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*सनातन दर्शन में शरीर और आत्मा का अंतर्संबंध

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 डॉ. विकास मानव

     पुराणों अन्य आख्यानों तथा स्मृतिग्रन्थों में सन्ततिनिमित्त किया जाने वाला समागम एक संस्कार माना जाता है। सोलह संस्कारों में प्रथम संस्कार गर्भाधान कहा जाता है इसलिए इसकी व्यवस्थाएँ दी गई हैं। धार्मिक दृष्टि से स्त्रीसम्पर्क एक अत्यन्त पवित्र व सारगर्भित व्यवहार है.

      अतः इसके लिए कई तरह की मर्यादाएँ कही गई हैं, जैसे पर्वकाल, धार्मिक उत्सव, प्रतिकूल तिथियाँ, श्राद्धादि दिवस वर्जित हैं धर्म के निर्देश मूलतः स्त्रीसम्पर्क को एक पुण्य प्रयोजन के रूप में मानकर दिये गये हैं और उनका फल सन्तानप्राप्ति ही कहा गया है। वैयक्तिक आनन्दप्राप्ति के लिए सम्भोग उन दिशा-निर्देशों में कहीं दिखता ही नहीं।

      आपाततः यह अनुशासन हमें पशु-व्यवहार दिखता है, जैसे कोई पशु हीट में अपने पर अनिवार्यतः अनियन्त्रित हो जाता है और समागम के बाद शान्त हो जाता है।

     उसका प्रत्येक समागम गर्भाधान के साथ सम्पन्न होता है और विशेषता यह कि वह प्रत्येक मादा के गर्भिणी होने की बात समझ जाता है तथा गर्भवती के साथ समागम नहीं करता ।

मनुष्य पर भी ऐसा ही अनुशासन आरोपित किया गया है किन्तु उसका समागम किसी युग में गर्भाधान पर पर्यवसित होता होगा, आज वह स्थिति नहीं बनती कि प्रत्येक ऋतुकाल के पश्चात् किया गया संभोग गर्भवती कर ही देगा स्यात् प्रकृति स्वयं मनुष्य को सहवास का सुख देने में उदार हो गई है इसलिए उसके सहवास को सन्तानप्राप्ति से नहीं जोड़ा गया है।

       यदि पशु की तरह कर देती तो ऋतुकाल के पश्चात् गर्भाधान हो जाता और व्यक्ति उस सुख से वंचित हो जाता। प्रकृति की उदारता और विषयों की सहज मनोरमता कि व्यक्ति उन अनुशासनों को मानता ही नहीं और देहसामर्थ्य तक इस सुख को प्राप्त करता रहता है।

       स्वास्थ्य की दृष्टि से संयम का महत्त्व निर्विवाद है, ये विधि-निषेध व्यक्ति को संयमित करने के ही उपाय हैं, किन्तु आज का चिकित्साशास्त्र यह मानता है कि हमारा देह जितनी क्षमता रखता है उतना स्त्री-सहवास करने में कोई आपत्ति नहीं। दूसरी बात यह भी है कि यौवन और अच्छा भोजन व्यक्ति की शक्ति में हास नहीं होने देते।

    स्त्री के देह का मार्दव, सौन्दर्य और उसके स्पर्श एवं मृदु संघर्ष से व्यक्ति खोता ही नहीं पाता भी है। उसके मन में हो रहा उल्लास देह में अतिरिक्त प्रहर्षण उत्पन्न करता है और इससे वह जितना स्थूल स्तर पर खोता है उससे अधिक वृत्ति और प्रसन्नता प्राप्त करता है।

      आयुर्वेद के अनुसार सुन्दर स्त्री प्राकृतिक वाजीकरण है, वह व्यक्ति को सहज तृप्ति देती है किसी भी व्यवहार की अति तो हानिकारक होती ही है। एक वाक्य है नित्यं बाला – सेव्यमाना नित्यं वर्धयते बलम्’ अर्थात् कम उम्र की स्त्री से समागम करने से व्यक्ति का बल क्षीण नहीं होता।

       आयुर्वेद में एक वैद्य हुए हैं लोलिम्बराज, वे रोगचिकित्सा ही स्त्री से करते थे। उनके अनुसार रूप, वय, दैहिक विशेषता, स्थान आदि आयाम व्यक्ति के मानस पर प्रभाव डालते हैं और उस प्रभाव से उसको परम तृप्ति मिलती है, इस तृप्ति से वह अपने को स्वस्थ रख सकता है।

     आयुर्वेद के अनुसार, हमारे खाये हुए भोजन का अन्तिम परिणाम वीर्य होता है और इसका निर्माण बहुत सीमित होता है। आयुर्वेद के दृष्टिकोण से, सम्भोग और तदाधारित वीर्यरक्षण बहुत महत्त्वपूर्ण होता है तथा वह महीने में एक दो बार होना चाहिए। पर यह हमारे देश की विशेषता है कि इसमें जिस चीज की आवश्यकता होती है, उसका निर्माण अधिक होने लगता है।

       इसीलिए आज व्यक्ति की उच्छृङ्खलता निभ रही है अन्यथा ‘मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्’- अर्थात् शुक्र के पतन से मृत्यु और धारण से जीवन सम्भव होता है-के अनुसार व्यक्ति सम्भोगानन्द को पाहुन की तरह सहेजता रहता है। वस्तुतः मनुष्य पर प्रकृति विशेष रूप से कृपालु है इसलिए उसके लिए स्वतन्त्रता का प्रावधान उदारतापूर्वक किया है।

 हमारे शारीरिक सम्पर्क के पूर्व, पश्चात् एवं प्रवर्तनकाल में हमारे मन में कितना उद्रेक, कितनी आतुरता और कितना सुकोमल संघर्ष होता है – यह अनुभव करने की बात है।

      गर्भाधान के लिए हमारे संहिताशास्त्रों में जो कुछ निर्दिष्ट है वह प्रकृति के संवेदनशील पक्ष का विश्लेषण है। हमारे परिवार में जिस व्यक्ति का आवाहन हम कर रहे हैं उसे पूरे स्नेह- सम्मान के साथ सुवेला और स्वस्थ मनोदशा में आमन्त्रित करें तो वह आमन्त्रण और हमारे लिए अज्ञात व्यक्ति का आगमन सुखकर रहेगा-यह हमारा परम्परागत विश्वास रहा है।

      किसी व्यक्ति के जन्म का विवरण देते हुए हमारे आचार्य इसे एक जीव वैज्ञानिक घटना नहीं मानते, प्रत्युत एक सुनिश्चित कार्यक्रम मानते हैं। कर्मवाद के अनुसार मनुष्यदेह को कर्मस्थली माना गया है, इससे इतर देह भोगप्रधान हैं, न उनमें कर्म करने की क्षमता है न उस स्तर पर बुद्धि विकसित ही होती है, अतः नवीन कर्म करने के लिए प्रत्येक जीव को मनुष्यदेह में आना पड़ता है। उसके आने का एक मार्ग है, एक स्थान है और एक नियत कुल है।

कहते हैं- हम रोज भोजन करते हैं, स्त्री-सम्पर्क करते हैं और अगणनीय स्पर्म्स विसर्जित करते हैं फिर उनसे गर्भाधान क्यों नहीं होता? इस प्रश्न के उत्तर में हमारा कर्म विपाक सिद्धान्त कहता है कि जीवात्मा पर्जन्य नामक मेघ में उतरता है और वाष्पमय स्वरूप से होता हुआ अन्नकण में आता है।

      यही अन्न व्यक्ति के देह में जाकर शुक्राणु का रूप धारण करता है और निर्धारित स्त्री के गर्भ में जाकर व्यक्ति के रूप में विकसित होता है। प्रथम दृष्टि में इतनी विस्तृत यात्रा और यात्रा की जटिलता हमारे लिए अविश्वसनीय लगती है किन्तु जो प्रकृति इतने विस्तार को व्यवस्थित करती है उसके लिए यह कोई कठिन कार्य नहीं है।

       पुराण तथा अन्य आप्तवाक्यों के अनुसार व्यक्ति कर्म को भोग द्वारा शेष करता हुआ जब मानवदेह में अवतरित होने को उद्यत होता है तो उसे कृष्ण या शुक्ल मार्ग से यात्रा करनी होती है। जो व्यक्ति पापकर्मा होते हैं और अधोलोक से आते हैं वे कृष्णमार्ग से आते हैं तथा पुण्यकर्मा जन स्वर्गसुखों को उपभोग करके शुक्ल मार्ग से आते हैं।

      कृष्ण और शुक्ल का अर्थ प्रकाश व अन्धकार से है। इन मार्गों से आने वाले जीवात्मा नियत कुल परम्परा में गर्भ ग्रहण करते हैं। विज्ञान की आनुवंशिकता अथवा परम्परा नामक सूत्र इसमें बहुत अधिक प्रभाव नहीं डालते। आनुवंशिकता एक सामान्य स्तर है, वह ध्रुव नहीं। व्यक्ति का अपना संस्कार उसके मार्ग का निर्धारण करता है।

       यदि ऐसा नहीं होता तो हिरण्यकश्यप जैसे राक्षस के यहाँ प्रद्वाद जैसा धार्मिक पुत्र और पुलस्त्य के वंश में रावण सरीखा दुर्मद दानव कैसे उत्पन्न होता।

ज्योतिष में चन्द्रकुण्डली व्यक्ति के बीजवपन की कुण्डली मानी जाती है। यवनों तथा तदनुसारी अन्य भारतीय आचार्यों ने फलित के लिए चन्द्रमा की स्थिति को लग्न के समान जो महत्त्व दिया है उसका भी यही कारण दिखता है कि चन्द्र व्यक्ति के गर्भ में आने की स्थिति का सूचक होता है इसलिए उसे भी फलित के लिए ग्राह्य माना जाय।

        वस्तुतः व्यक्ति के जन्म के दो मुख्य आधार रहते हैं-एक, उसका आना, दूसरा उसका श्वास लेना। गर्भ में जब आता है तो वह जीव चेतन से युक्त होता है अतः उसे सजीव कहा जाता है और गर्भ से मुक्त होकर श्वास लेता है तब उसमें प्राण का संचार होता है उस स्थिति में वह सप्राण कहलाता है। प्राण स्थूल लक्षण होता है इसलिए यह व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है, उसकी चेतना का विस्तार प्राण का आधार ग्रहण कर लेता है।

      इस देहयात्रा में अनेक कर्म अपने विपाक के रूप में उपस्थित होते हैं, ये हमारे जीवन के अनिवार्य मोड़ होते हैं फिर भी यदि हम चाहें तो इनमें परिवर्तन कर सकते हैं।

 यह परिवर्तन उस फल को स्थगित कर देने में भी हो सकता है और दुष्कृत के समानान्तर सुकृत संचय का भी हो सकता है। मैं नहीं, जिस युगमनीषी भगवान् वेदव्यास ने कर्म के विस्तार और रहस्य की मीमांसा की है, वे स्वयं कर्मबल को स्वीकार करते हैं और ऐसे स्तुति प्रसंग व अनुष्ठान बतलाते हैं जिनके बल पर व्यक्ति अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकता है, किन्तु इसमें ध्यान यही रखने का होता है कि जितना सघन अन्धकार होता है उतना ही तीव्र प्रकाश करना पड़ता है। दुर्नियति पर विजय प्राप्त करने के लिए उतना ही महाप्राण प्रयत्न करना होगा।

      उपनिषदों एवं अन्य आख्याओं के अनुसार व्यक्ति के देह धारण करने की एक परम्परा व व्यवस्था होती है, उस व्यवस्था का अनुसरण करते हुए परमात्मा का अंशभूत जीव अस्थायी देह में अवतरित होता है। हम जिन उपकरणों को मुख्य रूप में मानते जानते हैं वे उस आत्मतत्त्व के करण (साधन) कहलाते हैं अर्थात् स्थूलकरण अर्थात् पंचभौतिक देह और अन्तःकरण अर्थात् मनोमय जगत्।

       स्थूल देह धारण करने से पहले जो तत्त्व होता है वह प्राज्ञ कहलाता है। प्राज्ञ आत्मा परमात्मा का अंश होता है तथा उसमें वे ही गुण और विशेषताएँ रहती हैं जो परमात्मा में होती हैं तथापि वह प्राज्ञ कहलाता है और कर्मबद्ध होकर यात्रा करता है।

आत्मा शब्द का अर्थ होता है निरन्तर यात्रा करने वाला। परमात्मा शब्द के व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ से यह प्रतीत व प्रतिपादित होता है कि परमात्मा के रूप में कहे जाने वाले तत् में गति की परमावस्था है फिर उसे स्थाणु और गुणकर्मातीत कैसे माना जाता है, यह प्रश्न वस्तुतः स्थूलदर्शन का है, यथार्थ दर्शन में परमात्मा का अर्थ होता है परम गतिमान् अर्थात् जिसमें अथवा जिससे सतत यात्रा की अन्तिम सत्ता है।

      संसार की समस्त गतिशीलता जिसमें है वह गति से अतीत होगा ही जैसे समुद्र में आवर्त है, उत्ताल तरंगें हैं, आलोड़न है-ये सब समुद्र के उपलक्षण हैं, समुद्र के करण हैं, समुद्र नहीं हैं, ऐसी स्थिति में परमात्मा को यात्रा का अधिष्ठाता कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए और उसके यथार्थरूप में भी कोई अव्याप्ति या अतिव्याप्ति नहीं होनी चाहिए।

      व्यक्ति के रूप में जीवात्मा को अभिव्यक्त होने से पहले किन-किन स्थितियों को पार करना होता है उसकी सहायता व उपादानाश्रित स्थितियाँ क्या होती हैं?—यह समझ लेना चाहिए।

       आत्मा का लक्षण बताते हुए शास्त्र कहते हैं-वह सत्, चित् आनन्द स्वरूप होता है। यद्यपि ये स्थितियाँ बुद्धिगम्य होने के कारण ज्ञान का विषय बनी रहती हैं जिनको हम आभासिक रूप में हो जान पाते हैं। उदाहरण के लिए, हम चेतना के नाम पर अपने जीवित होने को उसका स्वरूप मान लेते हैं, यह एक दृष्टि से वास्तविक तो है पर सम्पूर्ण नहीं है जैसे बल्ब के जलने से हम बिजली को समझ तो लेते हैं किन्तु वह अपने मूलरूप में कितनी विलक्षण और शक्ति-सम्पन्न है-इसका ज्ञान उसे समझने की क्षमता और स्थिति पर निर्भर करता है।

         यथार्थ यह है कि परमेश्वर की यह विकासशील अवस्था ज्ञानातीत है इसलिए शब्द की सामर्थ्य से परे है। ज्ञान एक उपकरण है और सत्, चित् आनन्द उसके मूल रूप हैं। ये उपकरण उस मूल की व्याख्या कर सकते हैं, तद्रूप नहीं हो सकते। तन्त्रशास्त्र की दृष्टि से परम शिव का निष्कल स्वरूप इससे परतर अवस्था है।

आगे अन्तःकरण में परिगणित होने वाले मन, बुद्धि एवं चेतना परमेश्वर के इस मूलस्वरूप में नहीं रहते किन्तु इनमें जन्य-जनक सम्बन्ध रहता है। इसलिए बीज रूप में इनकी सत्ता युगपद्भाव से सिद्ध हो जाती है।

       परमेश्वर के इन स्वरूप लक्षणों में आनन्द एक स्थिर अङ्ग है, सत् उसकी व्यापकता है और चित् उसकी एकरूपता अथवा परस्पर सम्बद्धता जैसे एक फूल है-उसके मर्मरूप में व्याप्त किंवा पराग के रूप में व्यक्त अङ्ग आनन्द है, पुष्प का विस्तार सत् है और इन सार पुष्पों में अन्तःस्यूत संवेदनशीलता संप्रेषणीयता चित्र है।

      मूल त्रिकोण का चित्कोण आगे के करण में मन और बुद्धि के द्वित्व को सक्रिय उपकरण के रूप में स्थापित करता है। वास्तविकता यह है कि परमेश्वर की क्रियामयी अवस्था चित् के माध्यम से ही विस्तारित होती है इसलिए चित् शक्ति का ही व्यवहार होता है आनन्दशक्ति या सत्-शक्ति का व्यवहार नहीं होता।

       मन, बुद्धि, चेतना के रूप में अवस्थित अन्तःकरण उस जीवात्मा का उपादान है। यहीं उसकी निष्क्रियता क्रियामय होती है, इच्छा, ज्ञान और किया की निवृत्ति इसी बिन्दु पर होती है। इस त्रिपुटी और उस त्रयी में कोई पूर्वापर सम्बन्ध नहीं है, ये इतने स्वाभाविक और समवर्ती रूप में विस्तारित होते हैं कि इनमें कोई अन्तर अथवा भेद करना संभव नहीं हो पाता। सच तो यह है कि उस अतीत अथवा कलातीत के बृंहणशील होने पर बहुत सारा एक साथ घट जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह जीव व्यक्ति के शुक्र कीट में समाहित होता है और स्त्री के डिम्ब से एकाकार होकर अपना रूप निर्धारित करता है। जहाँ यह जीव स्त्रीत्वप्रधान होता है वहाँ पुरुष का शुक्राणु गौण हो जाता है और जहाँ पुरुषप्राधान्य होता है वहाँ डिम्ब सहायक बन जाता है।

       संभव है, इसी अभेध एकत्व के कारण शिव को अर्धनारीश्वर कहा जाता है। प्राज्ञ आत्मा के देहगत होने से पहले वाला मार्ग सन्तरण उपनिषद् व पुराणों में प्रायः एक-सा ही है किन्तु उसके गर्भगत होने के सम्बन्ध में मतभेद है।

       उपनिषद् कहता है शुक्रशोणित से बने पललपिण्ड में प्राज्ञ आत्मा अवतरित होता है अर्थात् शुक्राणु और डिम्ब के परिपक्व होने पर उसमें आत्मा आता है-इस सिद्धान्त में एक प्रश्न उठता है कि जब वे शुक्र व डिम्ब कीट चेतन हैं, निरन्तर वर्धमान हैं तो आत्मा उसमें विद्यमान है फिर प्राज्ञ आत्मा कब, कैसे और क्यों आते हैं? उस पिण्ड में विद्यमान चेतनता कहाँ चली जाती है?

       सम्भव है इस तकनीकी व जटिल पहेली का समाधान करने के लिए ही प्राप्त आत्मा का मार्ग पर्जन्यमेध की बूँद से प्रारम्भ किया गया है। वैसे भ्रूण के परिपक्व होने पर उसमें प्राज्ञ आत्मा का आगमन भी सम्भव हो सकता है क्योंकि गर्भ के चेतन व वर्धमान होने में आत्मा की सत्ता रहती है पर जैसे ही प्राज्ञ आत्मा का अवतरण होता है, वैसे ही वह स्थापित हो जाता है और उस पिण्ड में अवस्थित चेतना उसमें समा जाती है। प्राज्ञ आत्मा के आने के साथ ही हृदय में स्पन्दन किया प्रारम्भ हो जाती है।

       इस समाधान में प्रश्नों की परम्परा शेष नहीं होती इसलिए प्राज्ञ आत्मा का वाष्प मार्ग होकर अन्नकण से शुक्राणु के रूप में पर्यवसित हो जाना अधिक उपयुक्त रहता है। प्रज्ञात्मा चूँकि लोकान्तर संचारी है इसलिए उसे यात्रावृत्ति होने के कारण आत्मा कहा जाता है। जैसे ही वह देहगत होता है, शनैः शनैः उसके करण और उपकरण विकसित होने लगते हैं।

गर्भ से बाहर आते ही प्राण उसका सहचर बनकर उपस्थित हो जाता है। प्राण के ही आधार पर वह बाह्य जगत् से सम्बद्ध होता है, मन का विस्तार होता है।

      देह में रहते हुए उसके प्रतिफलन की तरह एक अन्यस्वरूप अभिव्यक्त होता है जो हंस आत्मा कहलाता है। यह यथार्थ में आत्मोपकरणों के अनुशय से उत्पन्न होता है और अपने व्यापार से अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखते हुए आत्माश्रयी ही नहीं उसके प्रतिविम्ब की तरह काम करता है। अनुशय का अर्थ यह समझा जाय कि जिस तरह सारे ग्रहों के प्रकाशवृत्त से राहु केतु के रूप में छाया ग्रह बन जाते हैं वैसे ही यह हंस आत्मा भी बन जाता है।

     वायु, तेजस्, और चेतना के संयोग से देहस्थ भूतों के अनुशय से इस हंस आत्मा की स्थिति होती है। हमारे श्वास-प्रश्वास में सहज रूप से बोलनेवाला अजपाजप इसी हंस आत्मा की सत्ता को सिद्ध करता है।

       हंस आत्मा का परिचय प्राप्त होने पर प्राज्ञ आत्मा का ज्ञान करना कठिन नहीं रह जाता। जो लोग स्वप्न में अथवा ध्यान क्रिया के द्वारा दूरस्थ स्थान व स्थितियों को देखते हैं वह इस हंसात्मा का ही विषय है। इसके शुद्ध स्वरूप में प्रकाशित होने पर देश और काल की सीमा और भेद नहीं रहता।

       योग और वेदान्त, इसी आत्मतत्त्व की विस्तार प्रक्रिया में उसके कर्म (व्यापार)- गत एवं सम्पर्कगत विभेदों के आधार पर अनेक नाम रूप बतलाते हैं।

यहाँ उनकी एक झलक केवल परिचय के लिए प्रस्तुत की जा रही है :

       आत्मा तीन प्रकार के होते हैं-सहज, मानुष और देव इनमें सहज तीन प्रकार का होता है-चित्, सूत्र और विज्ञानास्वरूप प्राज्ञ मानुष आत्मा महान् और भूत के भेद से दो प्रकार का होता है भूतात्मा तीन प्रकार का होता है वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ ये तीनों भूतात्मा ही हैं पृथक्-पृथक् रूप में भी और सम्मिलित रूप में भी।

     ये तीनों भूतात्मा महान् आत्मा के साथ संयुक्त रूप में रहते हैं आत्मा के स्वरूप में यह आत्मपंचक देह में प्रकट होता है। इन पाँच- प्राज्ञ, महानू, चित्, सूत्र और क्षेत्रज्ञ रूप में ज्ञान आत्मपंचक देहगत होकर इसे जीवित और मृत बनाता है।

       इस सहजात्म के अतिरिक्त दो कृत्रिम अथवा साधित आत्मा और होते हैं जिनको याज्ञिक व हंस कहते हैं। कृत्रिम कहने का आशय यही है कि ये परापेक्ष है एक प्रकार से अर्जित हैं,इनका स्वतन्त्र अस्तित्त्व नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति साधना करके अपने को प्रधानमन्त्री अथवा राष्ट्रपति के रूप में स्थापित कर लेता है।

      उच्चसत्ता अथवा सत्ता का केन्द्र बनने पर उसी व्यक्ति का रूपान्तरण हो जाता है, ऐसी ही स्थिति इस कृत्रिम आत्मा की रहती है। जैसा हम जानते हैं कि ज्ञानवर्धक विविध विधान सहित किया गया यह एक वस्तुनिष्ठ स्वरूप प्रकट करता है। भारतीय परम्परा एवं वेदवाद में वेदों की प्रतिष्ठा इसीलिए है कि इससे साध्यनिष्ठ एक अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होता है। याज्ञिक आत्मा को सुपर्ण भी कहा जाता है।

यह यज्ञात्मा मानुष आत्मा से उत्पन्न होता है और उसी को प्रभावित करता है। शास्त्र में इसके लिए कहा गया है कि जिस प्रकार अश्वारूढ़ व्यक्ति अपनी इच्छानुसार अश्व की गति एवं दिशा को नियन्त्रित रखता हुआ उसे चलने के लिए प्रेरित करता है उसी प्रकार यह यज्ञ-आत्मा, व्यक्ति को अपने अधीन कर लेता है, दोनों की एकवृतिता में ही यज्ञ आत्मा का कौशल व सामर्थ्य प्रकट होता है।

       दूसरा आत्मा हंस आत्मा कहलाता है। इसे ही गन्धर्व आत्मा भी कहते हैं। यह भी मानुष आत्मा से उत्पन्न होता है और उसी पर आरूढ़ रहता है पर इसमें यज्ञवाला तेजस् तत्त्व नहीं होता, इसमें वायुतत्त्व प्रमुख रहता है। इसके सहजरूप से निनादित होते रहने से इसे हंस कहते हैं तथा यतिप्रधान और वायु से उत्पन्न होने के कारण गन्धर्व कहा जाता है।

       व्यवहार में हम गानविद्या में निपुण को गन्धर्व कहते हैं। सूक्ष्मरूप में हमारे देह में अवस्थित एवं मानुष आत्मा द्वारा वायुरस से उत्पादित हंस आत्मा का निनाद ही अजपाजप का उपादान-आधार बनता है। यहाँ जिसे हम उत्पादित अथवा अर्जित के नाम से कह रहे हैं वह क्रिया की संयोग सिद्ध परिणति है और प्रकृति में स्वतः सन्निहित है।

       हंस आत्मा सोमतत्त्व का प्रतिनिधि है। यह चन्द्रकिरण जैसे उज्जवल एवं सूक्ष्म सूत्र से प्राज्ञ आत्मा से जुड़ा रहकर बाहर संचरण करता है, स्वप्नकाल में और ध्यानसाधना करने पर दूरस्थ दृश्यों को देखने का काम यही किया करता है। ऐसा अनेक बार होता है कि हम स्वप्न में अथवा किसी अन्य साधना द्वारा दूरस्थ प्रदेशों का यथार्थ दर्शन कर लेते हैं। अथवा कई बार कोई जीवित व्यक्ति हमें स्पष्ट दिखाई दे जाता है, हमारी कठिनता, विपत्ति अथवा अन्य परिस्थितियों में वह देह धारण कर आ जाता है और हमें संकट से उबारने का उपाय रच जाता है-ये सब हंस आत्मा के हो व्यवहार है।

     इसमें कोई सन्देह नहीं कि आत्मा (पञ्चात्मा अथवा प्रज्ञानात्मा) के देह-परित्याग करते ही हमारा यह देह मृत और अपवित्र हो जायेगा। उपरिवर्णित स्थितियों में जो कुछ घटता है वह काल्पनिक नहीं होता न स्वप्नदृष्ट स्थितियाँ असत्य होती हैं, न किसी व्यक्ति का सदेह दिखना, अतः ये सारे क्रियाकलाप आत्मा के जिस स्वरूप द्वारा सम्पन्न होते हैं वह हंस आत्मा कहलाता है। यही हमारे देह की रक्षा करता है।

वेदों में यज्ञे यजेथाः कहकर जिस यज्ञ को जीवन व्यवहार का विषय बताया गया है वह कर्म की महिमा की घोषणा है जिससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्ति अपनी कामनापूर्ति के लिए यज्ञ आत्मा का निर्माण कर सकता है यह आत्मा तेजस् तत्त्व से निर्मित होता है इसलिए कठिन से कठिन कार्य करने की इसमें क्षमता होती है।

      इसे यों भी कह सकते हैं कि यज्ञ द्वारा हम व्यक्ति के तेजस् को उद्दीप्त करके उसे निमित प्रयोजन के लिए प्रयुक्त कर लेते हैं।

      यह था, अत्यन्त संक्षेप में, आत्मा का देह में आगमन का विवेचन। कहने की आवश्यकता नहीं कि आत्मा के नाम से जाना गया तत्त्व कूटस्थ एवं साक्षी रहता है न वह कर्म करता है, न फल से बँधता है फिर भी उसकी यात्रा का निर्धारण कर्म ही करता है।

       माना वह फल नहीं भोगता पर जो कर्म से जुड़ता है और द्वन्द्वात्मक अनुभूति करता है वह उसी का करण होता है। आत्मा की विवशता यह कि वह इन करणों से छिन्न नहीं हो सकता। जहाँ वह उपादान रहित होता है, परमात्मा कहलाता है।

        जीव के रूप में नानाविध देहों की यात्रा करता हुआ यह आत्मतत्त्व कारकभाव से भ्रमण करता रहता है। कर्म की अनन्तरूपता और प्रकृति की व्यवस्था इस संसार को विविध नामरूप देते हुए प्रवृत्त रहती है।

मनुष्य का इस देह-परम्परा में उत्कृष्ट स्तर है, इसे कर्मक्षेत्र कहा जाता है। हमारा बहुत कुछ नियति-नियत रहकर भी स्वतन्त्रता का क्षेत्र बहुत व्यापक बना रहता है।

      कई बार प्रश्न उठता है कि जीवात्मा के प्रथम विसर्ग के बाद कर्म के कारण इतने देह-भेद कैसे हो गये? अर्थात् प्रारम्भ में जब परमात्मा से जीवात्मा छिन्न हुआ अथवा अपने संकल्प बल से वह एक ही अनेक रूपों में व्यक्त हुआ तो यह कर्म का विस्तार क्यों हुआ? क्योंकि उन सब अंशों को तो एक-सा ही रहना चाहिए था।

       यह प्रश्न उसी तरह का है जैसा, पहले अण्डा हुआ कि मुर्गी यथार्थ यह है कि इस विस्तार के लिए उपनिषदों में एक उपमा दी गई है। जैसे कोई व्यक्ति गोफन में एक ढेला रखकर फेंकता है तो उसके टुकड़े होकर कई स्थानों में और कई दिशाओं में फैल जाते हैं।

     इस उदाहरण को और सरल करने के लिए हम कहें कि उस गोफन में एक ही आकार-प्रकार के अनेक कंकड़ डालकर फेंके तो वे विभिन्न दिशाओं और स्थानों में गिरेंगे। इस निर्णय अथवा प्रयोग में कोई अन्यथापत्ति नहीं है क्योंकि वैज्ञानिक जिस बिगबेंग सिद्धान्त की कल्पना करके यह प्रतिपादित करते हैं कि संसार के इन पिण्डों का मूल एक अति महत् पिण्ड रहा था।

       यदि ऐसा ही है और उसमें से इतर पिण्डों का विखण्डन होता रहा तो सबकी गति और पथ एक-सा ही होना चाहिए। किन्तु ऐसा न है, न संभव होता है, कारण कि जैसे ही कोई वस्तु गति के स्तर पर जाती है, उसमें द्वित्व हो जाता है और यह द्वित्व अपने स्वतन्त्र भाव से प्रेरित होकर विविध रूप धारण कर लेता है।

      संसार के इन पिण्डों की गति, दिशा, क्रम इत्यादि अनन्त हैं पर सीमाहीन नहीं हैं। देहगत भेद जिसे योनि कहते हैं-वह अनन्त होकर भी सीमित हैं जिसे मोटे अनुमान के आधार पर चौरासी लाख माना जाता है।

      इस प्रश्न की जटिलता उस समय समाप्त हो जाती है जब हम उसी सृष्टि के आरम्भ काल के परिवेश पर सम्यक् व कारणाश्रयी आधार पर विचार करते हैं।

शास्त्र कहता है ‘कर्मवैचित्र्याद् देहवैचित्र्यम्’ अर्थात् कर्म की विचित्रता के कारण देह की विचित्रता है प्रश्नहीन होने के लिए हमें उस स्तर पर यह देखना होगा कि परमात्मा से छिन्न हुए जीव करणयुक्त होते गये और करण फैलता गया। यह फैलाव ही ब्रह्म भाव है। प्रश्न उठता है कि यह फैलाव कहाँ तक व्याप्त होता है?

      इसके लिए भाषा की दृष्टि से तद्भाव के अर्थ में त्व का प्रयोग करते हैं जैसे मधुरत्व, सुन्दरत्व आदि। त्वं के आगे कोई भावात्मक प्रत्यय नहीं लगता जैसे मधुरत्वत्व…। इससे यह सिद्ध होता है कि तत्-ब्रह्म विस्तारित होकर तत्त्व तक जाता है उससे आगे नहीं, इसीलिए यह सृष्टि तत्त्वगत स्तर तक ही फैलती है, इनमें भी पृथिवी तत्त्व, तत्त्व परम्परा में अन्तिम रहता है।

     पृथिवी तत्त्व को ब्रह्मनिवृत्ति इसी कारण से कहा जाता है। अर्थात् विस्तार की, तत् रूप ब्रह्म की, निवृत्ति पृथिवी तत्त्व तक होती है इसके बाद विकास की कोई स्थिति बनती ही नहीं।

      अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि परम से उसके ही संकल्प के कारण छिन्न हुआ अंशभूत यह जीव कर्मकारक करणों से युक्त हो जाता है। ये करण, हैं तो उसी के विस्तार किन्तु ये स्वयं उनमें क्रियाशील नहीं रहते हैं, इनके कलेवर बढ़ते जाते हैं और उनमें यह अपनी चेतन सत्ता के कारण भासित होता रहता है ये उपकरण अपने आप में इतने समर्थ होते हैं कि सारे क्रियाभार को वहन करते रहते हैं।

      इस बिन्दु तक देहों का अस्तित्त्व प्रकट नहीं होता किन्तु परम से छिन्न हुआ जीव परिस्थिति व गति से युक्त व प्रभावित होकर कुछ करने लगता है। उसका यह “करना” प्रकृति’ की वृत्ति है, यही कर्म है और यहीं से कर्मभेद प्रकट होता है। कर्म से विविध आकृतियाँ शैली व योग्यता उत्पन्न होती है देह को कर्म का विपाक कहा जाता है जिसका अर्थ होता है कि पहले कर्म होता है फिर देह।

       ऐसी स्थिति में इतने देहों की विचित्रता और अनन्तरूपता एक स्वाभाविक प्रक्रिया हो जाती है।

भारतीय दर्शन के अनुसार और विज्ञान के विकासवाद के अनुसार भी सारे देहों का अस्तित्त्व एक साथ प्रकट नहीं हुआ, इसका भी क्रम रहा है। यह दूसरी बात है कि इतने व्यापक स्तर पर यह सब हुआ इसलिए बहुत कुछ एक साथ होता रहा।

      अवान्तर प्रश्न यह भी उठता है कि परमात्मा से छिन्न होने का यह क्रम समाप्त हो गया अथवा अब भी चालू है। जैसे संसार में प्रारम्भ में जितने जीवात्मा थे क्या अब भी उतने ही हैं या घट-बढ़ रहे हैं? इसके विषय में यही कहा जा सकता है कि अब उसमें से क्षरण नहीं हो रहा है जिसे हम विधाता अथवा सृष्टि का रचनाकार कहते हैं उसी ने जब निर्णायक की भूमिका करना प्रारम्भ कर दिया तो अब उस मूल तत्, ब्रह्म से छिन्न होने की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी।

      आज मनुष्यों की संख्या बढ़ रही है या अमुक जीव वर्ग का विस्तार हो रहा है-ऐसे आधारों को उपस्थित करके परमात्मा के संकल्प का विस्तारित होना जारी है-यह परिकल्पना ठीक नहीं है। आरम्भ में जो मास था वह उतना ही है। वास्तव में ब्रह्मा का काम नहीं विष्णु का युग’ है।

“उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।

 सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेणातिरिच्यते।।”

       दस उपाध्यायों की अपेक्षा एक आचार्य (शिक्षक), सौ आचार्यो (शिक्षकों) की अपेक्षा पिता और पिता से हजार गुना बढ़कर एक माता पूज्य होती है।

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