रमाशंकर सिंह
“ गुजरात के छोटे से आणंद नगर में दूध मक्खन क्रीम आदि का व्यवसाय अंग्रेज़ी राज में पोल्सन नाम के एक अंग्रेज ने शुरु किया था जो दूध उत्पादक किसानों को लूटता था।एक ख़ास राजनीतिक पंथिक विचारधारा के पूर्वज तब पोल्सन की नस्ल को पोल्सन ब्रांड का मस्का ही लगाते रहते थे। आज की पीढ़ी के पुरखों को शायद याद हो कि पहले किसी की चाटुकारिता पर तंज करते हुये बातचीत में यही कहा जाता था कि ‘ क्यों पोल्सन लगा रहे हो ‘ ?
तब आज़ादी पूर्व दूध को ठंडा करने का इंतज़ाम नहीं था और कुछ ही घंटों में दूध ख़राब न हो जाये तो किसान बहुत ही कम क़ीमत पर अंग्रेज पोल्सन व्यापारी के दूध बेच देते थे । पोल्सन आणंद से बंबई दूध और बाद में दूध के उत्पाद भेज कर बड़ा मुनाफ़ा कमाता था।
आज़ादी जब क़रीब आई तो सरदार पटेल की प्रेरणा से स्थानीय नेता त्रिभवन दास पटेल और डा० वर्गीज़ कूरियन नाम के मलयाली ईसाई ने आणंद आकर किसानों को संगठित किया और आज़ादी बाद सहकारी समिति बनाकर अमूल संस्था का कारख़ाना और नेटवर्क बनाया। अमूल माने अंग्रेज़ी नाम आणंद मिल्क यूनियन लि॰ का संक्षिप्त एब्रिवियेटिड रूप। अंग्रेज पोल्सन की दूध उत्पाद की फ़ैक्ट्री के ऐन सामने कूरियन ने अमूल सहकारी फ़ैक्ट्री किसानों की ताक़त और अपने आत्मविश्वास के बल पर लगाई। सारा मुनाफ़ा किसानों को गया और किसान खुशहाल हुआ। इसी सहकारी समिति की नकल पर देश भर में दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियॉं बनीं । वर्का, स्नेह, सुधा जैसे ब्रांड हर राज्य में बने और विस्तारित हुये ।
१९७७-७८ मप्र की जनता सरकार के दो मंत्री कूरियन के उस सफल प्रयोग को देखने आणंद गये , कृषिमंत्री श्री शिवप्रसाद चिनपुरिया और मैं । खुद डा० वर्गीज़ कूरियन ने पूरे एक दिन हमें अमूल कारख़ाना और गॉंवों में सहकारी समितियों का जाल , प्रशीतित दूध संग्रहण केंद्र, दूध में फ़ैट नापकर दूध ला रही ग्रामीण महिलाओं को तत्काल नक़द भुगतान आदि सब दिखा कर प्रेरित किया कि मप्र में वही मॉडल लागू करें और तत्काल।
गुजरात की सजीधजी हाथ से कढ़ाई रंगाई के लहंगे चोली चुन्नी पहने , सिर पर चमकती पीतल की हाँडियाँ धरे ,एक लयात्मक चाल से समूह में गातीं कमेरी महिलाओं का चित्र आज भी मानस पटल पर अंकित है।
जो यह दृश्य आज भी देखना चाहतें हैं वे “ मंथन” फ़िल्म देख लें जो कि उसी ग्रामीण अंचल में फ़िल्माई पर वास्तविक सच्ची कहानी पर आधारित है।
ख़ैर मप्र सरकार मंत्रिपरिषद के समक्ष हमारी रपट रखी गई और इस तरह मप्र राज्य में दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों बननी शुरु हुंईं । मप्र के दूध मक्ंखन, छाछ व श्रीखंड के “ स्नेह “ ब्रांड की पैदायश ऐसे हुई। मप्र के तत्कालीन संस्कृति सचिव श्री अशोक वाजपेयी ने ब्रांड का नामकरण किया था “ स्नेह”
अब पूरी आशंका है कि नवगठित सहकारिता मंत्रालय इस मॉडल को कहीं ध्वस्त न कर दे क्योंकि अमूल ब्रांड और सहकारी समितियों का यह देश व्यापी नेटवर्क अडाणियों अंबानियों की निगाह में है। खाने पीने का सारा व्यापार यह अपने हाथों में लेकर २०२२-२४ के पोल्सन जैसे शोषक बनना चाहते हैं।
लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ समाजवादी नेता और मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री रहे हैं
अमूल के नेटवर्क पर कहीं अदानी अंबानी की निगाह तो नहीं

