मिलने वाले सबक को याद करता रहेगा. ख़ास कर, युवाओं को आज़ाद भारत के उस काले अध्याय की जानकारी और उससे मिले सबक को जानना होगा.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, “जब भी मैं निराशा होता हूं, तब इतिहास के पन्नों को पलटकर सत्य और प्रेम की जीत को दोहराने वाले तथ्यों का स्मरण करता हूं. इतिहास के पन्नों पर आतातायी और हत्यारे भी रहे हैं और कुछ पल के लिए वो अजेय भी दिखे लेकिन यह ख़ास ख़्याल रखें कि अंत में उनका खात्मा हुआ है. जीत हमेशा सत्य की हुई है.” हमें अपने कटु अनुभवों से सीख लेने की आवश्यकता है, ताकि न्यू इंडिया के सपने को साकार कर सकें.

(लेखक इंदौरके वरिष्ठ समाजवादी नेता हैं आपातकाल में मीसा के तहत बंदी बनाए गए थे वर्तमान में लोहिया विचार मंच मध्य प्रदेश के अध्यक्ष है)

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