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असंख्य धिक्कार….!

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वासुकि प्रसाद ‘उन्मत’

जिनके आंदोलन पे कराया पानी की बौछार
पुलिस के, ख़ुद के डंडों से पीट जिनको डाले मार
जिन पर बेरहमी से चढ़ा दिया अहंकार में कार
घायल कर दिया, मार डाले, निज मनुष्यता को बिसार
घूम रहा है ठाठ से वो हत्यारा रसूखदार
पक्षपात वश कर न रहे हो तुम जो उसे गिरफ्तार

साल से ऊपर हुए, जिन लड़तों पर किये अत्याचार
पानी बिजली जिनके काट के लगाये कंटीले तार
जिनकी राह में कीलें रोपीं कर दी खड़ी दीवार
कड़क ठंड, झुलसाती लू में मारे जिन्हें बार बार
उनकी मौंतों के आंकड़े से कर हो रहे इनकार ?
कितने बड़े क्रीमलल हो तुम ? ख़ुद पर करो विचार !

जिनके आंदोलन से मान कर वोट वश अपनी हार
काले क़ानून वापस लेने पड़े तुम्हें झखमार
अपनी घिनौनी हार को भी तुम नहीं मान रहे हार ?

कितने तुम मक्कार धूर्त हो इस पर करो विचार
जो संगठन तुम्हारी जैसी प्रवृत्तियों के हैं शिकार
जो भी व्यक्ति तुम्हारी जैसी प्रवृत्तियों का है शिकार
उन सब को लानत है लानत, हैं असंख्य धिक्कार
जनप्रतिनिधि होने का नैतिक है न उन्हें अधिकार !

वासुकि प्रसाद ‘उन्मत’

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