सनत जैन
मध्य पूर्व में ईरान और इजराइल के बीच जारी तनाव अब एक नाजुक एवं निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। इसका असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा। हाल ही में ईरान की संसद द्वारा लिए गए फैसले में अमेरिकी डॉलर में व्यापार बंद करने, पश्चिमी देशों से राजनयिक संबंधों की समीक्षा, तेल निर्यात की नई शर्तें लागू की गई हैं। ईरान की संसद द्वारा लिए गए निर्णय के बाद दुनिया में आर्थिक अस्थिरता की आशंका बलवती हो गई है।
ईरान ने जिस तरह से अपने क्षेत्रीय और वैश्विक विरोधियों के खिलाफ खुला मोर्चा खोला है, उसने वैश्विक तेल आपूर्ति, व्यापारिक मार्गों, एक से दूसरे देश के बीच में आयात और निर्यात परिवहन को लेकर नई मुसीबतें खडी होंगी।
इसका असर निवेशकों की मनोस्थिति, आयात और निर्यात के कारोबार तथा परिवहन कंपनियों पर गंभीर आर्थिक एवं सामरिक प्रभाव डालने वाला जैसा होगा। इससे दुनिया भर में आर्थिक अस्थिरता और महंगाई बढ़ेगी। ईरान की संसद और सरकार के इस फैसले का सबसे बडा असर कच्चे तेल की कीमतों पर अभी से दिखने लगा है।
पहले ही अस्थिर वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से सारी दुनिया के देशों में बडी उथल-पुथल मचेगी। वैश्विक आपूर्ति शृंखला, जो अभी तक रुस-यूक्रेन युद्ध इजराइल और गाजा के युद्ध, चीन-अमेरिका के टैरिफ तनाव से जूझ रही थी। ईरान के इस निर्णय से अब मिडिल ईस्ट में बड़ा संकट पैदा हो गया है। पश्चिम एशिया के तेल मार्गों पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं, जिससे यूरोप और एशिया सहित दुनिया के सारे देशों में महंगाई की जबरदस्त लहर आने की आशंका व्यक्त की जा रही है। ईरान के इस फैसले का अमेरिका और इजराइल के साथ-साथ सारी दुनिया के देशों को सामरिक एवं राजनीतिक संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया है। ईरान अब अमेरिका और पश्चिम के दबाव में झुकने वाला नहीं है। ईरान अब अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए खाड़ी के देशों में भी अपनी स्थिति को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
ईरान को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए अब यह लड़ाई करो या मरो जैसी स्थिति में लड़ना पड़ रही है। ईरान के इस तेवर को देखते हुए, सारी दुनिया के देशों में हड़कंप मचा हुआ है। ईरान के सख्त रुख से वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भूचाल आना तय हो गया है। भारत, यूरोप के देश एशियाई देश सभी में इसका बहुत बड़ा असर पड़ने जा रहा है। सभी देशों में कच्चे तेल का आयात महंगा होगा। परिवहन और बीमा का खर्च भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ेगा। तेल के दाम बढ़ने से सभी देशों में महंगाई बड़ी तेजी के साथ बढ़ेगी। डॉलर-रुपए तथा अन्य विदेशी मुद्रा को लेकर विकसित, विकासशील और गरीब देशों पर इसका बड़ा बुरा असर, और आर्थिक दबाव बढ़ेगा।
आम उपभोक्ता तक महंगाई का असर होगा। दुनिया भर के उपभोक्ताओं की क्रय-शक्ति कम होगी जिसके कारण आर्थिक मंदी भी बड़ी तेजी के साथ फैलेगी। बेरोजगारी जैसी समस्याओं का भी सामना दुनिया के अधिकांश देशों को करना पड़ सकता है। ऐसे में वैश्विक नेतृत्व की जिम्मेदारी बनती है, वह ईरान और इजराइल के बीच में शांति स्थापित करने की पहल करें। इस लड़ाई में अमेरिका के कूद जाने के कारण सैन्य और आर्थिक स्थिरता पर बड़ा खतरा पैदा हो गया है। युद्ध किसी विवाद का हल नहीं हो सकता है।
युद्ध की स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमियों का होता है। ईरान की संसद के निर्णय ने दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है। शक्ति प्रदर्शन से ज़्यादा इस वक्त सबसे बड़ी ज़रूरत संवाद की है। अमेरिका के युद्ध में कूद जाने के बाद वर्तमान स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। चीन रूस और उत्तर कोरिया जैसे देश ईरान के समर्थन में एकजुट हो गए हैं, जिसको देखते हुए तृतीय विश्व युद्ध की स्थिति भी बनने लगी है। इस स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। चीन, रूस और अमेरिका जैसे देशों की भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। पिछले एक दशक से ईरान पर जिस तरह से प्रतिबंध लगाकर रखे गए हैं, इजरायल द्वारा लगातार ईरान, फिलिस्तीन और अन्य पड़ोसी देशों के साथ जिस तरह की दादागिरी की जा रही थी अब वह विस्फोटक स्थिति पर पहुंच गई है। इसलिए अब संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं को आगे आकर इस मामले को कड़ाई से निपटाना होगा, अन्यथा आने वाला समय सभी के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।
यदि इस संकट को जल्दी ही नहीं निपटाया गया तो सारी दुनिया के देशों में इसके दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे, जो अलग-अलग रूपों में हो सकते हैं। सारी दुनिया के देशों में स्थिरता को लाने के लिए इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच में जो मतभेद हैं उसको सुलझाने के लिए अब रूस और चीन जैसे देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।

