कल्पना शर्मा
नवंबर 10 को दिल्ली विस्फोट, जिसमें एक कार में भीड़ भरे लाल किला इलाके में विस्फोट हुआ था और 15 लोगों की मौत हुई थी तथा कई अन्य घायल हुए थे, की खबरें अभी चल ही रही हैं। हम रोज़ पुलिस और जांच एजंसियों द्वारा कथित “आंतकी मॉड्यूल” के खुलासों और कई लोगों की गिरफ्तारियों के बारे में पढ़ रहे हैं।
यह कैसे हुआ, सुर्खियां अटी पड़ी हैं। यह इतनी निश्चितता का संकेत देती हैं जैसे गुत्थी सुलझ चुकी हो। लेकिन सुर्खियों के नीचे पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि छपी हुई जानकारी का आधार जांच एजंसियों का बताया हुआ है। यह उनका वर्ज़न है।
गिरफ्तार लोग अब तक “संदिग्ध” हैं। अभी यह अदालत में स्थापित होना है कि जो हुआ उसके पीछे वही लोग थे। लेकिन पाठकों और खासकर मुख्यधारा के टीवी चैनलों के दर्शकों को यह पता नहीं चलेगा। क्योंकि रिपोर्टिंग में अपने आप में निश्चिंतता जैसी है बजाय कि किसी स्रोत या एजंसी का हवाला इसका आधार हो।
इस तरह की गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग, जो हमें सिखाए गए पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है, की कीमत साधारण कश्मीरियों को चुकानी पड़ रही है, जो कश्मीर में या कश्मीर के बाहर रहकर अपना जीवन जीने, पढ़ने, रोजगार-धंधा करने का प्रयास कर रहे हैं। कहा जाए तो बाकी देश के कई लोगों की तरह ही ज़िंदा हैं।
27 नवंबर को द हिंदू में मीरवाइज़ उमर बेग के एक लेख का अंश यहाँ दे रही हूँ। वह हुर्रियत कान्फ्रन्स के प्रमुख हैं। लेख उनके श्रीनगर में जामा मस्जिद में दिए उनके भाषण पर आधारित है। उन्होंने मीडिया और 20 नवंबर की घटना का जिक्र करते हुए लिखा है:
“अभी हम अफसोस ही मना रहे हैं, यह देखना परेशान करने वाला है कि कैसे ऐसी त्रासदियाँ सनसनीखेज किस्सों में बदल दी जाती हैं। जांचकर्ताओं के तथ्यों को स्थापित करने से पहले मीडिया के हिस्सों में “अंदरूनी सूत्रों” के हवाले से ऐसी सुर्खियां आती हैं जो एक समुदाय और धर्म पर संदेह व्यक्त करती हैं।
निर्णय करने की इस हड़बड़ी में न सिर्फ जनता गुमराह होती है बल्कि एक समूची आबादी – खासकर देश भर में रहने वाले कश्मीरी छात्र और पेशेवर – जांच के दायरे में आ जाती है। उन्हें अचानक संदिग्ध की तरह देखा जाने लगता है। सुरक्षा की जगह भय ले लेता है और उनके घरों में परिवारों को चिंता घेर लेती है।”
उनका कहना आश्चर्यजनक नहीं है। इससे हमें, मीडिया को ठहरकर सोचना चाहिए। लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि मीरवाइज़ वैसे भी “उनका” हिस्सा, तथाकथित देश-द्रोही, करार दिए जा चुके हैं। कुछ सम्मानजनक अपवादों को छोड़कर, मुख्यधारा के अधिकांश प्रिन्ट मीडिया में “कथित”, “संदिग्ध” और “के अनुसार” जैसे विशेषण गायब हो चुके हैं। खबर के अंदर हों भी तो सुर्खियों, जो कि अधिकांश लोग पढ़ते या याद रख पाते हैं, में नहीं दिखाई देते।
दोषी साबित होने तक निर्दोष माने जाने के हर नागरिक के अधिकार के बारे में मुख्यधारा के मीडिया को शायद शिक्षित करने की जरूरत है। आतंकवाद-संबंधित मामलों में अदालती फैसलों की शृंखला, जिसमें लोगों के कई साल जेल में बिताने के बाद अदालतों ने आरोप खारिज कर दिए गए हैं, से भी इस देश में ऐसे मामलों में पत्रकारिता कोई सीख नहीं लेती।
ताज़ा मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 10 नवंबर के फैसले का है, जिसमें मोहम्मद इलियास को उत्तर प्रदेश रोडवेज की एक बस में 1996 में हुए विस्फोट में दोषी ठहराए जाने कारण जेल में 28 साल बिताने के बाद बरी किया गया। न्यूजलॉन्ड्री के पिछले स्तम्भ में मैंने बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा 2006 में मुंबई में सीरियल ट्रेन विस्फोटों में आरोपियों को बरी किए जाने का जिक्र किया था।
ऐसे मीडिया कवरेज से इन कथित आरोपियों और इनके सह साज़िशकर्ताओं के परिवारों को स्थायी नुकसान पहुंचाने के अलावा ज्यादा परेशान करने वाला यह तथ्य है कि उन लोगों – कश्मीरियों – की ज़िंदगियों पर पड़ने वाला प्रभाव है जिनका घटना से कोई लेना-देना नहीं है।
अखबारों में कई खबरें हमें बताती हैं कि कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है, कि उन्हें कश्मीर से बाहर दूसरे शहरों में किराये के मकानों से निकाला जा रहा है, कि कई शहरों में सड़कों पर जाड़े के मौसम में सूखा मेवा और शॉल बेचने वालों को परेशान किया जा रहा है।
यह सिर्फ इसीलिए हो पाता है कि मीडिया यह नैरेटिव गढ़ने में शामिल है जिसमें सभी कश्मीरियों को दिल्ली में हुई घटना के जिम्मेदार चंद लोगों के साथ एक ही जगह रख दिया जाता है।
इसी तरह, चिंतित करने वाली बात है भारतीय मुख्यधारा के मीडिया की तरफ से कश्मीर टाइम्स के प्रति एकजुटता का अभाव। कश्मीर में अंग्रेजी भाषा के पुराने अखबारों में से एक, कश्मीर टाइम्स की स्थापना 1954 में सम्मानित पत्रकार वेद भसीन ने की थी और अब इसका डिजिटल संस्करण उनकी बेटी अनुराधा भसीन चलाती हैं।
20 नवंबर को कश्मीर टाइम्स के जम्मू कार्यालय पर स्टेट इनेवस्टीगेशन एजंसी ने छापा मारा था। अखबार का प्रिन्ट संस्करण बंद होने के बाद से कार्यालय चार सालों से बंद पड़ा है। अनुराधा के अनुसार कार्यालय में कोई काम नहीं करता। इसके बावजूद, एसआईए ने न सिर्फ छापा मारा, हथियारों की बरामदगी का दावा किया।
इसके अलावा, इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एसआईए ने अखबार के मालिकों और संपादक पर “उग्रवादी और अलगाववादी विचारधारा के प्रसार”, “भड़काऊ, फर्जी नैरेटिव फैलाने”, “जम्मू कश्मीर के युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयास करने”, “असंतोष और अलगाववादी भावनाओं को भड़काने”, “शांति भंग करने” और “प्रिन्ट व डिजिटल सामग्री से भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने” के आरोप लगाए हैं।
कश्मीर टाइम्स पर छापे से हमारा ध्यान जाना चाहिए कि कश्मीर में पत्रकार किस तरह की चुनौतियों का सामना करते हैं, खासकर अगस्त 2019 के बाद जब अनुच्छेद 370 हटाया गया और जम्मू कश्मीर सीधे नई दिल्ली से शासित यूनियन टेरिटोरी बन गया।
फ्रन्टलाइन पत्रिका में इरफान अमीर मलिक का एक विस्तृत लेख यह सब बताता है। यह कश्मीर टाइम्स जैसे अखबारों की वास्तविकता बताता है जो किसी वित्तीय समर्थन के अभाव में बिखर गए, मर गए। वित्तीय समर्थन का बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों के रूप में आता था। लेकिन 2020 में खास जम्मू कश्मीर के लिए लाई गई मीडिया नीति के बाद से हालात बद से बदतर हो गए।
नीति का एक प्रावधान कहता है: ऐसे किसी मीडिया को कोई विज्ञापन नहीं दिए जाएंगे जो हिंसा भड़काता है या भड़काने का प्रयास करता है, भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सवाल करता है या सार्वजनिक शिष्टाचार और व्यवहार के स्वीकृत मापदंडों का उल्लंघन करता है।” दूसरे शब्दों में, यदि आप सरकार की लाइन पर नहीं चलेंगे तो आपको सरकार से विज्ञापन नहीं मिलेंगे।
कश्मीर टाइम्स पर पहले 19 अक्टूबर 2020 को भी छापा पड़ चुका है। 2023 में न्यू यॉर्क टाइम्स में अनुराधा भसीन ने लिखा था, “सरकारी अधिकारी और पुलिस अखबार के श्रीनगर कार्यालय में आए और स्टाफ को बाहर निकालकर दरवाजों पर ताला जड़ दिया, जो अब तक लगा है।”
कश्मीर टाइम्स के खिलाफ आरोपों पर एक नजर डालिए और फिर इसके कुछ लेख पढ़िए, जैसे ऑटिज़म और उपचार के अभाव पर, कश्मीर से निर्यात होने वाले ज़ाफ़रान पर। आपको ऐसे लेख कश्मीर से बाहर छपने वाले अखबारों में नहीं मिलेंगे, यहाँ तक कि कश्मीर में बचे अखबारों में भी नहीं। इस तरह के लेख भला कैसे “भारत की संप्रभुता व अखंडता को चुनौती” दे सकते हैं?
कश्मीर टाइम्स पर छापा, 10 नवंबर दिल्ली विस्फोट की मीडिया रिपोर्टिंग का प्रभाव और कश्मीरी पत्रकारों पर रूटीन निगरानी व प्रताड़ना पर मुख्यधारा के भारतीय मीडिया को अतमपरिक्षण करना चाहिए, जो इस पर जोर देता है कि कश्मीर देश का अभिन्न अंग है। यदि देश के एक हिस्से में मीडिया में हमारे सहयोगियों को ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है तो निश्चिंत रूप से यह हम सभी की चिंता का विषय होना चाहिए जो लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस का समर्थन करते हैं।
इससे पहले कि स्वतंत्र प्रेस का दिखावा भी पूरी तरह से मिटा दिया जाए, अनुराधा भसीन और प्रबोध जामवाल ने कार्यालय पर छापे के बाद कड़े संपादकीय में जो कहा है, उसे भारत में मीडिया को सुना जाना चाहिए:
“पत्रकारिता अपराध नहीं है। जवाबदेही गद्दारी नहीं है। और हम उन लोगों के लिए जो हम पर निर्भर हैं, सूचना देना, खोज करना और पैरोकारी करना जारी रखेंगे। सरकार के पास हमारे कार्यालयों पर छापे मारने की ताकत है। लेकिन यह हमारी सच कहने की प्रतिबद्धता पर छापे नहीं मार सकती।”
(कल्पना शर्मा का लेख न्यूजलॉन्ड्री से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत।

