मुनेश त्यागी
इस दुनिया को मजदूरों, किसानों और तमाम मेहनतकशों ने सजाया संवारा है। आज दुनिया भर के मजदूरों का अंतर्राष्ट्रीय पर्व यानी मजदूर दिवस है। दुनिया भर के मेहनतकशों को मई दिवस की क्रांतिकारी बधाईयां और मुबारकबाद।इस दिवस पर फैज अहमद फैज के अंतर्राष्ट्रीय तराने और मेहनतकशों के गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं, देखिये आप भी,,,,,,
मुनेश त्यागी
इस दुनिया को मजदूरों, किसानों और तमाम मेहनतकशों ने सजाया संवारा है। आज दुनिया भर के मजदूरों का अंतर्राष्ट्रीय पर्व यानी मजदूर दिवस है। दुनिया भर के मेहनतकशों को मई दिवस की क्रांतिकारी बधाईयां और मुबारकबाद।इस दिवस पर फैज अहमद फैज के अंतर्राष्ट्रीय तराने और मेहनतकशों के गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं, देखिये आप भी,,,,,,

हम मेहनतकश जग वालों से
जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नही एक देश नही
हम सारी दुनिया मांगेंगे.
यहीं सागर सागर मोती हैं
यहां परबत परबत हीरें हैं
ये सारा माल हमारा है
हम सारा खजाना मांगेंगे.
जे खून बहा जो बाग उजडे
जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का हर गुंचे का
हर गीत का बदला मांगेंगे
ये सेठ व्यापारी रजवाडे
दस लाख तो हम दस लाख करोड़
ये कितने दिन अमरिका से
लडने का सहारा मांगेंगे.
जब सफ सीधी हो जायेगी
जब सब झगडे मिट जायेंगे
हम हर इक देश के झंडे पर
एक लाल सितारा मांगेंगे।
दुनिया के सारे मेहनतकशों को नमन, नन्दन, वंदन और अभिनंदन। इस दुनिया में प्रकृति को छोडकर जो कुछ भी,,,, महल दुमहले, सडकें, कपडे, लत्ते, चुडियां, सिंदूर, रोटी कपडा मकान, अदालतें, कार्यालय, विश्वविद्यालय, स्कूल, पंखे, कूलर, ऐसी, पलंग, किताबें, कार, गाडी, रेल, हवाई जहाज, घडी, पहनने के कपडे, पिज्जा, बरगर, इडली डोसा, बर्फी, लड्डू, जलेबी, दवाईयां, अदालतें, कोट टाई, कमीज पैंट, घडी, मोबाइल, एक्सरे, पर्दे, झूमर, फसलें, सब्जियां, हल, ट्रैक्टर, गहने, सोना चांदी के आभूषण चमचमाती मनमोहिनी लाइटें,, गुफायें, हीरे मोती, सुई धागा ,कपड़े साडी बलाऊज, तख्तो ताज, पंखे, एसी, कूलर, बिजली, सारी की सारी दवाईयां, मेडीकल उपकरण, टीवी, मोबाइल फोन आदि आदि हजारों हजार चीजें, मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों ने अपनी मेहनत और श्रम से ही तो बनाये हैं, इस दुनिया को प्रकृति के बाद, हम सब मेहनतकशों ने ही तो सजाया और संवारा है।
आज मेहनतकशों का अंतर्राष्ट्रीय पर्व यानी मई दिवस यानी मजदूर दिवस है। आज सारी दुनिया में मई दिवस मनाया जाता है। मई दिवस का संक्षिप्त इतिहास इस प्रकार है,,,, कारखाने बनने के बाद पूरी दुनिया में मजदूरों का भयंकर शोषण होता था। उनसे सोलह-सोलह, अट्ठारह-अठारह घंटे काम कराया जाता था। उनकी कार्य दशाओं को नियमित करने वाला कोई कानून नहीं था। इसके बाद मजदूरों की कार्य दशा को सुधारने के लिए 18 वीं सदी के शुरू से ही मजदूर आंदोलन शुरू हो गए थे। दुनिया के कई देशों के मजदूर सन अट्ठारह सौ से ही आठ घंटे की मांग करते चले आ रहे थे। इसको लेकर लगातार आंदोलन होते रहे और 8 घंटे का कार्य दिवस करने की मांग लगातार जारी रही। लगातार चल रहे इस आंदोलन के बाद, आठ घंटे काम की मांग का सबसे भारी प्रदर्शन 1 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो में हुआ जिसमें 90,000 श्रमिकों ने भाग लिया। आंदोलन लगातार जारी रहा। 3 मई तक जारी आंदोलन में 65,000 मजदूरों ने भाग लिया। इसी बीच अमेरिका के शिकागो शहर में हे मार्केट की घटना हुई, जिसके फलस्वरूप कई लोग पुलिस की गोली में मारे गए और सैकड़ों मजदूर घायल हुए। इसी के फलस्वरूप इस आंदोलन के नेता स्पाइस, फील्डेन, स्विस, फिशर, एंजेल, लुईस और आस्कर पिरान्हा पर मुकदमें चले और मजदूर वर्ग के चोटी के पांच नेताओं को फांसी पर चढ़ा दिया गया।
1 मई 1890 से मई दिवस ने अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस का रूप ले लिया। 1891 में रूस में मई दिवस मनाया गया। 1920 में चीन में मजदूर दिवस मनाया गया। भारत में पहला मजदूर दिवस 1923 में हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी द्वारा चेन्नई में मनाया गया। एक कम्युनिस्ट नेता मलयपुरम सिंगारवैलू चेट्टियार ने 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किए जाने की वकालत की। 1927 के को भारत के कलकत्ता, मद्रास और मुंबई में मजदूर दिवस मनाया गया। यह मजदूर दिवस 1 मई को हर साल मनाया जाता है और पूरी दुनिया के पैमाने पर अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। अब इसमें आठ घंटे काम की मांग के साथ और दूसरे अधिकारों को पाने के लिए जैसे न्यूनतम वेतन, नियुक्ति पत्र, स्थाई नौकरी, पेंशन, ग्रेच्युटी, ओवरटाइम, स्टैंडिंग ऑर्डर्स, हाजिरी रजिस्टर, भविष्य निधि देने आदि की मांगे जुड़ गईं। इन सुविधाओं को पाने के लिए मजदूर वर्ग के सैकड़ों हजारों मजदूरों ने अपनी जान की कुर्बानी दी है और अपनी नौकरियों को स्वाहा किया है ताकि उनके आने वाली पीढ़ियां मई दिवस के आदर्शों को जारी रख सकें।
आठ घंटे काम के दिन का सपना 1917 में रूसी क्रांति के बाद साकार हुआ जब लेनिन के नेतृत्व में रूस में किसानों मजदूरों की सरकार बनी। इस सरकार ने मजदूरों की मांग 8 घंटे का काम, 8 घंटे का आराम और 8 घंटे का मनोरंजन, नाम की मांग को स्वीकार किया और मजदूरों को सैकड़ों साल से चले आ रहे शोषण, जुल्म, अन्याय और भेदभाव से मुक्त किया और रूस के मजदूरों को नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची, 8 घंटे का काम, न्यूनतम वेतन, बुढ़ापा पेंशन और वेतन की बराबरी जिसमें पुरुषों और महिलाओं को बराबर वेतन दिया जाता था, की मांग स्वीकार की और मजदूरों के 8 घंटे काम की मांग को सबसे पहले जमीन पर उतार दिया। इसके बाद तो पूरी दुनिया में मजदूरों के 8 घंटे का काम लागू ही हो गया।
भारत में आजादी मिलने के बाद इन तमाम कानूनों को, मई दिवस की इन तमाम मांगों को अमलीजामा पहनाया गया और इन सारी मांगों को कंसीडर करते हुए, बहुत सारे श्रम कानून मजदूरों की हिफाजत के लिए बनाए गए और इन्हें लागू किया गया। भारत में मई दिवस के सपनों की यह सबसे बड़ी जीत थी। इन कानूनों के लागू होने के बाद मजदूरों के सैकड़ों साल के शोषण, अन्याय और भेदभाव को खत्म कर दिया गया।
और अब कमाल देखिये कि असंख्य मजदूरों ने लडकर, बलिदान कर, फांसियों के तख्ते पर चढकर, जो हक, अधिकार जालिम पूंजिपतियों से लडकर लिये थे, जैसे आठ घंटे का कार्य दिवस, नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची ,कैटेगरी स्लिप, ओवर टाइम, बोनस, ग्रेचुईटी, पेंशन ,प्रोमोशन आदि आदि, गजब की बात यह है कि वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण, निजी करण और वैश्वीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद ये बुनियादी अधिकार, देश और दुनिया के पूंजीपति, नौकरशाहों ने पिछले 32 वर्षों में लगभग छीन लिए हैं और अधिकांश मजदूरों को आधुनिक गुलाम बना दिया है। अब कार्य के घंटों को बढातर 12 घंटे कर दिया गया है, बोनस खत्म कर दिया गया है, स्थायी प्रकृति के काम को ठेके पर दे दिया गया है, जिससे अधिकांश मजदूर लगभग आधुनिक गुलाम बन गये हैं, उनकी संघर्ष करने की और सामूहिक सौदेबाजी की ताकत छीन ली गई है। यूनियन बनाने का अधिकार लगभग छीन लिया गया है या यूनियन बनाने को लगभग असंभव बना दिया गया है ताकी शोषण करने वाले और अन्याय करने वाले मालिकान की मजदूर विरोधी मनमानी जारी रखी जा सके।
आज के पूंजिवादी निजाम ने मजदूरों को जाति और धरम में बांटकर और मजदूर विरोधी कानून लाकर, उनकी एकता को खंडित कर दिया है, आपसी फूट के कारण वे अब लडने की स्थिति में नही रह गये हैं। मजदूरों को आधुनिक गुलाम बनाने में अधिकांश सरकारें कांग्रेस, बीजेपी, बसपा, सपा और दूसरी सभी क्षेत्रिय पार्टियां जिम्मेदार रही हैं। बीजेपी की वर्तमान सरकार ने तो सारी सीमाएं पार कर दी हैं। अब उसने मजदूरों को आधुनिक गुलाम बनाने के लिए और पूंजीपतियों के मुनाफे में अनाप-शनाप वृद्धि बनाए रखने के लिए चार श्रम संगीताएं बनाई हैं जो मजदूरों को आधुनिक गुलाम बनाने के कानून हैं। अब तो सिर्फ वाम्पंथी और समाजवादी पार्टियों और ट्रेडयूनियनिस्टों को छोडकर कोई भी मजदूरों की बात नही कर रहा है.
इन सब हालातों ने मजदूरों को फिर एकजुट होकर लडने को बाध्य कर दिया है। मजदूर फिर से एकजुट हो रहें हैं, इन सरकारों की मजदूर विरोधी नीतियों का मुकाबला मजदूर एकता के बल पर ही किया जा सकता है, अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस का यही संदेश है कि मिलकर और एकजुट होकर लडो और देश और दुनिया के स्तर पर किसानों और मेहनतकशों को साथ लेकर लडो, इन मजदूर विरोधी निजामों को नेशनाबूद कर डालो। शोषण, अन्याय, भेदभाव और गैरबराबरी के निजाम का खात्मा कर डालो और मजदूरों और किसानों की अपनी सत्ता और सरकार कायम करो, 99 फीसदी पर 1 फीसदी पूंजीवादी निजाम को उखाड फैंकों, मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों की यह सरकार ही जनता का कल्याण कर सकती हैं, इसके अलावा और कोई रास्ता नही बचा है.
पूंजिवादी व्यवस्था अपनी मुनाफ्खोरी में व्यस्त है, वह दुनिया भर के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने की फिराक में है, वह पूरी दुनिया को युध्दों में झोंक देना चाहती है। उसके पास दुनिया भर के 99 फासदी लोगों किसानों मजदूरों और मेहनतकशों की समस्याओं का कोई निदान और समाधान नही हैं., वह हमारी समस्याओं,,,, रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का समाधान नही कर सकती है। अतः अब मानव इतिहास के तीन सौ साल की दास्तान कह रही है कि पूंजीवाद अपने ही अंतर्विरोधों से घिरा हुआ है, उसे सिर्फ अपने मुनाफे बढ़ाने से ही मकसद है वह पूरी दुनिया में अपने शोषण और मुनाफाखोरी का शिकंजा कसता जा रहा है। वह जनता की समस्याओं का कोई हल पेश नही कर सकता है।
अतः हम मेहनतकशों के पास इस पूरी दुनिया के मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों के पास भी लडने के अलावा और अपनी सरकार बनाने के अलावा और कोई विकल्प नही बचा है। अपनी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आजादी को बचाने और शोषण, जुल्म, अन्याय और भेदभाव के साम्राज्य को खत्म करने के लिए देश और दुनिया के अंतरराष्ट्रीय मजदूर वर्ग को एकजुट होना पड़ेगा, तभी मई दिवस के सपनों और आदर्शों को जिंदा रखा जा सकता है और उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। यहीं पर हम एक और महत्वपूर्ण बात कहना चाहते हैं कि हम पिछले दिनों से देख रहे हैं कि मजदूरों को लेकर हमारी जनता में कुछ भ्रांतियां बढ़ीं हैं। आज मजदूर वर्ग और उसकी राजनीति करने वाले नेताओं और ट्रेड यूनियनों का यह सबसे बुनियादी काम है कि वह मजदूर वर्ग को लेकर जनता में फैली इन भ्रांतियों का तत्काल निराकरण करें और समाज में किसानों मजदूरों और मेहनतकशों का एकजुट आंदोलन विकसित करें।
पूंजीपति और शोषक वर्ग ने हमेशा से ही तमाम मजदूरों का शोषण किया है, उनके साथ ज़ुल्म और ज्यादतियां की हैं, उनके साथ कभी भी मानवीय व्यवहार नहीं किया है। मजदूर वर्ग में अपने सारे हक और अधिकार, पूंजीपतियों से लड़कर ही लिए हैं। इस दुनिया को सजाने संवारने वाले अरबों किसानों, मजदूरों और मेहनतकशों के समर्थन मे, हम अपनी बात को इन पंक्तियों के साथ खत्म करेंगे,,,,,
तुम बीती हुई कहानी हो, अब अगला जमाना अपना है,
तुम एक भयानक सपना थे, ये भोर सुहाना अपना है।
जो कुछ भी दिखाई देता है, जो कुछ भी सुनाई देता है,
उसमें से तुम्हारा कुछ भी नही, ये सारा फसाना अपना है।