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*क्या सचमच मर चुका है ईश्वर*

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           ~ कुमार चैतन्य

1881-82 में जर्मन दार्शनिक फ़्रीडरिख़ नीत्शे ने अपनी पुस्तक ’विनोदी विज्ञान’ में लिखा था — Gott ist tot  यानी ईश्वर मर चुका है। बाद में उत्तर आधुनिक दर्शन में यह रूपक ’ईश्वर की मौत’ या ’ईश्वर का पुनर्जन्म नहीं होगा’ के रूप में विकसित हुआ। 

      आम तौर पर नीत्शे के इस कथन को मानव के अनुभवजन्य जीवन के बाहर स्थित मानव अस्तित्व की उन प्रमुख विशेषताओं के नष्ट हो जाने से जोड़ा जाता है, जिनकी कल्पना मानवजाति के इतिहास में दुनिया के अस्तित्व के बने रहने के सिलसिले में की गई थी।

      दार्शनिकों के बीच जब इस सवाल पर चर्चा शुरू हुई कि मानवजाति के लिए ईश्वर का औचित्य क्या है, तो यह विचार सामने आया कि ईश्वर जैसी ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जो मानवजाति के अस्तित्व के बने रहने की गारण्टी करती हो।

     बाद में ईश्वर की अनुपस्थिति का यही विचार आधुनिक यूरोपीय दर्शन का प्रमुख आधार बन गया।

ईश्वर की मृत्यु हो चुकी है। लेकिन मनुष्य की प्रकृति ऐसी है कि अभी सहस्त्राब्दियों तक ईश्वर की छाया मनुष्य के मन में सुरक्षित रहेगी। मनुष्य को ईश्वर की इस छाया पर भी विजय पानी होगी। ईश्वर मर चुका है! वह पुनरुज्जीवित नहीं होगा! हमने ही उसकी हत्या की है और हम, जो इस दौर के सबसे बड़े हत्यारे हैं, हमें शान्ति कैसे  मिलेगी।

      दुनिया के लिए, जो सबसे पवित्र चीज़ थी, दुनिया की जो सबसे ताक़तवर शक्ति थी, उसे हमने अपने चाकुओं से गोद-गोदकर मार डाला है — अब हमारे ऊपर लगे ख़ून के इन धब्बों को कौन धोएगा? 

       इसके बाद से यूरोप में होनेवाली घटनाएँ कुछ दूसरे ही ढंग से घटने लगती हैं। उनका रूप, उनकी प्रकृति बदल जाती है। अब ईश्वर मर चुका है और अब ईश्वर में श्रद्धा रखने या ईश्वर में भरोसा रखने का कोई कारण बाक़ी नहीं रह गया है। ईश्वर अविश्वसनीय हो गया है। इस तरह नीत्शे ने पहली बार ईश्वर के अस्तित्व और दुनिया पर उसकी छाया, उसके असर के बारे में सवाल उठाया था।

ब्रहमाण्ड में घटने वाली घटनाओं और हमारे अस्तित्व को ही प्रमुख और आधारभूत, लेकिन अस्पष्ट घटना बताने का सिद्धान्त पेश करने वाले बीसवीं सदी के एक प्रमुख जर्मन यूरोपीय अस्तित्ववादी दार्शनिक मार्टिन हायडेग्गर ने 1927 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ’अस्तित्व और समय’ में एक निबन्ध लिखा था, जिसका शीर्षक है  — नीत्शे का कथन, ईश्वर मर चुका है। इस निबन्ध में उन्होंने बताया था कि जर्मन दार्शनिक गिओर्ग विल्गेल्म फ़्रीडरिख़ गेगेल (1770-1831) ने नीत्शे से पहले ही अपनी रचनाओं में मानव की उन भावनाओं का विस्तार से ज़िक्र किया था, जो मानवजाति के नए युग में समस्त धर्म का आधार हैं और वे पहले ही यह बता चुके हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है।

      इसके अलावा चरवाहों और पशुपालकों के प्राचीन यूनानी वनदेवता ’पान’ की मृत्यु से सम्बन्धित क़िस्से कहानियों में भी पहले से ही यह कहा जाता रहा है कि ईश्वर की मृत्यु हो चुकी है। 

प्रसिद्ध रूसी लेखक फ़्योदर दस्ताएवस्की भी अपने उपन्यास ’शैतान’ (1871-72) में नीत्शे से भी दस साल पहले ही उपन्यास के एक पात्र से यह कहलवा चुके थे — उसने मुझसे फुसफुसाकर यह कहा था कि वह जब प्रमाद में होती है जो इस तरह की भयानक बातें कहती है कि ’देखो, मैंने भगवान को मार दिया है’।

       नीत्शे ख़ुद भी यह कभी नहीं मानते थे कि ईश्वर का कोई अस्तित्व था और फिर एक दिन वह ईश्वर मर गया। ईश्वर की मृत्यु को मानवजाति का एक नैतिक संकट मानना चाहिए, जब उसका भरोसा टूट जाता है, और वह समाज के सभी नैतिक नियमों और ब्रह्माण्ड के नियमों में विश्वास करना बन्द कर देता है। नीत्शे ने ’ईश्वर मर चुका है’ कहकर मानवजाति के सामने मानवजाति के मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करने का प्रस्ताव रखा हैऔर मानवीय मन के भीतर और अधिक गहराई तक पैठ करने की बात कही है।

       नीत्शे की तरह हाइडेग्गर का भी यह मानना था कि ईश्वरीय दर्शन का ज़माना अब ख़त्म हो रहा है और अध्यात्म व अध्यात्मवाद का अस्तित्व भी चुक गया है। कभी ईश्वर को पाना ही मानव-जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य था। ईश्वर पृथ्वी पर जीवन से भी और ज़्यादा उच्च सत्ता या सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक था। ईश्वर वह सर्वोच्च शक्ति था, जो पृथ्वी पर विकसित होने वाली मानव-सभ्यता से बाहर की चीज़ थी।

पिछली सदी के सातवें दशक में ’ईसाई नास्तिकतावाद की बाइबिल : ईश्वर की मृत्यु नामक किताब के लेखक थॉमस जोनाथन जेक्सन आल्टिज़ेर के नेतृत्व में ईशशास्त्रियों ने एक आन्दोलन चलाया था। इस आन्दोलन में शामिल यहूदी आर० रुबेनस्टाइन  कुछ दार्शनिक यह चाहते थे कि यूरोप में ईश्वरवाद को फिर से लौटाया जाए। जबकि इसी आन्दोलन में शामिल  गेओर्ग वखन्यान और पावेल वान बूरेन जैसे दार्शनिकों का कहना था कि ईश्वर वास्तव में मर चुका है और इस दुनिया के सृजन के दौरान ही उसका अस्तित्व समाप्त हो गया है।

       उत्तर आधुनिकतावाद में  ईश्वर की अवधारणा को मानवजाति के अस्तित्व के बने रहने का एक प्रमूख कारण माना जाता है और ’ईश्वर की मृत्यु’ के रूपक को मानवजाति के अस्तित्व के बने रहने के किसी बाहरी कारण की अस्वीकृति के रूप में देखा जाता है। 1993 में रूसी दार्शनिक अलिक्सान्दर गिलेविच दूगिन ने ’नया दृष्टिकोण’ नामक अपने एक लेख में लिखा था  — यह मज़ेदार बात है कि उत्तर आधुनिकतावादी विद्वानों ने फिर से यह सूत्र खोजा है कि ’ईश्वर मर चुका है’। इसमें नई बात यह है कि लोग आज न सिर्फ़ ईश्वर के अस्तित्व के बारे में भूल चुके हैं, बल्कि उसकी मौत के बारे भी पूरी तरह से भूल चुके हैं। अब इस बारे में जो भी बातें कही जाती हैं, वे ईश्वर के अस्तित्व से जुड़े सवाल को भी पूरी तरह से नकार रही हैं। अब इस त्रासदी को दूर करने की जो आवेशभरी प्रक्रिया चल रही है, उसने हमें यह भूलने पर भी मजबूर कर दिया है कि आख़िर हमारे सामने कौनसा सवाल खड़ा है।

दस्ताएवस्की ने अपने उपन्यास ’करमाज़फ़ बन्धु’ में भी ’ईश्वर की मौत’ से जुड़ा यह सवाल उठाया था और कहा था कि अगर ईश्वर नहीं है तो इसका मतलब है कि आदमी को कोई भी काम, कोई भी हरकत, कोई भी करतूत करने की छूट है। रूसी फ़िल्मों में, रूसी कलाओं में, रूसी नाटकों में और रूसी कविता, कहानी और उपन्यासों में यह सवाल बार-बार उठाया जाता है और इसका जवाब देने की अपने-अपने ढंग से कोशिश की जाती है। फ़्राँसीसी लेखक ज़्याँ पॉल सार्त्र ने तो अपने अस्तित्ववादी दर्शन का आधार ही इस बात को बनाया था। उनका मानना था कि मानवतावाद ही अस्तित्ववाद है क्योंकि इनसानियत ही मानवजाति के अस्तित्व की गारण्ती करती है।

      हालाँकि दस्ताएवस्की के उपन्यासों और कहानियों में या उनके लेखों में इस तरह का कोई वाक्य कहीं नहीं मिलता है — यदि ईश्वर नहीं है तो कुछ भी करने की छूट है। लेकिन उनकी हर रचना, हर उपन्यास में यही विचार लगाता ध्वनित होता है।  दस्ताएवस्की की रचनाओं में पाई जाने वाली यह अवधारणा धार्मिक भी हो सकती है और ग़ैर धार्मिक भी।

     दस्ताएवस्की की इस अवधारणा का विश्लेषण करते हुए उसे धर्म के समर्थन में बताते हुए रूसी लेखक वीक्तर येराफ़ेइफ़ का कहना है कि यह अवधारणा इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर का अस्तित्व है। अगर हम यह कहते हैं कि ईश्वर नहीं है और कुछ भी करने की छूट है, लेकिन समाज में ’कुछ भी’ करने की छूट नहीं है, तो इसका मतलब यह है कि ईश्वर का अस्तित्व है। यह तर्क अपने आप में तर्क तो है ही। बहुत से रूसी विद्वान, रूसी विचारक, रूसी दार्शनिक और दस्ताएवस्की की रचनाओं के रूसी अध्येता दस्ताएवस्की की अवधारणा को इसी अर्थ में लेते हैं। उनका कहना है कि सचमुच यदि हम इस अवधारणा से सहमत हैं कि ’यदि ईश्वर नहीं है तो कुछ भी करने की छूट है’, और इस बात में विश्वास करते हैं कि सब कुछ करने की छूट नहीं दी जा सकती है, तो इसका मतलब यह है कि हमें यह मानना चाहिए कि ईश्वर का अस्तित्व है।

 वीक्तर येराफ़ेइफ़ बाद में ख़ुद ही इस बात से असहमति व्यक्त करते हैं। उनका कहना है कि ईश्वर नहीं है और मनुष्य को सबकुछ करने की छूट है, जो मनुष्य करता भी है, लेकिन उसे अपना हर काम सोच-समझकर करना चाहिए ताकि वह मानव समाज के अनुकूल हो और समाज में निन्दा का कारण न बने।

     इसके विपरीत नास्तिक अस्तित्ववाद के प्रवर्तक फ़्राँसीसी लेखक और दार्शनिक ज्याँ पॉल सार्त्र दस्ताएवस्की की इस अवधारणा को चुनौती नहीं देते, बल्कि उसे अस्तित्ववाद के अपने सिद्धान्त का आधार बना लेते हैं। वे लिखते हैं — दस्ताएवस्की ने एक बार लिखा था कि “अगर कोई ईश्वर नहीं है, तो सब कुछ की अनुमति है।”  यह अस्तित्ववाद का आधारबिन्दु है क्योंकि अस्तित्ववाद का मतलब ही है, मानवतावाद। नास्तिक अस्तित्ववाद के एक प्रवर्तक होने के नाते ही वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे। जैसा कि दार्शनिक फ्रेडरिक कॉप्लेस्टोन कहते हैं — मानव-मूल्यों का एकमात्र स्रोत मानव ही है और किसी भी व्यक्ति को कुछ भी करते हुए, कोई भी क़दम उठाते हुए ख़ुद अपना आदर्श और अपने मूल्य तय करने पड़ते हैं। लेकिन ये मूल्य और ये आदर्श सुरक्षित रह जाने के बावजूद, हो सकता है कि उस व्यक्ति को कोई ख़ुशी न दे पाते हों।

     सार्त्र का कहना है कि इस तरह व्यक्ति ख़ुद अपनी आज़ादी को आज़ाद छोड़ने की जगह उसे बन्धक बनाता है।

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