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अमृत काल में चमत्कारों का उद्योग

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(जब कुत्ते देवता बने और मूर्तियाँ बीमार पड़ीं)

–तेजपाल सिंह ‘तेज’

 

          किसी भी सभ्यता की पहचान उसके स्मारकों से नहीं, उसके सवालों से होती है। और जब सवाल धीरे-धीरे चुप हो जाएँ, तो समझ लेना चाहिए कि सभ्यता जीवित तो है, पर चेतना कोमा में चली गई है।हम आज उसी कोमा काल में जी रहे हैं, जिसे बड़े गर्व से अमृतकाल कहा जा रहा है। यह वह काल है जिसमें देश डिजिटल हो चुका है, लेकिन सोच अब भी पत्थर युग में अटकी है। यह वह समय है जब अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने वाले हाथ, ज़मीन पर चमत्कार खोजने में व्यस्त हैं। जहाँ वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में कम, और गलियों-चौराहों पर ज़्यादा प्रयोग हो रहे हैं— धर्म के नाम पर, आस्था के नाम पर, और सबसे ज़्यादा—भीड़ के नाम पर।

अध्याय एक:  कुत्ता, मूर्ति और अचानक प्रकट हुआ ईश्वर

          उत्तर प्रदेश के बिजनौर में एक साधारण-सी घटना घटती है। एक आवारा कुत्ता भगवान हनुमान की मूर्ति के चारों ओर घूमने लगता है। बस। कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन भारत में कहानियाँ वहाँ खत्म नहीं होतीं जहाँ तर्क शुरू होता है। यहाँ तर्क को शुरुआत में ही बाहर खड़ा कर दिया जाता है—जूते उतारने की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि तर्क वैसे भी मंदिर में प्रवेश के योग्य नहीं माना जाता। लोग रुकते हैं।
लोग देखते हैं। और फिर लोग मान लेते हैं। किसी ने कहा—“यह साधारण कुत्ता नहीं है।”दूसरे ने जोड़ा—“इसमें कोई दिव्य आत्मा है।” तीसरे ने कहा—“देखो, घूम रहा है… यह तो संकेत है!” और संकेत मिलते ही समूह-चेतना ने सामूहिक आत्महत्या कर ली।

अध्याय दो: जब कुत्ता थका, और श्रद्धा जागी

          कुछ ही देर में कुत्ता थक जाता है और बैठ जाता है। लेकिन अब वह सिर्फ कुत्ता नहीं रहा। अब उसकी थकान भी पवित्र है। उसकी साँसें भी मंत्र हैं। और उसका बैठना—लीला।

लोग उसके पैर छूने लगते हैं। औरतें दुपट्टा डालती हैं। बुज़ुर्ग आशीर्वाद लेते हैं। युवा डियो बनाते हैं। एक स्वयंभू पुजारी प्रकट होता है— जो लोगों को समझाता है कि “ज़्यादा परेशान मत करो, देवता थक गए हैं।” यह दृश्य हास्यास्पद नहीं है। यह दृश्य भयावह है। क्योंकि यह दिखाता है कि जब समाज सोचने से थक जाता है, तो वह किसी भी बैठे हुए कुत्ते को भगवान बना देता है।

अध्याय तीन: मूर्तियों की तबीयत और डॉक्टरों की श्रद्धा

          अब कहानी में विज्ञान आता है—लेकिन एकदम नए अवतार में। एक मूर्ति की “स्वास्थ्य जांच” होती है। डॉक्टर स्टेथोस्कोप लेकर आते हैं। मूर्ति की छाती सुनी जाती है। शायद दिल धड़क रहा हो। शायद नहीं। लेकिन जाँच ज़रूरी है। क्योंकि जब विश्वास बीमार पड़ जाए, तो चिकित्सा भी व्यंग्य बन जाती है। यह वही देश है जहाँ अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी है, लेकिन मूर्तियों की जाँच के लिए डॉक्टर उपलब्ध हैं।

अध्याय चार: यह पहली बार नहीं है, आख़िरी भी नहीं होगा

          इस देश की स्मृति बहुत कमजोर है। हम भूल जाते हैं कि कभी गणेश जी दूध पीते थे। पूरा देश दूध लेकर दौड़ पड़ा था—और कोई यह नहीं पूछ पाया कि अगर मूर्ति पी रही है, तो नीचे थाली क्यों भर रही है? कभी मूर्तियों की आँखों से आँसू बहते हैं। कभी दीवारों से खून रिसता है। कभी पेड़ पर देवता प्रकट हो जाते हैं। सूत्र हमेशा एक ही होता है—रात में चुपचाप सिंदूर, सुबह में भीड़, और शाम तक मंदिर।

अध्याय पाँच: धर्म: आस्था नहीं, उद्योग

          धर्म यहाँ श्रद्धा नहीं रहा। यह अब एक सुव्यवस्थित उद्योग है। जहाँ चमत्कार है,
वहाँ चंदा है। जहाँ चंदा है, वहाँ राजनीति है। धर्म के दो प्रमुख उपयोग हैं— एक, लोगों को कहानी सुनाने के लिए। दूसरा, लोगों को लाइन में लगाने के लिए। और लाइन में लगे लोग
कभी भक्त कहलाते हैं, कभी वोटर।

अध्याय छह: अभिनेता, बाबा और भगवान बनने की सुविधा

          इस देश में भगवान बनने के कई रास्ते हैं। दक्षिण में—अभिनेता। उत्तर में—बाबा।
राजनीति में—नेता। लेकिन हर भगवान को बीमार पड़ने पर डॉक्टर ही चाहिए। चमत्कार मंच पर होते हैं। आईसीयू में नहीं।

कुत्ता, मूर्ति और हमारा लोकतांत्रिक विवेक (एक राजनीतिक–सामाजिक स्तंभ)

          हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ देश का विवेक कभी टीवी स्टूडियो में चीखता है,
तो कभी किसी गली में अचानक चमत्कार बनकर प्रकट हो जाता है। कभी राष्ट्र खतरे में होता है, तो कभी भगवान। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बिजनौर से आई एक घटना ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया कि क्या समस्या धर्म में है, या हमारी सोच में? एक आवारा कुत्ता भगवान हनुमान की मूर्ति के चारों ओर घूमने लगा। बस इतना-सा दृश्य।
लेकिन देखते ही देखते वह दृश्य समाचार बन गया, फिर आस्था, और अंततः—उत्सव। लोगों ने मान लिया कि उस कुत्ते में कोई दिव्य आत्मा है। लोगों ने उसके पैर छुए। लोगों ने उसे परेशान न करने की अपील की। किसी ने उसके लिए बैठने की व्यवस्था की। और किसी ने—व्यवस्था संभालने के लिए स्वयंभू पुजारी की भूमिका भी निभा ली। यह दृश्य मजाकिया लगता है, लेकिन लोकतंत्र मज़ाक में नहीं मरता— वह ऐसे ही दृश्यों में धीरे-धीरे दम तोड़ता है।

जब आस्था सोच की जगह ले ले:

          आस्था व्यक्ति का निजी मामला है। लेकिन जब आस्था सामूहिक उन्माद बन जाए,
तो वह समाज का विषय बन जाती है। यह पहली बार नहीं हुआ। हम सबने देखा है—
कभी गणेश जी को दूध पिलाया गया, कभी मूर्तियों की आँखों से आँसू बहे, कभी दीवारों से खून रिसा। हर बार एक ही बात कही गई—“अगर सवाल करोगे, तो आस्था नहीं है।” यह वाक्य लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक है जितना किसी तानाशाही का फरमान।

मूर्ति बीमार और समाज स्वस्थ?                                                                             

               सबसे चिंताजनक दृश्य तब सामने आता है जब मूर्तियों की जांच के लिए डॉक्टर लाए जाते हैं।  स्टेथोस्कोप से पत्थर की छाती सुनी जाती है। यह दृश्य व्यंग्य नहीं, यह हमारे समय का एक्स-रे है। जिस देश में अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, जहाँ मरीज़ ज़मीन पर पड़े हैं,
वहाँ मूर्तियों की तबीयत पर चिंता हो रही है। यह प्राथमिकताओं का सवाल है— और राजनीति इन्हीं प्राथमिकताओं पर पलती है।

धर्म, राजनीति और उपयोगी भीड़   ;

          धर्म यहाँ आस्था नहीं रहा। वह अब एक उपयोगी संसाधन है। जहाँ भीड़ है, वहाँ संभावना है। जहाँ संभावना है, वहाँ राजनीति है। धर्म का इस्तेमाल दो तरह से होता है—
एक, लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए। दूसरा, उन्हें तार्किक रूप से तोड़ने के लिए। और जब लोग सवाल पूछना छोड़ देते हैं, तब सत्ता को जवाब देने की ज़रूरत भी नहीं रह जाती।

कुत्ता प्रतीक है, कहानी नहीं:      इस कहानी में कुत्ता सिर्फ कुत्ता नहीं है। वह उस समाज का प्रतीक है जो थका हुआ है— महंगाई से, बेरोजगारी से, अन्याय से। और जब समाज थक जाता है, तो वह समाधान नहीं, चमत्कार खोजता है।

आखिरी सवाल:

          यह स्तंभ किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। यह उस मानसिकता के ख़िलाफ़ है जो धर्म को सोच का विकल्प बना देती है। लोकतंत्र सवालों से चलता है, चमत्कारों से नहीं। आज अगर हम हँस रहे हैं एक कुत्ते की पूजा पर, तो कल किसी और घटना पर हम खुद ख़बर बन सकते हैं। सवाल बस इतना है— क्या हम नागरिक बने रहना चाहते हैं, या केवल भक्त? क्योंकि दोनों एक साथ बहुत मुश्किल से चल पाते हैं।

 

सभ्यता का अंतिम सवाल

          सारांशत: यह लेख किसी ईश्वर के विरुद्ध नहीं है। यह उस सोच के विरुद्ध है जो ईश्वर को  सोचने का विकल्प बना देती है। आस्था निजी होती है। लेकिन अंधभक्ति सार्वजनिक आपदा बन जाती है। आज अगर हम हँस रहे हैं एक कुत्ते की पूजा पर, तो याद रखिए— कल किसी और पत्थर पर सिंदूर लगेगा, और हम फिर कतार में खड़े होंगे। सभ्यता का असली इम्तिहान यह नहीं है कि हम किसे पूजते हैं, बल्कि यह है कि पूजने से पहले हम सोचते भी हैं या नहीं। (https://youtu.be/YN3Sjhtb4_w?si=CD00C3xFsHtRNuUF)

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