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*दलित-वंचित समुदाय के बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट कांग्रेस की ओर बढ़ रहे हैं?*    

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तेजपाल सिंह ‘तेज’    




        भारतीय लोकतंत्र की यात्रा हमेशा हाशिए पर खड़े समाजों की भागीदारी और उनके संघर्ष से जुड़ी रही है। दलित समाज, जिसने सदियों से उत्पीड़न सहा और आधुनिक भारत में संविधान के सहारे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ी, आज एक बार फिर ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। भाजपा के उदय और उसके हिंदुत्ववादी एजेंडे ने संविधान और सामाजिक न्याय के मूल्यों पर गहरी चोट पहुँचाई है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी जैसे दल, जो कभी दलित राजनीति की धुरी हुआ करते थे, अब हाशिए पर पहुँच गए हैं। ऐसे समय में दलित बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं और विचारकों का कांग्रेस की ओर झुकाव केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का प्रयास प्रतीत होता है। यह परिघटना बताती है कि भारतीय राजनीति का केंद्र एक बार फिर “संविधान और सामाजिक न्याय” के प्रश्नों पर लौट रहा है।          दलित-वंचित समुदाय के भीतर बौद्धिक और राजनीतिक हलचलें हमेशा से रही हैं। यह समुदाय, ऐतिहासिक उत्पीड़न और हाशियाकरण का सामना करते हुए, सामाजिक न्याय और संविधान-आधारित अधिकारों के लिए लगातार संघर्षरत रहा है। स्वतंत्रता के बाद बने राजनीतिक समीकरणों में कभी कांग्रेस, कभी समाजवादी धारा और फिर कांशीराम–मायावती की बहुजन राजनीति ने उन्हें प्रतिनिधित्व देने का दावा किया। लेकिन आज एक दिलचस्प परिघटना सामने आ रही है: कई प्रमुख दलित बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट कांग्रेस की ओर रुख कर रहे हैं। हाल ही में प्रोफ़ेसर रतन लाल और प्रोफ़ेसर रविकांत जैसे चर्चित नामों का कांग्रेस से जुड़ना इसका प्रमाण है। 1. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और विकल्पों का संकट:          आज की राजनीति लगभग दो खेमों में बँटी नज़र आती है—एक ओर एनडीए/भाजपा–आरएसएस गठबंधन, और दूसरी ओर इंडिया गठबंधन, जिसमें कांग्रेस केंद्रीय शक्ति है। दलित बुद्धिजीवियों का कहना है कि इन दोनों के अलावा कोई ठोस तीसरा विकल्प मौजूद नहीं है। एनडीए की राजनीति को वे संविधान-विरोधी, सामाजिक न्याय-विरोधी और लोकतांत्रिक संस्थाओं को खोखला करने वाली मानते हैं। ऐसे में, जिन्हें संविधान और अंबेडकरवादी दृष्टि प्रिय है, उनके लिए स्वाभाविक ठिकाना विपक्ष ही बनता है।   2. दलित पार्टियों की कमजोर होती विश्वसनीयता:          बहुजन समाज पार्टी (बसपा) कभी दलितों की सबसे मज़बूत राजनीतिक आवाज़ थी। लेकिन आज वह संगठनात्मक रूप से कमजोर, नेतृत्वहीनता और अवसरवादिता की शिकार है। मायावती लंबे समय से सक्रिय सड़क-राजनीति से दूर हैं। रामविलास पासवान की विरासत उनके बेटे चिराग पासवान के हाथों में भाजपा-समर्थन की राजनीति में सिमट गई है। रामदास अठावले सत्ता-भोग की राजनीति में उलझे दिखते हैं। चंद्रशेखर आज़ाद उभरते हुए नेता ज़रूर हैं, लेकिन अभी राष्ट्रीय स्तर पर स्थायी विकल्प नहीं बन पाए। ऐसे में दलित बुद्धिजीवियों को लगता है कि इन पार्टियों में न तो कोई ठोस वैचारिक एजेंडा बचा है, न ही सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने की प्रतिबद्धता। 3. कांग्रेस और “संविधान बचाओ” की राजनीति          रतन लाल और रविकांत दोनों का तर्क है कि वर्तमान दौर में संविधान, शिक्षा व्यवस्था, आरक्षण, और लोकतांत्रिक संस्थाएँ सबसे बड़े ख़तरे में हैं। सरकारी नौकरियों और पेंशन का ख़ात्मा, शिक्षा में निजीकरण और आरएसएस–भाजपा की “मनुस्मृति-प्रधान” सोच उनके लिए चेतावनी है। ऐसे समय में कांग्रेस पार्टी, ख़ासतौर पर राहुल गांधी, “संविधान बचाओ” और “लोकतंत्र बचाओ” का नारा लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए उन्हें लगता है कि कांग्रेस के साथ जुड़ना केवल एक “राजनीतिक दल में शामिल होना” नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और वैचारिक मोर्चे पर खड़े होने जैसा है। 4. कांग्रेस की आत्म-आलोचना और सुधार की संभावना          दलितों और पिछड़ों के बीच यह धारणा रही है कि कांग्रेस ने अतीत में उन्हें हाशिये पर रखा। लेकिन अब कांग्रेस नेतृत्व बार-बार सार्वजनिक रूप से अपनी “गलतियों” को स्वीकार करता दिख रहा है। राहुल गांधी स्वयं कहते हैं कि दलितों और पिछड़ों के लिए कांग्रेस ने पर्याप्त कार्य नहीं किया। इस आत्म-स्वीकारोक्ति को कई बुद्धिजीवी सकारात्मक संकेत मानते हैं कि पार्टी अपने अतीत से बहुत कुछ सीखने को तैयार है। 5. व्यक्तिगत और सामाजिक जोखिम          रतन लाल और रविकांत जैसे प्रोफ़ेसरों पर हाल ही में कई FIR दर्ज की गईं। उन्हें विश्वविद्यालय और राज्य व्यवस्था से प्रताड़ना झेलनी पड़ी। वे कहते हैं कि आज “खामोशी” और “समझौते” का माहौल है—नेता डर के कारण या सत्ता-लोलुपता के कारण सवाल नहीं उठाते। ऐसे दौर में उनका मानना है कि बुद्धिजीवियों को केवल लिखने–बोलने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सीधा राजनीति में उतरना चाहिए। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस में शामिल होकर खुलकर संघर्ष की राह चुनी। निष्कर्षत: —          दलित-वंचित समुदाय के बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट कांग्रेस की ओर इसलिए जा रहे हैं क्योंकि–·        भाजपा–आरएसएस को वे संविधान और सामाजिक न्याय के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मानते हैं।·        दलित-आधारित पार्टियाँ या तो बिखर चुकी हैं या सत्ता-समझौते में फँसी हैं।·        कांग्रेस “संविधान बचाओ” की राजनीति का केंद्रीय मंच बनकर उभर रही है।·        राहुल गांधी और कांग्रेस का आत्म-आलोचनात्मक रवैया उन्हें उम्मीद देता है कि यह पार्टी अपने पुराने दोषों को दोहराएगी नहीं।           मेरी दृष्टि में, यह एक रणनीतिक और वैचारिक दोनों स्तर का फैसला है। दलित बुद्धिजीवी जानते हैं कि कांग्रेस कोई आदर्श विकल्प नहीं है, लेकिन मौजूदा दौर में यही वह राजनीतिक शक्ति है जो भाजपा–आरएसएस के वर्चस्व को चुनौती देने की स्थिति में है। उनके लिए यह लड़ाई सत्ता हासिल करने से ज़्यादा संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई है। और जब सवाल अस्तित्व और भविष्य का हो, तो आंशिक विकल्प भी मुख्य विकल्प बन जाता है। दलित-वंचित समुदाय के बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट कांग्रेस की ओर क्यों बढ़ रहे हैं?(ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सहित विस्तृत व्याख्या)          भारतीय राजनीति में दलित-वंचित समाज हमेशा से एक निर्णायक कारक रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज़ादी के बाद के लोकतांत्रिक दौर तक, उनकी भागीदारी और अधिकारों का प्रश्न भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान बनाकर उन्हें संवैधानिक अधिकार तो दिए, किंतु सामाजिक और राजनीतिक सत्ता में उनकी हिस्सेदारी का सवाल अधूरा रह गया। कांग्रेस पार्टी, जो स्वतंत्रता आंदोलन की धुरी रही, ने प्रारंभिक दशकों में दलितों को कुछ हद तक स्थान दिया, लेकिन जातिगत वर्चस्व की राजनीति और संगठनात्मक उपेक्षा के कारण दलित नेतृत्व धीरे-धीरे अलग राह पर चला गया। यही कारण है कि कांशीराम–मायावती जैसी धारा ने दलित राजनीति को कांग्रेस से अलग कर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई।          आज, जब भाजपा–आरएसएस के वर्चस्व और दलित-आधारित दलों के पतन का दौर चल रहा है, तब फिर से दलित बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट कांग्रेस की ओर लौटते दिख रहे हैं। यह एक साधारण राजनीतिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक परिस्थितियों से जन्मा बड़ा परिवर्तन है।  1. आंबेडकर और कांग्रेस: एक जटिल रिश्ता–          डॉ. अंबेडकर का कांग्रेस से रिश्ता बहुत सहज नहीं था। गांधी और अंबेडकर के बीच पूना पैक्ट (1932) का समझौता तो हुआ, लेकिन अंबेडकर को हमेशा लगता रहा कि कांग्रेस ने दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ को दबाने का प्रयास किया। फिर भी, स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अंबेडकर को संविधान-सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया। यही वह क्षण था जब दलित नेतृत्व और कांग्रेस का एक ऐतिहासिक जुड़ाव कायम हुआ। लेकिन बाद के दशकों में कांग्रेस दलितों को संगठनात्मक स्तर पर निर्णायक नेतृत्व नहीं दे पाई। नतीजा यह हुआ कि दलित राजनीति ने स्वतंत्र रास्ता खोजा। 2. बहुजन राजनीति का उदय और क्षरण–          1980–90 का दशक दलित राजनीति के उत्कर्ष का काल था। कांशीराम और मायावती ने “बहुजन समाज पार्टी” बनाकर कांग्रेस से दलितों को खींच लिया। उत्तर प्रदेश और बिहार में यह राजनीति अपने चरम पर पहुँची। लेकिन समय के साथ-साथ—·        मायावती का नेतृत्व व्यक्तिवादी और अवसरवादी हो गया।·        रामविलास पासवान की राजनीति सत्ता-साझेदारी में सिमट गई।·        महाराष्ट्र में दलित पैंथर आंदोलन विघटित हो गया।·        चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नए चेहरे उभरे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वैकल्पिक ढांचा तैयार नहीं कर पाए।·        यह भी कि दलिनेताओं की राजनीतिक आकांक्षा इतनी बलवती होती गई कि हर कोई प्रधानमंत्री बनने की सोचने लगा,  हुआ ये कि न घर के रहे न घाट के। इस तरह इन दलों का धरातल काम करने वाला जनबल  बिखरता चला गया।           इस क्षरण ने दलित बुद्धिजीवियों को मजबूर किया कि वे देखें कि कौन-सा मंच उनके सामाजिक–राजनीतिक सपनों को संरक्षित कर सकता है। 3. भाजपा–आरएसएस और “मनुस्मृति बनाम संविधान” की लड़ाई–          आज दलित बुद्धिजीवियों को सबसे बड़ा ख़तरा भाजपा–आरएसएस की विचारधारा से दिखता है। विदित हो कि भाजपा सरकार भी आर एस एस के एजेंडे को लागू करने की दिशा में निरंतर काम भी कर रहा है–·        शिक्षा का निजीकरण और सरकारी नौकरियों का क्षरण, जो दलित मध्यम वर्ग की रीढ़ है।·        आरक्षण को अप्रत्यक्ष रूप से निष्प्रभावी बनाने की कोशिशें।·        संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करना।·        खुले तौर पर यह बयान कि “संविधान बदलना चाहिए”।           दलित बुद्धिजीवी इसको मनुस्मृति बनाम संविधान की लड़ाई मानते हैं। ऐसे में उनके लिए कांग्रेस ही एकमात्र बड़ा मंच दिखता है जो भाजपा–आरएसएस से सीधी लड़ाई लड़ रहा है। 4. कांग्रेस की “आत्मालोचना” और नई दिशा–          कांग्रेस का अतीत दलितों के लिए पूर्णतः संतोषजनक नहीं रहा। लेकिन आज राहुल गांधी और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व बार-बार यह कह रहा है कि “हमने दलितों–पिछड़ों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना नहीं किया।” यह स्वीकारोक्ति दलित बुद्धिजीवियों के लिए एक उम्मीद है कि कांग्रेस अपनी पिछली गलतियों से सीखने को तैयार है।
इसके अलावा, “भारत जोड़ो यात्रा” जैसी पहल ने कांग्रेस को एक आंदोलनकारी दल के रूप में पुनः स्थापित किया है। यही स्वर दलित एक्टिविस्टों की सोच से मेल खाता है। 5. बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों की भूमिका–          डा.रतन लाल और डा.रविकांत जैसे नाम केवल अध्यापक नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता और जन-संवादक भी हैं। वे कहते हैं—·        “जब स्कूल बंद हो रहे हों, नौकरियाँ खत्म हो रही हों, वोट चोरी हो रहा हो और नेता चुप हों, तो बुद्धिजीवियों को राजनीति में उतरना ही पड़ेगा।”·        “राजनीति कीचड़ है, लेकिन कीचड़ को साफ़ करने के लिए उसमें उतरना ज़रूरी है।”          यानी यह महज़ पार्टी बदलना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए सक्रिय         राजनीतिक हस्तक्षेप है। निष्कर्षत:          दलित-वंचित बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों का कांग्रेस की ओर रुख़ करना तीन स्तरों पर समझा जा सकता है– 1.     विचारधारात्मक स्तर पर – वे भाजपा–आरएसएस की “मनुवादी राजनीति” के खिलाफ़ संविधान-रक्षक राजनीति के साथ खड़े हैं।2.     राजनीतिक स्तर पर – दलित पार्टियों की विफलता और अवसरवाद ने उन्हें ठोस विकल्प के लिए कांग्रेस की ओर धकेला है।3.     ऐतिहासिक स्तर पर – अंबेडकर–कांग्रेस के जटिल रिश्ते के बावजूद, आज की परिस्थिति में कांग्रेस ही वह बड़ी शक्ति है जो लोकतंत्र और संविधान के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर पर संघर्षरत है।          मेरी दृष्टि में, यह केवल “दल-बदल” नहीं है, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए बुद्धिजीवियों का राजनीतिक अवतरण है। वे जानते हैं कि कांग्रेस के भीतर भी चुनौतियाँ हैं, लेकिन वर्तमान दौर में यह वह मंच है जहाँ से दलित–वंचित समाज की आवाज़ को राष्ट्रीय विमर्श में निर्णायक रूप से उठाया जा सकता है। दलित-वंचित बुद्धिजीवियों का कांग्रेस की ओर झुकाव: समकालीन संदर्भ और भविष्य की संभावनाएँ–1. 2024–25 का चुनावी संदर्भ:2024 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ हैं।·        भाजपा लगातार तीसरी बार केंद्र में सत्ता बनाए रखने के लिए पूरी ताक़त से मैदान में है।·        विपक्षी गठबंधन (INDIA) में कांग्रेस केंद्रीय भूमिका निभा रही है।·        दलित वोट बैंक, जो उत्तर भारत की राजनीति में “किंगमेकर” की भूमिका निभाता है, भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अहम है।           यही वह समय है जब दलित बुद्धिजीवी समझते हैं कि अगर वे चुप रह गए, तो भाजपा का “संविधान बदलो” एजेंडा हावी हो जाएगा। इसलिए वे कांग्रेस को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि विपक्ष एक ठोस विकल्प के रूप में उभरे। 2. दलित वोट-बिहेवियर: बदलाव की संभावना:पिछले एक दशक में दलित वोटों में बड़ा बँटवारा हुआ है:·        भाजपा ने राम मंदिर, हिंदुत्व और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे दलितों का एक हिस्सा अपने साथ जोड़ा।·        बसपा लगातार हाशिए पर गई।·        छोटे दल (लोक जनशक्ति, रिपब्लिकन पार्टी, भीम आर्मी आदि) सत्ता-साझेदारी में उलझकर स्थायी आधार नहीं बना पाए।लेकिन हाल के वर्षों में—·        नौकरियों की कमी, आरक्षण पर खतरे, शिक्षा का निजीकरण, और सामाजिक हिंसा ने दलित समाज में असंतोष पैदा किया है।·        यह असंतोष अब कांग्रेस की “संविधान बचाओ” राजनीति से जुड़ने की संभावना रखता है।  यानी, आने वाले चुनावों में दलित वोटों का एक हिस्सा फिर से भाजपा से खिसककर कांग्रेस की ओर जा सकता है, बशर्ते कांग्रेस उन्हें भरोसा दिलाए कि वह केवल चुनावी समय की “दलित राजनीति” नहीं कर रही, बल्कि उनके लिए ठोस एजेंडा रखती है। 3. कांग्रेस की रणनीति और दलित एजेंडा:          कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि—·        केवल राहुल गांधी का व्यक्तिगत करिश्मा काफ़ी नहीं होगा।·        उसे एक स्पष्ट दलित घोषणापत्र और ठोस नीतिगत प्रतिबद्धताएँ पेश करनी होंगी, जैसे:·        सरकारी नौकरियों और आरक्षण की गारंटी।·        सरकारी शिक्षा और छात्रवृत्तियों का विस्तार।·        भूमि सुधार और विशेष घटक योजनाओं का पुनर्जीवन।·        सांप्रदायिक हिंसा और जातीय भेदभाव पर कठोर क़ानून।अगर कांग्रेस इस तरह का ठोस एजेंडा सामने रखती है, तो दलित समाज में उसकी स्वीकार्यता और भी बढ़ सकती है। 4. दलित बुद्धिजीवियों की भूमिका:          दलित एक्टिविस्ट और प्रोफ़ेसर जैसे लोग केवल “सदस्य” नहीं, बल्कि विचारधारा और आंदोलन के वाहक हैं।·        वे सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर लाखों युवाओं तक पहुँचते हैं।·        वे कांग्रेस और राहुल गांधी की “संविधान रक्षक छवि” को ज़मीन पर ले जाकर प्रचारित कर सकते हैं।·        उनके जुड़ने से कांग्रेस में केवल दलित चेहरे नहीं जुड़ेंगे, बल्कि एक नया वैचारिक विमर्श भी पैदा होगा। 5. भविष्य की संभावनाएँ:·        अगर कांग्रेस सचमुच दलित एजेंडे को प्राथमिकता देती है, तो वह भाजपा के हिंदुत्व नैरेटिव को चुनौती देने में सक्षम होगी।·        यह गठजोड़ केवल चुनावी नहीं, बल्कि नया सामाजिक अनुबंध बन सकता है—जहाँ कांग्रेस का “लोकतांत्रिक–धर्मनिरपेक्ष एजेंडा” और दलितों का “सामाजिक न्याय एजेंडा” मिलकर नई राजनीति गढ़ें।·        लेकिन यदि कांग्रेस केवल “प्रतीकात्मक राजनीति” (दलित नेताओं को टिकट, घोषणाओं तक सीमित) करती है और ठोस बदलाव नहीं लाती, तो यह भरोसा जल्दी टूट भी सकता है।          इसका आश्य यह हुआ कि समकालीन परिप्रेक्ष्य में दलित बुद्धिजीवियों का कांग्रेस से       जुड़ना केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम है।          भाजपा–आरएसएस की विचारधारा उन्हें संविधान-विरोधी दिखती है।·        दलित पार्टियों की कमजोरी ने उन्हें विकल्पहीन बना दिया।·        कांग्रेस ही वह राष्ट्रीय मंच है जो लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए खड़ा है।           मेरे मतानुसार, आने वाले वर्षों में यह गठजोड़ तभी सफल होगा जब कांग्रेस दलितों को साझेदार बनाए, न कि केवल मतदाता। यदि कांग्रेस इस अवसर को भुना लेती है, तो भारतीय राजनीति में एक नया बहुजन–कांग्रेस समीकरण बन सकता है, जो 2024–25 के चुनाव ही नहीं, आने वाले दशकों की राजनीति को प्रभावित करेगा।          वर्तमान परिदृश्य में दलित बुद्धिजीवियों का कांग्रेस से जुड़ना केवल पार्टी की मजबूती नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का संकेत है। यह कदम बताता है कि दलित समाज का बड़ा हिस्सा अब प्रतीकात्मक राजनीति से आगे बढ़कर ठोस नीतियों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं की ओर देख रहा है। अगर कांग्रेस इस अवसर को गंभीरता से ले और दलितों को केवल मतदाता नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में साझेदार बनाए, तो यह गठजोड़ भारतीय राजनीति में निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। अन्यथा, यह केवल अस्थायी सहमति रह जाएगी।
          भारतीय लोकतंत्र के लिए यह ज़रूरी है कि संविधान, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के मूल्यों को आगे बढ़ाने वाली ताक़तें एकजुट हों। दलित बुद्धिजीवियों और कांग्रेस का संभावित मेलजोल इसी दिशा की एक पहल है, जो आने वाले वर्षों में या तो नई राजनीतिक आशा गढ़ेगा, या फिर दलित राजनीति को और बिखेर देगा। इसीलिए यह क्षण केवल राजनीति का नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक चेतना और लोकतांत्रिक भविष्य का प्रश्न है।(संदर्भ : उर्मिलेश संवाद https://youtu.be/FFIzvWCFBvw?si=jlo2_hNshOtg95yG) 0000
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